Home »Abhivyakti »Hamare Columnists »Others» Bhaskar Editorial By Ganesh Rakh

निंदा से नहीं, मिसाल पेश करके बदलाव संभव

डॉ. गणेश राख | Apr 17, 2017, 06:51 IST

  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
निंदा से नहीं, मिसाल पेश करके बदलाव संभव
बचपन में डॉक्टर होने की कभी मेरी इच्छा नहीं थी। मुझे कुश्ती का शौक था। पढ़ने में मेरी कोई रुचि नहीं थी और कुश्ती में ही कॅरिअर बनाना चाहता था। महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के करमाल गांव में मेरा बचपन बीता। यह हमेशा सूखे की चपेट में रहने वाला इलाका है। पिताजी हम्माली करते थे, इसलिए मेरे कुश्ती खेलने का मां विरोध करती थी। वह कहती कि कुश्ती खेलने के कारण घर का पूरा खाना तू ही खा जाता है। अभी कुश्ती खेलेगा और आगे जाकर पिता की जगह हम्माली करेगा। बचपन के उन बेफ्रिक दिनों में मां के कहने की गंभीरता मेरे समझ में नहीं आई। सोचता अखाड़े की जगह मुझे स्कूल क्यों भेजते हैं?
मां का कहना एकदम ठीक था। पिता की डेढ़-दो हजार रुपए की आमदनी थी और उसमें पांच लोगों का खर्च चलाना टेढ़ीखीर था। सातवीं की परीक्षा पास होने के बाद जब मई में छुटि्टयां लगीं तो मां ने मुझे पिताजी के साथ काम करने ही भेज दिया। जब वहां जाकर पिताजी का काम देखा तो मां के कहने की गंभीरता समझ में आई। उन पूरी छुटि्टयों में मैंने पिताजी के साथ काम किया और मां का कहना मुझे अच्छी तरह समझ में आ गया। मैं आठवी कक्षा से पढ़ाई में पूरे मन से लग गया। पांचवीं तक तो गांव में ही शिक्षा हुई थी, उसके बाद जिले के अन्य लोगों की तरह सूखे के कारण पेट भरने के लिए हमारा पूरा परिवार पुणे में आ गया। माता-पिता पढ़े-लिखे तो थे नहीं, इसलिए पिताजी वहां भी हम्माली करने लगे और मां लोगों के घरों में काम करने लगी। पहले तो यही विचार था कि पूरी लगन से पढ़ाई कर सबसे पहले कोई नौकरी खोजना ताकि परिवार की मदद की जा सके। 12वीं पास हुआ तो सोचा कि डॉक्टरी पढ़ी तो कम से कम खुद की प्रैक्टिस तो कर सकता हूं। आरक्षण कोटे में मेडिकल कॉलेज में एडिमिशन हो गया। सारी पढ़ाई स्कॉलरशिप से हुई। वर्ष 2000 में मेरी मेडिकल की शिक्षा पूरी हुई और 2002 में मैंने प्रैक्टिस शुरू की। 2007 तक तो मैं घर-घर जाकर ही पेशेंट देखता था। फिर मैंने अस्पताल शुरू किया। मुश्ताक खान नामक मेरे मित्र थे, उनकी इमारत किराये पर ली। कुछ इधर-उधर से लोन लेकर काम शुरू किया।
3 जनवरी 2012 को फिर कन्या के जन्म पर प्रसूति का खर्च न लेने का फैसला किया। हुआ यूं कि पिछले चार-पांच वर्षों में मैंने देखा कि यदि बेटा होता तो लोग बड़ी खुशी से बिल देते। कोई पूछता भी नहीं था कि इतना बिल कैसे बना। जाते समय हमें मिठाई के डिब्बे दे जाते। सालभर बाद बच्चे के पहले जन्मदिन पर भी बुलाते। लेकिन बेटी होती तो अनुभव एकदम उलटा होता। अब तो काफी बदलाव आया है लेकिन, तब बेटी होते ही मां रोने लग जाती। रिश्तेदार अस्पताल से उठकर चले जाते। फिर कभी मिलने नहीं आते। बिल देने पर पूछते कि इतना बिल कैसे आया हमें समझाकर बताओ। कन्सेशन मांगते थे। बार-बार यही सब देखते-सुनते मन पर बहुत प्रभाव पड़ने लगा। मैंने सोचा कि बेटी होने पर बिल ही नहीं लिया जाए। ये लोग बेटा होने पर अस्पताल में मिठाई बांटते हैं तो मैं बेटी होने पर मिठाई बांटूगा। बस इतनी ही सोच थी। उनका वैसा व्यवहार है तो मैं उसके उलट व्यवहार करूंगा। औसतन हर दिन ही कोई डिलिवरी होती है और पचास फीसदी बेटियां ही होती हैं। पिछले छह साल में करीब साढ़े सात सौ डिलिवरी मैंने मुफ्त की है। चूंकि मैं अपने संतोष के लिए यह कर रहा था तो किसी से मदद मांगने का सवाल ही नहीं था। खर्च कम रखने के लिए मैंने स्टाफ कम से कम रखा है। साफ-सफाई और सुविधाओं पर जोर है, दिखावट पर खर्च नहीं करता। अब मेरा कार्यक्रम मशहूर हो गया है तो लोगों को भी इस अस्पताल से हाई-फाई सुविधाओं की अपेक्षा नहीं होती।
जहां तक अन्य डॉक्टरों को प्रेरणा देने की बात है तो शुरू में परिचित डॉक्टरों के यहां जाता और कहता कि मेरे जैसी मुफ्त डिलिवरी न करें पर 10-20 फीसदी डिस्काउंट तो दें। मैं कहता कि बेटी हो तो मुझे बताएं, मैं यहां आकर उसका जश्न मनाऊंगा। हम दूसरों के अस्पताल में भी जाकर मिठाई बांटते, उन्हें मनाते कि बिल में कुछ न कुछ कन्सेशन जरूर दें। शुरू के करीब चार साल यह हुआ। अब तो डॉक्टर खुद ही फोन करते हैं कि इस आंदोलन में कैसे जुड़ें, यह योजना कैसे लागू करें। मेडिकल स्टूडेंट्स ने इसमें खूब रुचि दिखाई है। पिछले चार वर्षों में इस आंदोलन से देशभर से 17 हजार डॉक्टर व मेडिकल स्टूडेंट जुड़े हैं।
जीवन को देखने का मेरा नज़रिया शुरू से ही बहुत सकारात्मक रहा है। मैं हमेशा पूरी तरह पॉजिटिव रहता हूं। जीवन में खुश रहने के लिए बहुत पैसे की जरूरत नहीं होती। छोटी-छोटी बातों में आपको आनंद मिल जाता है। जैसे अपनी बेटी के साथ होता हूं तो मुझे बहुत खुशी मिलती है। वह मेरे साथ कुश्ती खेलती है, क्योंकि उसे मालूम है कि पापा को इसमें बहुत मजा आता है। मैं किसी को बुरा-भला नहीं कहता। लैंगिक अनुपात बिगाड़ने के लिए समाज के साथ पचास फीसदी डॉक्टर भी जिम्मेदार हैं पर मैंने कभी न तो बेटी होने पर नाराज होने वाले लोगों और न डॉक्टरों को दोष दिया। उन्हें दोष दिया तो वे सुधरेंगे कैसे। नेगेटिव की बजाय पॉजिटिव पर ध्यान दिया तो ज्यादा अच्छा है।

