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जी-हां जस्टिस काटजू! मैं इडियट हूं

प्रीतीश नंदी | Jan 03, 2013, 01:09 IST

  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
जी-हां जस्टिस काटजू! मैं इडियट हूं
सीधे मुद्दे की बात करें। मैं खुद को उन 90 फीसदी लोगों में शामिल पाता हूं, जिन्हें कुछ दिन पूर्व जस्टिस मरकडेय काटजू ने ‘इडियट’ की तरह वर्णित किया था।
इसके साथ-साथ मेरा यह भी कहना है कि मैं जस्टिस काटजू को पसंद करता हूं। वह बेझिझक अपने मन की बात कहते हैं और उन्हें भारतीय इतिहास, संस्कृति, परंपरा इत्यादि की गहरी समझ है। इसी वजह से मुझे उनकी इस थ्योरी को स्वीकारने में कोई झिझक नहीं है कि ९क् फीसदी भारतीय इडियट हैं। बल्कि मेरा तो यहां तक सोचना है कि यदि उन्होंने यह कहा होता कि 99 फीसदी भारतीय इडियट हैं, तो भी वे ज्यादा गलत नहीं होते। मैं तब भी इस श्रेणी में शामिल ही रहता।
वैसे इडियट होने का पहला संकेत (जैसा कि फ्योदोर दोस्तोयव्स्की ने कहा) यह है कि व्यक्ति अपनी नियति को स्वीकार कर लेता है। यदि हमने अपनी नियति से लड़ने की हिम्मत दिखाई होती, तो हम कई चीजों को बदल सकते थे। मिसाल के तौर पर तब हमारी राजनीति में इतने सारे ठग, धूर्त और अपनी झोलियां भरने वाले लोग नहीं होते। नहीं, वे हमारे नेताओं के दूत नहीं हैं। वे भी अब हमारे नेता हैं और अकेले में हम उन्हें कितना ही धिक्कारें या लानत-मलामत भेजें, मगर हम उन्हें कभी नहीं बदलते। जब अदालतें उन्हें जेल में भेजती हैं, तो सरकार उन्हें ऊपर उछाल देती है।
इससे वे खुलेआम सड़कों पर गुंडों की तरह विचर सकते हैं और ऐसे तमाम भयावह काम कर सकते हैं, जिनके लिए वे कुख्यात हैं। इससे मीडिया को भले ही अद्भुत मसालेदार स्टोरीज मिल जाएं, लेकिन हमारे सार्वजनिक जीवन के लिए ज्यादा कुछ नहीं हो पाता। हमारी राजनीति में उनकी मौजूदगी किसी सभ्य-शालीन व्यक्ति के लिए विशुद्ध योग्यता के आधार पर पद के लिए दावेदारी पेश करना असंभव बना देती है।
आप हमारी मौजूदा राजनीति के हौज में तब तक प्रवेश नहीं कर सकते, जब तक आपके पास नोटों से भरा बैग न हो या आपने अपनी आत्मा किसी ऐसे शैतान के पास गिरवी न रख दी हो, जो आपको आगे बढ़ाने लिए तैयार हो। यह शैतान कोई राजनीतिक पार्टी, कारोबारी घराना या आपराधिक गिरोह समेत कुछ भी हो सकता है।
योग्यता का हमारे समाज में ज्यादा मोल कभी नहीं रहा। यहां अमूमन बड़े बनने के तीन तरीके हैं। पहला तरीका है- भाई-भतीजावाद। इसका मतलब यह है कि आप जहां जाना चाहते हैं, वहां तक पहुंचने के लिए आप अपने परिवार या सामाजिक संपर्को का इस्तेमाल करते हैं। राजनीतिक या कारोबारी जगत के कुछ मशहूर लोग अपने जन्म के संयोग से उस ऊंचाई तक पहुंचने में कामयाब रहे, जहां पर वे आज हैं। इसे मिलीभगत का पूंजीवाद भी कहा जाता है। लेकिन ऐसा कहना निंदक होने जैसा है और मेरे जैसे इडियट्स को यहां निंदक होने की इजाजत नहीं है। दूसरा तरीका है- अपराध।
