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सबसे बड़े दल को मौका देना संवैधानिक बाध्यता हो

रिज़वान अंसारी | Mar 18, 2017, 06:43 IST

सबसे बड़े दल को मौका देना संवैधानिक बाध्यता हो
नैतिकता और लोकतंत्र की दुहाई देने वाली भाजपा ने गोवा और मणिपुर में जो सरकारें बनाई हैं वे असंवैधानिक भले न हो, लेकिन अनैतिक जरूर है। मुख्यमंत्री समेत आठ में से छह मंत्रियों को हार का मुंह दिखाने वाला जनादेश साफ बताता है कि गोवा की जनता में सरकार के खिलाफ घोर असंतोष था। वहीं मणिपुर में भी भाजपा दूसरे नंबर की पार्टी थी। यदि राजनीति-शास्त्र की परम्परागत शैली में सोचें, तो खंडित ही सही, जनादेश भाजपा के खिलाफ था। किंतु भाजपा ने विधायकों को जोड़-तोड़ कर आनन फानन में सरकार बना ली।

अटल बिहारी वाजपेयी के आदर्शों पर चलने वाली भाजपा ने उनके उस बयान का भी ख्याल नहीं किया, जो उन्होंने प्रधानमंत्री रहते लोकसभा में दिया था, ‘विधायकों को तोड़कर यदि सत्ता हासिल होती है तो मैं ऐसी सत्ता को चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूंगा।’ गौरतलब है कि मणिपुर में कांग्रेस के एक विधायक को भाजपा ने अपने पाले में मिला लिया है। क्या जोड़-तोड़ की यह परिपाटी लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ नहीं है? क्या भाजपा को नैतिकता नहीं दिखानी चाहिए थी? यह सच है कि कांग्रेस के समय भी इस प्रकार की निचले स्तर की राजनीति के कई मिसालें मिलती हैं, लेकिन गलतियों और गड़बड़ियों की यह परिपाटी कब तक जारी रहेगी ?

दूसरी ओर, गोवा और मणिपुर की भाजपा सरकार में शपथ लेने वाले करीब 70 फीसदी मंत्री गैर-भाजपाई हैं। जाहिर है सत्ताधारी भाजपा को अन्य दलों और निर्दलीयों से मिले समर्थन का असली समीकरण सामने आ गया है। यकीनन इससे विधायकों की खरीद-फरोख्त जैसा राजनीतिक अनाचार बढ़ता है। सबसे बड़े दल को सरकार बनाने की न्यौता देने की परम्परा को दरकिनार करने से राज्यपाल की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। बहरहाल खंडित जनादेश की सूरत में राज्यों में सरकार बनाने के दिशा-निर्देश और स्पष्ट होने चाहिए । सबसे बड़े दल के नेता को आमंत्रित करने की परम्परा को अगर संवैधानिक बाध्यता में बदला जाए तो यकीनन कई तरह के विवादों पर विराम लगाया जा सकता है।
रिज़वान अंसारी, 25
जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली
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Web Title: bhaskar editorial by rizwan ansari
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