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कानून और अधिकार... मध्यम वर्ग के फ्लैट मालिकों के पक्ष में बड़ा फैसला

डॉ. मनोज कुमार | Mar 16, 2017, 07:10 IST

कानून और अधिकार...  मध्यम वर्ग के फ्लैट मालिकों के पक्ष में बड़ा फैसला
यदि कोई बिल्डर किसी मध्यमवर्गीय व्यक्ति को फ्लैट देने में आनाकानी कर परेशान कर रहा को तो उसे कंज्यूमर फोरम में जाने को कहा जाता था, लेकिन उपभोक्ता संरक्षण कानून के मुताबिक फ्लैट की लागत 1 करोड़ रु. या उससे अधिक होनी चाहिए। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश से कई परेशान फ्लैट मालिकों को राहत मिली है।
यह मामला आम्रपाली सफायर डेवलपर्स का है, जिसके करीब 43 फ्लैट मालिकों ने शीर्ष उपभोक्ता फोरम में शिकायत की थी। लेकिन बिल्डर ने उपभोक्ता संरक्षण कानून के एक नियम की आड़ लेते हुए सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ याचिका लगा दी। उपभोक्ता संरक्षण कानून यह कहता है कि लागत 1 करोड़ रु. या इससे अधिक होने पर ही राष्ट्रीय उपभोक्ता फोरम में मामला जा सकेगा। इन सभी फ्लैट मालिकों ने एक संयुक्त याचिका राष्ट्रीय कंज्यूमर फोरम में लगाई थी।
सभी की एक ही शिकायत थी कि फ्लैट मिलने में बहुत विलंब हो रहा है। इसी के खिलाफ बिल्डर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगा दी। सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायाधीश एएम खानविलकर और न्यायाधीश एमएम शांता नागोदर की खंडपीठ को बिल्डर ने बताया कि प्रत्येक फ्लैट की कीमत 1 करोड़ रु. से कम है। फ्लैट मालिकों ने एक होकर फ्लैट की लागत 1 करोड़ बताई है, ताकि कानून का पालन हो सके।

खंडपीठ ने देखा कि बिल्डर किसी भी तरह से समय गंवाना चाह रहा है। वह जिला उपभोक्ता फोरम और फिर राज्य उपभोक्ता फोरम में फ्लैट मालिकों को जाने देता है और वहां पर नियम के कारण उनकी शिकायत खारिज कर दी जाती है। नियम के इस प्रावधान का बिल्डर फायदा उठा रहा है। बिल्डर की इसी याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दिया है। अब देश भर में फ्लैट मालिक जिनके फ्लैट भले ही एक करोड़ रु. के नहीं हैं, भी वे एक साथ मिलकर याचिका राष्ट्रीय उपभोक्ता फोरम में लगा सकेंगे।

पिछले वर्ष 30 अगस्त को राष्ट्रीय उपभोक्ता फोरम एवं शिकायत निवारण आयोग के सदस्य जस्टिस वीके जैन ने इसी प्रोजेक्ट में विलंब से पीड़ित 43 फ्लैट मालिकों को कहा था कि वे एक साथ मिलकर बिल्डर के खिलाफ याचिका लगा सकते हैं ताकि एक फ्लैट की कीमत भले ही 1 करोड़ न हो, लेकिन कुछ फ्लैट मिलकर इतनी कीमत के हो सकते हैं। अत: वे मिलकर याचिका लगाएंगे तो नियम का भी पालन हो जाएगा।

उपभोक्ता संरक्षण कानून 1986 समाज में लोगों के हितों की रक्षा के लिए है, जो उपभोक्ता के अधिकारों की सुरक्षा करता है। देश में यह अनोखा कानून है, जो सामान्य उपभोक्ता को बेहद कम खर्च में शिकायतों का निवारण करता है। लेकिन संगठित निर्माताओं, कारोबारियों और सेवा प्रदाताओं ने इसका दुरुपयोग किया है। कानून के अनुसार उपभोक्ता संरक्षण परिषद का केंद्र, राज्यों और जिलास्तर पर गठन करने का प्रावधान है। इसकी केंद्रीय परिषद के प्रमुख केंद्र में बैठे उपभोक्ता मामलों के मंत्री होते हैं, जबकि राज्य परिषदों के प्रमुख राज्यों में उपभोक्ता मामलों के मंत्री होते हैं।

प्रत्येक जिला फोरम का प्रमुख वह व्यक्ति होता है, जिसके पास जिला न्यायाधीश होने की पात्रता हो। इसी प्रकार से राज्य आयोगों में वही व्यक्ति प्रमुख हो सकता है, जो हाईकोर्ट जज रहा हो। राष्ट्रीय आयोग का गठन 1988 में किया गया। यहां पर सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को ही प्रमुख बनाया जाता है। तीनों ही स्तर पर जो फोरम हैं, उनके क्षेत्राधिकार वस्तुओं या सेवाओं की लागत के आधार पर तय है।

जिला उपभोक्ता फोरम में 20 लाख रु. तक के मूल्य के मामले लिए जा सकते हैं। इसी प्रकार से राज्य के आयोगों में यह 1 करोड़ रु. तक के हो सकते हैं, जबकि राष्ट्रीय आयोग में एक करोड़ रु. से अधिक के मामले लाए जाते हैं। सारा कानून वस्तुओं और सेवाओं को लेकर बनाया गया है। वस्तुओं में कमी की शिकायत तो की जा सकती है, लेकिन सेवाओं में कमी की शिकायत नहीं हो पाती है। हालांकि उपभोक्ता संरक्षण कानून में यह भी प्रावधान है कि उपभोक्ता को किसी भी तरह से कोर्ट की फीस देने की जरूरत नहीं होती है। इसमें बहुत मामूली शुल्क लगता है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से मध्यमवर्ग के उन लोगों को बहुत राहत मिलेगी, जो बिल्डरों के हाथों प्रताड़ित किए जा रहे हैं और पैसा देने के बाद भी फ्लैट हाथ में नहीं है।
फैक्ट: 15 मार्च 1962 को अमेरिकी कांग्रेस में तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने उपभोक्ता संरक्षण बिल को अनुमोदित किया था। इसी कारण से 15 मार्च अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस मनाते हैं।
डॉ. मनोज कुमार
संस्थापक हम्मूराबी एंड सोलोमन लॉ फर्म,
सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट
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Web Title: knowledge bhaskar by dr manoj kumar
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