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दूसरों की उन्नति के लिए जिया जीवन ही सार्थक

बलदेव शर्मा | Mar 20, 2017, 07:30 IST

  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
दूसरों की उन्नति के लिए जिया जीवन ही सार्थक
अपने जीवन के बारे में सोचता हूं तो यहां तक पहुंचने की यात्रा में बहुत से प्रसंग, बहुत से लोग याद आते हैं , जिनके संयोग से मेरा जीवन इस रूप में खड़ा हुआ है कि मैं इसकी कुछ सार्थकता का संतोष लेकर जी सकूं। वैसे भी ऐसा बहुत कम होता है कि कोई एक घटना आपका जीवन बदल दे। दरअसल, जिंदगी एक निरंतरता है, एक विचार यात्रा है, अच्छे-बुरे अनुभवों का समुच्चय है, जिससे व्यक्तित्व रूपाकार लेता है।

मैं जिस घर में जन्मा वह मथुरा जिले के प्रसिद्ध तीर्थ ‘दाऊजी’ जिसे सरकारी दस्तावेजों में ‘बल्देव’ लिखा जाता है, से लगे एक गांव ‘परलौनी’ में साधारण किसान परिवार का था लेकिन, ज्ञान व सेवा परिवेश में रचा-बसा। मैं छोटा था तब ये बातें बहुत समझ में नहीं आती थीं। इसके बाद भी अहसास था कि वहां कोई महानता भले नहीं है लेकिन, जिंदगी का अर्थ, मनुष्यता का बोध और समाज व देश के लिए अपनी जिम्मेदारी का अहसास खूब बिखरा है। इसी वातावरण से मैंने सीखा कि जीवन में महानता या सफलता पाना महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि अहमियत इस बात की है कि अपने और दूसरों के उन्नयन के लिए कितना सार्थक जीवन जिया।

मेरे बाबा साधारण निरक्षर किसान थे लेकिन, साधुओं की संगत बहुत करते थे। उनके साथ रामायण-भागवत की बहुत-सी कथाएं, चर्चाएं मैंने सुनी। बाबा बहुत अच्छे गायक थे। ब्रज के जिकड़ी भजन या चिकाड़े (सारंगी) पर राजा नल का ढोला गाने में उनकी आसपास के इलाके में खूब ख्याति थी। छुटपन में उनके साथ खेल में, काम करते या बैल-भैसों का चारा कूटते कई कवित्त, दोहे और ढोला के टुकड़े मुझे कंठस्थ हो गए थे। घर के आगे चबूतरे पर बाबा के साथ बैठे लोगों के बीच जब कभी मुझसे बड़े-बुजुर्ग कुछ गाने को कहते तो मैं उनमें से ही कुछ गा देता। लोग जब खुश होकर कहते, ‘आखिर फूलचंद का नाती है, सुरीला तो गाएगा ही,’ तो मेरा बालमन फूलकर कुप्पा हो जाता। मेरे पिताजी भी बहुत अच्छा गाते थे। हरमुनिया (हार्मोनियम) बजाते हुए उनके भजन सुनने दूर-दूर से लोग इकट्‌ठे होते थे।

बाबा मुझे बताते थे कि राजा नल इतना धर्मनिष्ठ था कि पखेरू भी उसके सिर पर छांह करते चलते थे। राजा नल की कथा सुन-सुनकर मेरे मन में यह बात बैठ गई कि सद्‌गुण-सदाचार से युक्त दूसरों के हित में लगा जीवन ही सबका प्यार और सम्मान पाता है। कृषि भूमि के बंटवारे को लेकर परिवार में एक मुकदमा चल रहा था। बाबा के चचेरे भाई ने केस मजबूत करने के लिए कुछ गलत दस्तावेज अदालत में पेश कर दिए। बाबा के वकील ने यह बात उठाई कि अदालत में हम इस बात को साबित कर देंगे तो उनको सजा हो जाएगी और हम मुकदमा जीत जाएंगे। बाबा ने साफ मना कर दिया कि भाई को सजा दिलवाकर मुझे मुकदमा नहीं जीतना, जमीन जाए तो जाए। और वे मुकदमा हार गए। बचपन के ऐसे बहुत से प्रसंगों ने मेरी मनोभूमि की रचना की।

