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कितना पारदर्शी हो खुफिया तंत्र?

Bhaskar News | Feb 15, 2013, 06:15 AM IST

खुफिया एजेंसियां खुलेआम और पारदर्शी ढंग से काम करें, तो क्या उन्हें खुफिया कहा जाएगा? हर राज्य-व्यवस्था में खुफिया-तंत्र की अपनी अनिवार्यता होती है।

मगर मुश्किल यह है कि हमेशा इन एजेंसियों का इस्तेमाल राष्ट्रीय या आंतरिक सुरक्षा के उद्देश्य से ही नहीं होता, बल्कि सत्ताधारी इनके जरिये अपना स्वार्थ साधने लगते हैं। अत: गुप्तचर संगठनों की जवाबदेही तय करना हर लोकतांत्रिक समाज में एक बड़ी चुनौती है।

भारत में यह मुद्दा हाल के वर्षों में चर्चा में आया है। कुछ समय पहले कांग्रेस सांसद (अब केंद्रीय मंत्री) मनीष तिवारी ने इस संबंध में निजी सदस्य विधेयक पेश किया था, जिस पर समग्रता से चर्चा नहीं हो पाई। बहरहाल, अब ये सवाल एक जनहित याचिका के जरिये सर्वोच्च न्यायालय के सामने है।

कोर्ट ने केंद्र सरकार के साथ-साथ रिसर्च एंड एनालिसिस विंग(रॉ), खुफिया ब्यूरो (आईबी) और नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (एनटीआरओ) को नोटिस जारी कर उनकी राय मांगी है।

गौरतलब है कि ये एजेंसियां किसी कानून के तहत नहीं बनी हैं, इसलिए उनके कामकाज की रिपोर्ट संसद में पेश नहीं होती। उन्हें पैसा भारत की संचित निधि से मिलता है, मगर उनके खर्च के ऑडिट का अधिकार नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक को नहीं है।

नतीजतन, सरकार के बाहर यह किसी को नहीं मालूम कि इन एजेंसियों को कितना पैसा मिलता है और वे उसे कहां खर्च करती हैं। याचिका में कहा गया है कि बिना संसदीय निगरानी के काम करते हुए ये एजेंसियां कानून के शासन की धारणा और नागरिकों के बुनियादी अधिकारों के लिए खतरा बन गई हैं। लेकिन यह सवाल जटिल और संवेदनशील है, जिसमें किसी एक पक्ष में राय बनाना आसान नहीं होगा।

इस मामले में अमेरिका और ब्रिटेन का मॉडल जरूर सामने है, लेकिन 9/11 के बाद उन देशों की खुफिया एजेंसियों ने कानून के दायरे से बाहर जाकर नागरिक अधिकारों के हनन में जैसी भूमिका निभाई, उससे साफ है कि वहां के कानून भी अपने मकसद में पूरी तरह सफल नहीं हैं।

ऐसे में यह अपेक्षा सुप्रीम कोर्ट से ही है कि सभी पक्षों की राय जानने के बाद वह ऐसे दिशा-निर्देश तैयार करे, जिससे खुफिया एजेंसियों की जवाबदेही तय हो, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा पर उसका प्रतिकूल असर न पड़े।

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Web Title: How transparent intelligence?
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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