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तलाक के बाद बच्चों की कस्टडी पर अहम फैसला

वंदन शाह | Mar 09, 2017, 06:23 IST

तलाक के बाद बच्चों की कस्टडी पर अहम फैसला
तलाक के मामलों में बच्चों की कस्टडी का मामला सबसे अहम होता है। कई मामले वर्षों से अदालतों में केवल बच्चे की संरक्षा को लेकर लंबित है। हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस संबंध में एक अहम फैसला दिया है। इसमें कहा है कि यदि पिता हर्जाना दे रहा है तो वह बच्ची से समय-समय पर मिल सकता है।
हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक मामले में तलाक ले चुके पिता को बच्चे से मिलने की अनुमति का अधिकार दिया है। यह मामला सुरेश और सुनीता का है। इसमें हाईकोर्ट ने सुरेश से कहा कि उसे हिंदू विवाह कानून की धारा 1955 के तहत तलाक के बाद पत्नी और बच्ची को मुआवजा देना होगा। साथ ही उसे बच्ची से मिलने की अनुमति भी होगी।

सुरेश आैर सुनीता की शादी कुछ साल पहले हुई थी। दोनों को एक बेटी परी हुई। जब दोनों साथ में रहते थे, तब परी दिल्ली के एक पॉश स्कूल में थी। पिता उसकी सारी जरूरतें पूरी करते थे। तलाक के बाद पिता को आदेश दिया गया कि 25 हजार रुपए पत्नी और 25 हजार रुपए बेटी परी को हर माह बतौर मुआवजा दें। सुरेश का कहना था कि परी को हर्जाना देने में उसे परहेज नहीं है, लेकिन वह पत्नी को यह नहीं देना चाहता है।

यह कोई असामान्य बात नहीं है, जो दंपती अलग हो चुके हैं, उनमें से पति पत्नी को हर्जाना नहीं देना चाहता है। इसी प्रकार से पत्नी पति को बच्चों से मिलने का अधिकार नहीं देना चाहती है। दोनों एक-दूसरे से खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश में रहते हैं। ऐसे में सबसे ज्यादा तकलीफ बच्चे को होती है। वह मनोवैज्ञानिक रूप से प्रभावित होता है। माता और पिता दोनों ही अपने अहम की तुष्टि के लिए बच्चे का प्रयोग करते हैं।

जस्टिस प्रदीप नंदराजोग और जस्टिस प्रतिभा रानी ने पाया कि सुरेश का परिवार समृद्ध था। इसमें यह भी बात उठी थी कि पति अपनी आय के बारे में सही नहीं कह रहा है। जबकि पति बच्ची को दिल्ली के एक महंगे स्कूल में पढ़ा रहा है। उसकी फीस, आने-जाने और अन्य मदों पर साढ़े सात हजार रुपए प्रतिमाह खर्च कर रहा है।

इस पर अदालत ने अपना मत रखा कि इसका मतलब है कि पति अपनी आय को छिपा रहा है। यह स्पष्ट हो गया था कि बच्ची को पालने के लिए पति को पैसा देने में कोई परेशानी नहीं थी। अदालत ने इस बात का संज्ञान लिया। अदालत ने कहा कि यह याचिका पिता को बेटी से मिलने के अधिकार से संबंधित नहीं है। अदालत ने कहा कि जो पिता बच्ची को हर्जाना देने को तैयार है, उसे इस बात का अधिकार पहले से है कि वह कम से कम त्योहारों और जन्मदिन पर या फिर कुछ दिनों में उससे मिल सकता है।

पढ़ाई के सिलसिले में परी कई शहरों में भी रही, पिता को वहां भी जाकर बच्ची से मिलने की अनुमति अदालत ने दी, क्योंकि पिता ने याचिका में शिकायत की थी कि उसे बच्ची से मिलने की अनुमति नहीं दी जा रही है। अन्य शब्दों में पति ने लिखा था कि पत्नी बच्ची से मिलने नहीं देती है।

इसी प्रकार से कुछ माह पहले अभिक और अजंता का मामला सामने आया था। दोनों की शादी को 15 साल हो चुके हैं लेकिन,शादी के दो साल बाद ही दोनों को लगा कि अलग हो जाना चाहिए। परंतु अजंता को पता चला कि वह मां बनने वाली है। तब दोनों ने शादी को एक मौका और देना तय किया। बेटी झिलमिलझील का जन्म हुआ, परंतु झिलमिलझील के तीन साल की होने पर दोनों ने तलाक का आवेदन अदालत में दे दिया। वे तमाम बिंदुओं पर अलग होना चाहते थे, लेकिन बच्ची का मामला ऐसा था कि कोई भी उसे छोड़ना नहीं चाहता था। दस वर्ष से यह मामला अदालत में लटका हुआ है। पति-पत्नी दोनों ही बेटी को साथ में रखने के अधिकार के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। अभिक बेटी के खर्च हेतु 30 हजार रुपए महीना भी दे रहा है।

पत्नी ने इस बात की बहुत कोशिश की कि बेटी से अभिक को दूर रखा जाए, उसे मिलने नहीं दिया जाए, लेकिन अभिक किसी न किसी तरह से बेटी से मिल लेता था। अब अभिक ने हिंदू विवाह कानून की धारा 26 के तहत बच्ची को अपने साथ रखने की याचिका पेश की है।

हिंदू विवाह कानून 1955 की धारा 26 में इस बात का प्रावधान है कि समय-समय पर अदालत ऐसे आदेश पारित कर सकती है, जिसमें नाबालिग बच्चों की संरक्षा, उनको हर्जाना आदि देने की व्यवस्था हो। बच्चों की संरक्षा को लेकर कानून में बहुत जटिलताएं हैं, क्योंकि अलग हो रहे माता-पिता का अंतिम निवेदन बच्चों की संरक्षा का ही होता है।
फैक्ट: तलाक के बाद बच्चे की संरक्षा देने के मामले में अदालत कई पक्षों पर विचार करती है, इसमें पालक का चरित्र, उसकी आर्थिक स्थिति तथा घर का वातावरण भी शामिल है।
वंदन शाह,
अधिवक्ता, फैमिली कोर्ट, हाईकोर्ट,
मुंबई
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