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क्या मोदी के पास इन सवालों के जवाब हैं?

शशि थरूर | Mar 21, 2017, 07:02 IST

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क्या मोदी के पास इन सवालों के जवाब हैं?
ऐसा बहुत कम ही होता है कि कोई राजनीतिक दल अपनी सबसे बड़ी जीत के फल को कुछ ही दिनों के भीतर खट्‌टा कर दे और यही भाजपा ने आश्चर्यजनक रूप से योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का नया मुख्यमंत्री घोषित करके किया है। चवालीस वर्षीय भगवाधारी महंत की नियुक्ति का फैसला कुछ कमजोर आधारों पर निर्भर है : गोरखपुर में उनकी असंदिग्ध लोकप्रियता, जहां की लोकसभा सीट के लिए वे लगातार पांच बार चुने जाते रहे हैं। भाजपा के भीतर से उनके लिए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का जबर्दस्त समर्थन और हिंदी में दिए उनके तहलका मचाने वाले भाषण, जो मतांधता व कट्‌टरता से भरे होते हैं।
इसके विपरीत दूसरे ढंग से सोचें तो काफी चिंताजनक तथ्य नज़र आते हैं। जिस शख्स को भारत के सबसे बड़े राज्य का शासन संभालने का दायित्व सौंपा गया है, उसने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में कभी कार्यकारी पद नहीं संभाला है। देश की सबसे बड़ी प्रादेशिक नौकरशाही पर अधिकार चलाने के लिए कुछ आवश्यक अनुभव होना तो दूर, वे कभी राज्यमंत्री भी नहीं रहे हैं। चाहे वे गोरखपुर में भाजपा के अपराजेय सांसद रहे हों लेकिन, इसका संबंध व्यक्तिगत योग्यता से नहीं है। तथ्य तो यह है कि यह सीट लंबे समय से उसी के नाम रहती आई है, जो गोरखनाथ मंदिर का महंत रहा है, जिनमें किसी वक्त गोडसे के संरक्षक रहे महंत दिग्विजय नाथ और महंत अवैद्यनाथ भी शामिल हैं, जिनकी जगह आदित्यनाथ इस प्रसिद्ध मंदिर के प्रमुख बने।

मुझे अादित्यनाथ के भगवा वस्त्रों पर कोई आपत्ति नहीं है। कई हिंदू संत अपने राज्यों के श्रेष्ठतम, खुले दिमाग वाले और उदार शासक बन सकते थे लेकिन, योगी आदित्यनाथ उनमें से नहीं हैं। उनका ट्रैक रिकॉर्ड बिल्कुल उलटा है। वे बहुत प्रभावी वक्ता हो सकते हैं लेकिन, वे जो कहते हैं वह प्राय: निंदनीय रहा है। भारत के सत्तारूढ़ दल ने असंवैधानिक लक्ष्य ‘हिंदू राष्ट्र’ के एक दुस्साहसी हिमायती को सत्ता सौंप दी है। एक ऐसा व्यक्ति जिसने घोषणा की थी, ‘जो योग और भगवान शंकर की अनदेखी करते हैं, वे देश छोड़कर जा सकते हैं।’ आदित्यनाथ ने शाहरुख खान की फिल्मों के बॉयकाट का आह्वान किया था जिससे वे ‘आम मुस्लिम की तरह सड़कों पर भटकते रह जाएं।’ उनके उग्र बयान हमेशा समाज और समुदायों में िवभाजन पैदा करने वाले रहे हैं।

उनके कुछ बयान तो और भी खौफनाक रहे हैं : यू-ट्यूब पर उपलब्ध 2014 के एक भाषण में उन्होंने घोषणा की है, ‘यदि एक हिंदू लड़की किसी मुस्लिम से विवाह करती है तो बदले में हम सौ मुस्लिम लड़कियां लेंगे...यदि वे (मुस्लिम) एक हिंदू पुरुष की हत्या करते हैं तो हम सौ मुस्लिम पुरुषों की हत्या करेंगे।’ उन्होंने खुलेआम धमकाते हुए कहा था कि यदि अल्पसंख्यक, ‘शांति से नहीं रहते तो हम उन्हें सिखाएंगे कि कैसे शांति से रहते हैं और उस भाषा में समझाएंगे, जो उन्हें समझ में आती है।’ यह किसी मुख्यमंत्री की भाषा नहीं है बल्कि गली के नुक्कड़ पर खड़े रहने वाले किसी ठग की हो सकती है। ऐसी भाषा किसी उच्च पद के लिए पात्रता में बाधक नहीं है, यही बात भाजपा के बारे में बहुत कुछ कह देती है।

