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खुश होने की बजाय हम दौड़ते क्यों रहना चाहते हैं?

आकाश गौतम | Mar 20, 2017, 07:35 IST

खुश होने की बजाय हम दौड़ते क्यों रहना चाहते हैं?
हम मनुष्यों की शायद आनुवांशिक समस्या यह है कि हम हमेशा रफ्तार में बने रहना चाहते हैं, खुश होना नहीं चाहते। आप खुद सोचकर देखें कि पिछली बार आपने निखालिस खुशी कब महसूस की थी? आपकी वह खुशी कितनी देर टिकी थी? भाग-दौड़ में लगे रहकर बीस तरह की चीजें सही करने का नाम ज़िंदगी नहीं है।
मेरे काम के सिलसिले मुझे अपनी बिरादरी के लोगों से मिलने का मौका मिलता है। मेरे सहयात्रियों के बारे में मेरा अजीब-सा निष्कर्ष है , ‘हम खुश होना ही नहीं चाहते। हम गतिशील रहना चाहते हैं।’ व्यक्ति कॉर्पोरेट में काम करने वाला आईआईटी/अाईआईएम हो या आईएएस, शीर्ष डॉक्टर, कॉलेज स्टूडेंट अथवा गृहिणी ही क्यों न हो- मैंने पाया है कि मेरा यह ऑब्जर्वेशन ज्यादातर लोगों के बारे में सच है।

हमारी अंतर्निहित और आनु‌वांशिक समस्या ‘चिंतित’ बने रहने और ‘कभी खुश न होने’ की प्रवृत्ति है। जरा सोचिए तो पिछली बार आपने कब निखालिस खुशी महसूस की थी? फिर सोचें कि कितने वक्त वह खुशी बनी रही थी? हम ट्रेन की तरह हैं- ऐसी ट्रेन जो सिर्फ महत्वपूर्ण स्टेशनों से गुजरते रहना चाहती है। यह उन स्टेशनों (आपके जीवन के लक्ष्य) पर कुछ देर रुकती जरूर है; लेकिन इस ट्रेन में वहां विश्राम करने की काबिलियत नहीं है, क्योंकि यह अगले स्टॉप को लेकर चिंतित रहती है।

इसके लिए एक कारण तो यह है कि हम अपने आसपास इतनी ट्रेनें घूमते देखते हैं। हम उन्हें तेजी से पहुंचते देखते हैं, इसलिए हम सर्र-से गुजर जाते हैं। फिर हमारे अहंकार को सहलाने के लिए हम हमसे धीमे चलने वाली ट्रेन देखकर बड़ी राहत महसूस करते हैं। हम जताते तो यही हैं कि दोस्त की अधिक तेज ट्रेन पर हम खुश हैं लेकिन, वास्तव में हम कभी होते नहीं। हम तो खुश होना ही नहीं चाहते। यदि हमें चिंता का कारण नहीं मिलता तो हम खोज निकालते हैं। हम चुपके से यह भरोसा करने लगे हैं कि चिंता ही तरक्की का ईंधन है। डिस्को, पार्टियां और दुनिया का हिप-हॉप हमें शायद ही खुशी देता हो। हमारी छुटि्टयां हमें ऊर्जावान बनाने की जगह थकाने वाली ज्यादा होती हैं।

हमें दूसरों में खामियां निकालना बहुत पसंद है। जब हम किसी से श्रेष्ठ सिद्ध होते हैं तो बहुत अच्छा लगता है। जो हमारी प्रशंसा करते हैं, सहमत होते हैं, तोहफे देते हैं या हमारे काम करते हैं तो हम उन्हें अच्छा कहते हैं। जो ऐसा नहीं करते वे अच्छे नहीं होते।

हमारे भीतर क्या है उसकी बजाय हमारा बाहरी रूप-रंग हमारे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है। भीतर से हम थके हुए हैं और शाश्वत चिंता में बने रहते हैं। दुर्भाग्य से हम ऐसी दुनिया में रह रहे हैं, जिनमें अनावश्यक चीजें हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता हो गई हैं। तो इससे बाहर निकलने का रास्ता क्या है? उत्तर मैं नहीं जानता। आपको अपना उत्तर खोजना होगा। एक ही जिं़दगी है और अापको ऐसा माहौल तैयार करना ही होगा कि आपके सबसे बड़े आइडिया आपके दिमाग में प्रवाहित होने लगें।

जि़ंदगी 20 चीजें सही करने का नाम नहीं है बल्कि 3-4 चीजें एकदम सही करना जिं़दगी है। मेरा भरोसा करें शेष 16-17 चीजें सिर्फ बेकार का आकर्षण हैं। ट्रिक यह है कि जिं़दगी को सरल बनाकर धीरे-धीरे ऐसे बन जाएं कि उन बेकार के आकर्षणों को छोड़ सकें। हमारी ऊर्जा को हम जितना बिखरा देते हैं, ‘वास्तविक लक्ष्यों’ की ओर ऊर्जा लगाने में हम उतने ही असमर्थ होते जाते हैं, इसीलिए अनुशासन और अत्यधिक इच्छा शक्ति जरूरी है। अपनी तूफानी भाग-दौड़ पर विचार कीजिए और सोचें कि आप सिर्फ खुश होने की बजाय दौड़ते क्यों रहना चाहते हैं?
आकाश गौतम
ख्यात मोटिवेशनल स्पीकर
facebook.com/akashspeaks
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Web Title: bhaskar editorial by akash gautum
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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