बदलाव तो हो रहा है। पहले मैंने बेटी होने पर पति को अपनी पत्नी को मारते देखा है। सास-ससुर को धमकी देने लगते कि बेटी को अपने साथ ले जाइए मैं दूसरी शादी करूंगा। देखता हूं बेटा कैसे नहीं होता। बेटी होती तो रिश्तेदार मिलने नहीं आते। मां के लिए अस्पताल में भोजन का टिफिन तक नहीं भेजा जाता। अब लोग बेटी होने पर खुद मिठाई लाने लगे। अब तो कुछ ऐसे लोग भी आते हैं, जो कहते हैं कि हम अस्पताल का खर्च देना चाहते हैं। हमें कोई डिस्काउंट भी नहीं चाहिए। फिर हम वह पैसा अस्पताल में जन्मी किसी गरीब परिवार की बच्ची के नाम कर देते हैं। उनकी भी इच्छा पूरी होती है और हम भी अपने सिद्धांतों से ईमानदार बने रहते हैं। पिछले साल तो शाह नामक परिवार की महिला डिलिवरी के लिए एडमिट थी। बेटी नहीं हुई तो परिवार के सभी सदस्य रोने लगे! कहने लगे हम नौ महीनों से बस बेटी की ही बातें कर रहे थे और बेटी का ही इंतजार था। बताइए, कितना बड़ा बदलाव है। लेकिन, यदि शत-प्रतिशत बदलाव लाना है तो संसद को शादी के खर्च पर लगाम लगाने का कानून बनाना चाहिए। यही सारी समस्या की जड़ है। मैं एक गुजराती परिवार की शादी में गया तो मैं उनसे कहा कि आप डॉक्टर तो है नहीं कि आप कोई डिस्काउंट दें, लेकिन आप और यहां मौजूद सारे लोग संकल्प लें कि शादी के भोजन पर ज्यादा खर्च नहीं करंेगे।
डॉ. गणेश राख,बेटी होने पर मुफ्त में डिलिवरी करने का आंदोलन चलाने वाले डॉक्टर
medicarehospital2012@gmail.com
Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करे! हर पल अपडेट रहने के लिए डाउनलोड करें Hindi News App
Web Title: Bhaskar Editorial by ganesh rakh
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
पढ़ते रहिए 5.5 करोड़ + रीडर्स की पसंदीदा और विश्व की नंबर 1 हिंदी न्यूज़ वेबसाइट dainikbhaskar.com, जानो ख़बरों से ज़्यादा।
 

Stories You May be Interested in

      More From Others

        Trending Now

        पाएं लेटेस्ट न्यूज़ एंड अपडेट्स

        दैनिक भास्कर के ट्रेंडिंग खबरों के नोटिफिकेशन रखेंगे आपको अपडेट..

        * किसी भी समय ब्राउजर सेटिंग्स बदलकर नोटिफिकेशंस ऑफ कर सकते हैं.
        Top