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सेहत: पार्किंसंस में डीप ब्रेन स्टिमुलेशन

डॉ. अादित्य गुप्ता | Apr 12, 2017, 09:21 IST

  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
dr. aditya gupta.
सामान्य तौर पर हाथों में कंपकंपी ही पर्याप्त है यह समझने के लिए कि कोई व्यक्ति पार्किंसंस रोग से पीड़ित है लेकिन, इसके साथ मांसपेशियों का कड़ापन या सामान्य गतिविधियां प्रभावित होना जैसे लक्षण भी दिखाई देते हैं।
इस बीमारी की शुरुआत में चेहरे पर बहुत कम या तो कोई भाव दिखाई नहीं देते हैं या चलते समय हाथ नहीं हिलते हैं, बोलते समय आवाज बिल्कुल धीमी हो सकती है या उच्चारण अस्पष्ट हो सकते हैं और जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है ये लक्षण गंभीर होते जाते हैं। इस प्रकार की स्थितियों में यह बहुत महत्वपूर्ण है कि तुरंत किसी अनुभवी न्यूरोलॉजिस्ट को दिखाया जाए।

कंपकंपी या कंपन- कंपकंपी या हिलना, अक्सर हाथों या अंगुलियों में शुरू होता है। इसमें आप अपने अंगूठे और तर्जनी उंगली में रगड़ महसूस करते हैं, जिसे पिल-रोलिंग ट्रेमर कहा जाता है। पार्किंसंस रोग का एक लक्षण यह भी है कि जब आपका हाथ रिलैक्स-जब आप कोई काम नहीं कर रहे होते हैं, तब भी उसमें कंपकंपी आती है। पर इसका इलाज डीप ब्रेन स्टिमुलेशन में है।

इमेजिंग टेस्ट -जैसे कि एमआरआईए अल्ट्रा साउंड एसपीईसीटी और पीईटी स्कैन ये दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं का पता लगाने के लिए भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इमेजिंग टेस्ट विशेषरूप से पार्किंसंस रोग का डायग्नोसिस करने में सहायक नहीं होते हैं।

कभी-कभी डायग्नोसिस करने में समय लगता है। डॉक्टर नियमित रूप से फॉलो-अप अपाॅइंटमेंट का सुझाव दे सकते हैं। जो न्यूरोलॉजिस्ट मूवमेंट डिसऑर्डर में प्रशिक्षित हंै, वह लंबे समय तक पीड़ित की हालत और लक्षणों का मूल्यांकन करेगा और पार्किंसंस रोग का डायग्नोसिस करेगा।

कैसे उपचार करेंगे- डीप ब्रेन स्टिम्युलेशन (डीबीएस) में सर्जन मस्तिष्क के विशेष भाग में इलेक्ट्रॉड आरोपित करेंगे। इन इलेक्ट्रॉड को कॉलर बोन के पास छाती में लगे जनरेटर से जोड़ा जाएगा, जो मस्तिष्क को विद्युतीय स्पंदन भेजेगा और पार्किंसंस रोग के लक्षणों को कम कर सकेगा। डीप ब्रेन स्टिम्युलेशन उन लोगों को दिया जाता है जिनकी बीमारी एडवांस स्तर तक पहुंच गई है और जो दवाइयों के प्रति अस्थिर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। डीबीएस दवाइयों के प्रति जो उतार-चढ़ाव है उसको स्थिर कर सकता है या अनैच्छिक मूवमेंट को रोक सकता है, कंपकंपी और मांसपेशियों के कड़ेपन को कम कर सकता है और चलने में जो समस्या हो रही है उसको भी ठीक कर सकता है।

डीबीएस डिसकिनेसियास को नियंत्रित करने के लिए दी जाने वाली दवाइयों के प्रति अनियमित और उतार-चढ़ाव वाली प्रतिक्रियाओं में प्रभावी है, जिनमें दवाइयों के समायोजन से भी सुधार नहीं आता।
हालांकि डीबीएस कंपकंपी के अलावा उन परेशानियों में लाभ नहीं पहुंचाती जो मेडिकेशन थैरेपी के प्रति प्रतिक्रिया नहीं देती हैं। कंपकंपी को डीबीएस के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है, जब वह दवाइयों के प्रति प्रतिक्रिया नहीं देता है।

डीबीएस को दवाइयों के ऊपर प्राथमिकता क्यों- दवाइयां पार्किंसंस रोग के लक्षणों को कम करने के अस्थायी प्रभाव के लिए दी जाती हैं। जब व्यक्ति दवाइयों के प्रभाव का आनंद लेता है तो इसे ऑन-फेज़ के नाम से जाना जाता है और जब यह कम हो जाता है तो उसे ऑफ-फेज़ कहते हैं। समय के साथ शरीर पर दवाइयों का प्रभाव समाप्त होने लगता है, इसलिए दवाइयों का सेवन बढ़ जाता है। अगर मरीजों को दिन में तीन बार दवाई लेने का सुझाव दिया गया है, लेकिन प्रभाव कम होने पर उसे दिन में आठ बार देने का सुझाव दिया जा सकता है। इससे उनके जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती है क्योंकि उन्हें उतनी ही बार ऑन और ऑफ होना पड़ता है।

डीबीएस का मरीज पर 24 घंटे लगातार प्रभाव होता है। यह अनैच्छिक मूवमेंट को रोक सकता है। इसके अतिरिक्त डीबीएस कंपकंपी में जो उतार-चढ़ाव आते हैं उसे भी नहीं होने देता है जैसा कि दवाइयों के साथ होता है। दवाइयों का प्रभाव कब खत्म हो जाएगा इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता ऐसे में अगर पार्किंसंस रोगी अपना काम करने के लिए जाने या बाहर खरीदारी करने की योजना बनाता है तो यह बड़ा जोखिम हो सकता है, क्योंकि इनका प्रभाव किसी भी समय कम हो सकता है, जिससे उनके जीवन की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
फैक्ट-अधिकतर लोगों में यह रोग 60 या उसके बाद की उम्र में होता है। यह भी देखा गया है कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों में पार्किंसंस रोग अधिक होता है।
डॉ. अादित्य गुप्ता
डायरेक्टर, न्यूरोलॉजी, अग्रिम इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइसेंस आर्टेमिस हॉस्पिटल, गुरुग्राम
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Web Title: deep brain stimulation in Parkinson
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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