यह ऐसे लोगों के लिए एक आकर्षक शॉर्टकट है, जिन्हें पारिवारिक धन या संपदा नहीं मिलती। इस तरह से आप सत्ता के श्रेष्ठि वर्ग के नजदीक पहुंच सकते हैं और थोड़ी-बहुत लूट भी कर सकते हैं। आपको अपने मसल्स बनाने होंगे- शरीर के अलावा दिमाग के भी। सत्ता का श्रेष्ठि वर्ग अपने आसपास बुद्धिमान लोगों को रखना पसंद नहीं करता। वे उत्तराधिकारी नहीं तैयार कर रहे हैं, बल्कि ठगों की एक फौज तैयार कर रहे हैं। आपको इसमें फिट होना होगा।
लिहाजा गुमनाम रहने की कला सीखें। ज्यादातर अपराधी ऐसे ही होते हैं। यही कारण है कि कोई भी उन्हें आसानी से पकड़ नहीं सकता। बड़े बनने का तीसरा जरिया है सरकारी संरक्षण। संक्षेप में कहें तो आरक्षण। जिस तरह से चीजें हो रही हैं, उसमें तो लगता है कि हमें जल्द ही अहमकों, सशस्त्र डकैतों, जेबकतरों और दुष्कर्मियों के लिए भी आरक्षित श्रेणियां मिल जाएंगी। ऐसे लोगों की तादाद इतनी बढ़ गई है कि वे अब नौकरियों, विधायिकाओं, स्कूलों और कॉलेजों में आरक्षण पाने के लिए भी नेगोशिएट कर सकते हैं। यहां तक कि ट्रेन की सीटों के आरक्षण के लिए भी ऐसा हो सकता है।
यदि यह सबकुछ न चले, तो किसी वोट बैंक के साथ जुड़ जाएं। जाएं और एक झुग्गी-बस्ती खड़ी करें। देश के किसी दूरदराज के इलाके में किसी पुल को विस्फोट से उड़ा दें और लोगों को इसके बारे में समझाने का कोई कारण तलाशें। यदि आपको रेडीमेड कारण चाहिए तो जाकर किसी अतिवादी समूह के साथ जुड़ जाएं। ऐसे कई समूह आपके व हमारे जैसे इडियट्स की तलाश में रहते हैं। कुछ आपको धार्मिक कारण बताएंगे। वहीं कुछ अन्य समूह राजनीतिक कारण बताएंगे, तो कुछ जंगलों के कटने की बात कहेंगे। अगर यह सब भी काम नहीं करता तो जाकर कुछ जींस पहनने वाले युवक-युवतियों की पिटाई कर दें और उनसे कहें कि वे अपने शरीर को पूरी तरह ढंककर रखें। इस तरह के तमाम हथकंडे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। याद रखें, हम एक नवीन भारत का निर्माण कर रहे हैं। जो कुछ भी आप नष्ट करते हैं, वह कहीं ज्यादा बड़े, भव्य और स्मार्ट रूप में वापस आ जाएगा- एफडीआई ब्रांडेड होकर। तमाम आर्थिक गतिविधियां हमें हमारे सपनों की १क् फीसदी विकास दर के करीब ले जाती हैं।
अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि मैं क्यों काटजू की उस 90 फीसदी आबादी का हिस्सा बनना पसंद करता हूं? नहीं, बेवकूफ न बनें। मैं उजड्ड-गंवार नहीं हूं। न ही मैं जातिवादी या सांप्रदायिक हूं। मैं इस नए भारत में बस थोड़ा खो-सा गया हूं, इसके बारे में थोड़ी कम समझ रखता हूं। मगर मुझे इतना जरूर लगता है कि मैं उन ९क् फीसदी लोगों में शामिल हूं, जिनकी वजह से हमारा बाजार आगे बढ़ता है और अर्थव्यवस्था फलती-फूलती है। मेरा सम्मान करें। या फिर मेरे रास्ते से हट जाएं।
प्रीतीश नंदी
वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मकार
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Web Title: Idiot of the first signs
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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