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नौजवानों के सामने ये कैसे आदर्श पेश कर रहे हैं सेनाध्यक्ष?

कल्पेश याग्निक | Mar 28, 2012, 03:48 IST

  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
नौजवानों के सामने ये कैसे आदर्श पेश कर रहे हैं सेनाध्यक्ष?
सवाल घूस देने का नहीं, आपके व्यक्तित्व का है। आपकी कमजोरी का है। किसी की क्या हिम्मत कि वह हमारे देश के सेनाध्यक्ष को कह दे कि ‘सभी लेते हैं, आप भी ले लीजिए। 14 करोड़ रुपए हैं।’ सवाल घूस देने वाले की हिम्मत का नहीं, आपके तौर-तरीकों का है। आप जब अपने जन्म की तारीख की लड़ाई लड़ते हैं तो ‘यह सेना के, 13 लाख सैनिकों के सम्मान का’ मामला बताते हैं। लेकिन वही बात जब अदालत खारिज कर देती है तो आपको कोई फर्क नहीं पड़ता। तब सम्मान की कमी का कोई समन आप मीडिया को जारी नहीं करते। सवाल आपके सम्मान का नहीं है। सेना के सर्वोच्च पद के सम्मान का है। सवाल सैनिकों के सम्मान का तो बिल्कुल भी नहीं है। क्योंकि उसे बरकरार रखने के लिए उन्हें आपकी सीख की आवश्यकता नहीं बची। प्रेरणा तो उन्हें, खैर, मिल ही नहीं रही, सीखने को भी क्या दिया गया? यही कि कोई रिश्वत लेने की सलाह दम-खम के साथ दे रहा हो तो ‘भौंचक रह जाइए!’ बस। क्योंकि ऐसी बातों से क्या होता, कोई नोटों की गड्डियां तो थीं नहीं। कार्रवाई कैसी? यूं भी सैनिकों के सम्मान के लिए हमें-आपको चिंता नहीं करनी चाहिए। ये जोशीले जवान भुजाएं फड़काते, मातृभूमि के लिए तड़पते, कठोर अनुशासन में बंधकर, तपस्वी जीवन जीकर और तेजस्वी मौत गले लगाकर अमरत्व यूं ही प्राप्त कर चुके हैं। सवाल अनुशासन का नहीं है। वो तो सेना की हर बात को, संवेदनशीलता की भट्टी में पिघलाकर, सार्वजनिक उपहास का विषय बनाने के कारनामों से कभी का भंग हो चुका है। सवाल तो अनुशासनहीनता को सख्ती से कुचलने का है। आप तो कल रिटायर हो जाएंगे, साथ ही रिटायर कर जाएंगे उन प्रश्नों को, जो स्तरहीन ट्रकों को सेना में भ्रष्ट खरीद के माध्यम से शामिल कर राष्ट्रीय सुरक्षा को तार-तार करने से पैदा हुए हैं। होते ही जा रहे हैं। उत्तरों के अभाव में। सवाल भ्रष्ट खरीद का भी नहीं है। मीडिया में चल रहे आपके ‘अभूतपूर्व’ साक्षात्कारों के लहजे का है। एकदम सहज। अविचलित। अप्रभावित। मानो आपके मातहत आपको ‘घूस के लायक’ समझ बैठे। इतनी बड़ी हिमाकत से आपको कोई फर्क ही न पड़ा। आपके नथुने क्यों न फूले? आंखों में खून क्यों न उतरा? नसें क्यों न फड़फड़ाई? रक्तसंचार तेज क्यों न हुआ? मुट्ठियां क्यों न कसीं? आपका ज़मीर क्यों न जगा? क्यों भीतर से किसी ने आपको नहीं झंझोड़ा? दो साल बाद, ऐसी शर्मिदगी भरी नाकामी, देश के सामने क्या दृश्य खड़ा करेगी? आपके भीतर ने कुछ नहीं झकझोरा तो न सही, सेनाध्यक्ष के नाते सारा तंत्र आपका था। कानून। कायदे। दलील। सज़ा। सभी आपकी। फिर क्यों चुप्पी साध ली? सवाल रक्षा मंत्री एके एंटनी का तो होना ही नहीं चाहिए। उन्होंने ‘माथा पकड़ लिया’। गला क्यों नहीं पकड़ा? संस्कृति। सरकार की यही संस्कृति। ऐसे ही अकर्मण्य संस्कार। धिक्कार। सवाल सेनाध्यक्ष और रक्षामंत्री का होता तो छोटा सा था। आने वाली पीढ़ियों के समक्ष पेश होने वाले आदर्शो का है। इसलिए बहुत बड़ा। अहम। विशाल। विराट। और अनुत्तरित। क्या कहेंगे हम अपने नौजवानों को?
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Web Title: Kalpesh Yagnik , Army chief General VK Singh
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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