मेरे पिता पं. मुंगीलाल शर्मा बैरागी वृत्ति के व्यक्ति थे। उन पर देश और समाज सेवा की धुन सवार थी। घर-बार सब छोड़कर वे इसी में रम गए। मुझे उनका बहुत सान्निध्य नहीं मिला। बस वे जब चार-छह दिनों के लिए बीच-बीच में घर आते थे, उतना ही। वे आरएसएस के प्रचारक हो गए। उनके कठोर सेवावृति व तेजस्वी जीवन को लोग आज भी याद करते हैं। अटलजी, दीनदयालजी का सान्निध्य भी मेरे पिता को मिला। अटलजी को तो एक बार हमारे घर में हैजा हो गया। गांव के लोग खाट की पालकी बनाकर उन्हें दाऊजी ले गए और डॉ. रमाकांत के इलाज से वे ठीक हुए। मेरे गांव के उस दौर के लोग आज भी इस घटना को बड़े रोमांच और गर्व के साथ सुनाते हैं। अटलजी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके निवास पर एक सहभोज में भेंट होने पर मैंने गांव का उल्लेख किया तो उन्होंने दर्जनभर लोगों के नाम गिनाते हुए कहा, ‘तुम्हारे गांव का ऋण है मेरे ऊपर।’

व्यक्ति के मन के संस्कार, जीवन और संगति की बड़ी भूमिका रहती है। इसी से उसके जीवन का लक्ष्य और उस तक पहुंचने का रास्ता तय होता है। गांव में मेरा एक मित्र था दयानंद, उसके पास ट्रांजिस्टर था। मुझे गाने सुनने का बड़ा शौक था। बचपन में उसी ट्रांजिस्टर से एक गाना कई बार सुना, ‘अपने लिए जिए तो क्या जिए/ तू जी ए दिल जमाने के लिए।’ जमाने के लिए जीना क्या होता है, तब समझ में नहीं आता था पर दिमाग में यह बात बैठ गई और विस्तार पाती गई। यह सारी पृष्ठभूमि का उल्लेख व्यक्तिगत है लेकिन, यह भावभूमि ही जीवन का मार्ग तय करती है, जो व्यक्ति को सामाजिक सरोकारों व देशहित के लिए जीने का मकसद देती है। पिताजी मेरी छोटी अवस्था में ही चल बसे।
तब मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता था लेकिन, उनका जितना सान्निध्य मिला उससे मेरे अवचेतन में जीवन का लक्ष्य तय होता चला गया कि जिंदगी महज पैसा, प्रतिष्ठा पाने का गणित नहीं है, यह बहुत मूल्यवान है। इसे सिर्फ इस गणित को साधने में खर्च नहीं करना है। मुझे याद है कि मेरे पिता ने मृत्यु के समय मेरा हाथ मां को सौंपते हुए कहा था कि उसे अच्छा इंसान बनाना और देशहित के लिए जीना सिखाना। मां ने बाद में अध्यापिका के रूप में जीवन की अनेक कठिनाइयों के बीच भी सदा इस व्रत को निभाया। पता नहीं मैं वैसा बन सका कि नहीं पर मेरा प्रयास वहीं रहा है। मेरा 35 वर्षों का पत्रकारिता का जीवन भी इसी भावबोध पर टिका है। मैंने कभी पत्रकारिता में नकारात्मक उपक्रमों को साधने का प्रयास नहीं किया।

राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के मुखिया के रूप मेें कार्य करना मेरी पत्रकारीय भूमिका का ही विस्तार है। समाज को विशेषकर नई पीढ़ियों को पुस्तकों व लेखन के माध्यम से ज्ञानसंपन्न, विचारवान व संस्कारवान बनाना एक अक्षर यज्ञ है। एेसा विचार या लेखन, जो भारत की सांस्कृतिक चेतना, हमारे सामाजिक व मानवीय मूल्यों व राष्ट्रीयता का पोषण नहीं करता वह प्रगतिशीलता या आधुनिकता के नाम पर केवल बौद्धिक विलासिता है। भारत की ज्ञान संपदा जिसे हमारे ऋषियों ने विश्व कल्याण के लिए रचा उसी में से ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ और ‘वसुधैव कुटम्बकम्’ जैसा शांति-सद्‌भाव का सर्व सन्वयी चिंतन विकसित हुआ। इसके प्रति एक सकारात्मक दृष्टि रखकर इसे समृद्ध करने का ही संदेश ‘कामायनी’ में जयशंकर प्रसाद ने दिया है, ‘अपने सुख का विस्तार करो, जग को सुखी बनाओ।’ यह सकारात्मकता का सबसे बड़ा मंत्र है और जीवन की ऊर्जा भी। पत्रकारिता का कठिन धर्म निभाते समय यदि पत्नी की सकारात्मक भूमिका साथ न मिले तो यह मार्ग बहुत दुरुह हो जाता है। मैं इस मामले में अत्यंत सौभाग्यशाली रहा हूं।

बलदेव शर्मा
चेयरमैन, नेशनल बुक ट्रस्ट
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Web Title: bhaskar editorial by baldev sharma
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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