सिर्फ उनके शब्दों की ही बात नहीं है। 2002 में आदित्यनाथ ने ‘हिंदू युवा वाहिनी’ स्थापित की। संघ परिवार के कई संगठनों में से एक, जिसके सेवकों ने हिंसक उपद्रव, उग्र गोरक्षा और ‘लव जेहाद’ के खिलाफ ‘घर वापसी’ जैसे अभियान चलाने में महारत हासिल कर अच्छी तिजारत कर ली। चिंता तो यह कि यदि दो भिन्न धर्मों के युगल सार्वजनिक रूप से पिंगे लड़ाते दिखें तो योगी ने धमकी दी थी कि उन्हें ‘सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका दिया जाएगा।’

योगी आदित्यनाथ के खिलाफ दायर कई आपराधिक आरोपों में हत्या के प्रयास, इबादत स्थलों को खराब करने, घातक हथियारों के साथ दंगा करने और आपराधिक रूप से धमकाने के मामले शामिल हैं। यह माना जा सकता है कि वह सरकार ये सारे मामले वापस ले लेगी, जिसका उन्हें मुखिया नियुक्त किया गया है लेकिन, यह कोई अच्छा रिकॉर्ड नहीं है।

क्या भारत के सर्वाधिक आबादी वाले राज्य के लिए मुख्यमंत्री नामित करने के लिए भाजपा के पास यही सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति थे? ‘अच्छे शासन’ के नाम पर प्रचार करने वाले प्रधानमंत्री क्या वाकई यह मानते हैं कि ऐसे ट्रैक रिकॉर्ड वाला व्यक्ति उस सिद्धांत का प्रतिनिधित्व कर सकता है, जिसे उसने इतनी बार सराहना की है? जब मैं यूपी सरकार के नए मुखिया पर विचार कर रहा था तो कुछ सवाल मेरे मन में उठे :
क्या भाजपा को इस बात पर भरोसा नहीं है कि भाषण में मृदुता और संयम ऐसे उच्च पद पर आसीन व्यक्ति के लिए आवश्यक गुण होने चाहिए और इन गुणों उलट बार-बार प्रदर्शन ऐसे पद के लिए पात्रता खारिज करने की वजह होनी चाहिए?

क्या भाजपा यह नहीं मानती कि 20 करोड़ की आबादी वाले राज्य की सरकार चलाने के लिए शासन का कम से कम कुछ तो अनुभव होना चाहिए?
क्या भाजपा यह नहीं मानती कि यदि सरकार को लोगों का सम्मान हासिल करना है तो उसका मुखिया ऐसा नहीं होना चाहिए, जिसका लंबा आपराधिक रिकॉर्ड रहा हो और अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए वह हिंसा पर उतर आने की प्रवृत्ति रखता हो?

क्या भाजपा नहीं मानती कि जिस राज्य में 20 फीसदी आबादी मुस्लिम हो, मुख्यमंत्री को उस समुदाय के अधिसंख्य लोगों का विश्वास हासिल होना चाहिए, फिर चाहे उन्होंने उसे वोट न भी दिए हों? या पार्टी ने पूरे समुदाय को अपनी सोच के दायरे से हटा देने का निर्णय ले लिया है?

आखिर में, क्या भाजपा यह मानती है कि नरेंद्र मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ वाले भाषणों से आंदोलित होकर पार्टी को वोट देने वाले उत्तर प्रदेश के लाखों लोगों ने यह सोचा होगा कि वे ऐसे बेलगाम योगी से शासित होने का विकल्प चुन रहे हैं, जो उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए 325 प्रत्याशियों में भी नहीं था? मेरे पास उन प्रश्नों के उत्तर नहीं है। चिंता तो यह है कि क्या प्रधानमंत्री के पास उनके उत्तर हैं?
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
शशि थरूर
विदेश मामलों की संसदीय समिति के चेयरमैन और पूर्व केंद्रीय मंत्री
Twitter@ShashiTharoor
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Web Title: bhaskar editorial by shashi tharoor
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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