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बाल-उत्पीड़न की सजा

Bhaskar News | Dec 06, 2012, 01:18 AM IST

नॉर्वे में अपने सात वर्षीय बेटे की पिटाई और उत्पीड़न के आरोप में एक भारतीय दंपती को जेल की सजा हुई है। पिता चंद्रशेखर वल्लभनेनी को 18 महीने और मां अनुपमा को 15 महीने की कैद सुनाई गई है।
यह फैसला भारत में बहुत से लोगों को चकित कर सकता है। दरअसल कुछ समय पहले जब भट्टाचार्य दंपती का मामला सामने आया, जिसमें ठीक से पालन-पोषण न करने के आरोप में नॉर्वे के अधिकारी उनके शिशु को अपने साथ ले गए थे, तो भारत में मीडिया ने उस पर जोरदार भावनात्मक माहौल बना दिया था।
संभवत: उसी के असर में आकर तत्कालीन विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने तुरंत नॉर्वे के खिलाफ सार्वजनिक बयान जारी कर दिया था। इस बार वैसा नहीं हुआ है, तो इसका एक बड़ा कारण बाद में जाहिर हुआ। यह तथ्य भी है कि भट्टाचार्य दंपती के आपसी रिश्ते में कई पेचीदगियां थीं, जिसका असर बच्चे पर पड़ रहा था और नॉर्वे के अधिकारियों का हस्तक्षेप दरअसल बच्चे के हित में था।
इन दोनों प्रकरणों ने हमारे सामने यह सबक रखा है कि हर मुद्दे को भारतीय बनाम पश्चिमी संस्कृति का मुद्दा बना देना तार्किक नहीं है, बल्कि इसे मानव विकासक्रम के विभिन्न स्तरों, स्थितियों एवं उससे उपजे दृष्टिकोणों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। जिन देशों में बच्चों, स्त्रियों आदि की गरिमा एवं उनसे व्यवहार की खास मान्यताएं और सलीके विकसित हुए हैं और उन तौर-तरीकों को कानूनी मान्यता मिल गई है, हम उन पर अपनी प्राचीन मान्यताओं एवं रिवाजों को नहीं थोप सकते।
अगर भट्टाचार्य और वल्लभनेनी दंपतियों ने नॉर्वे जाकर नौकरी करने का फैसला किया, तो उन्हें वहां की संस्कृति एवं कानूनी व्यवस्था का ज्ञान अवश्य प्राप्त कर लेना चाहिए था। अगर उन्होंने वहां के कानून का उल्लंघन किया, तो इसकी सजा पाने से वे बच नहीं सकते। पिछले अनुभव के आधार पर अब यह भी कहा जा सकता है कि इस प्रक्रिया में भारत सरकार को दखल देने की जरूरत नहीं है। भारत को किसी भी दूसरे देश की तरह विदेशों में बसे अपने नागरिकों के हितों का ख्याल जरूर रखना चाहिए। लेकिन उसे वहां जुर्म करने वाले भारतीयों के बचाव में खड़ा होना चाहिए, यह अपेक्षा अनुचित है।
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Web Title: been sentenced to prison.
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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