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पति से ज्यादा पढ़ी लिखी हैं तो कमाएं, गुजारा भत्ता क्यों?

bhaskar news | Apr 13, 2017, 08:35 IST

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पति से ज्यादा पढ़ी लिखी हैं तो कमाएं, गुजारा भत्ता क्यों?
अभी तक यही देखने में आया है कि तलाक पति की इच्छा से हो या फिर पत्नी की, दोनों ही स्थितियों में गुजारा भत्ते की मांग पत्नी ही किया करती है। अब अदालतें उन महिलाओं को गुजारा भत्ता देने की मांग खारिज कर रही हैं। खासतौर पर उन मामलों में जहां पति से नाजायज रूप से वसूली की इच्छा हो, ताकि जीवनभर कुछ करने की जरूरत न हो।

दिल्ली की साकेत जिला अदालत ने इसी संदर्भ में एक फैसला दिया। जिसमें अदालत ने पत्नी के गुजारा भत्ते को बढ़ाए जाने की याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा- पढ़ी-लिखी, सक्षम और योग्य पत्नी जो स्वयं कमा सकती है, उसे घर में बेकार बैठकर पति की कमाई पर कामचोरी करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
मामला ऐसा है कि पत्नी लंबे समय से पति से अलग रह रही थी। 2008 में पति को कहा था कि वह पत्नी को 5 हजार रु. प्रति माह गुजारा भत्ता दे। 2015 में पत्नी ने भत्ता बढ़ाए जाने की याचिका लगाई। इस पर अदालत ने 5500 रु. करने को कहा। महिला ने बढ़ती महंगाई का हवाला देकर इसे 25 हजार रु. करने को कहा। न्यायाधीश आरके त्रिपाठी ने महिला की याचिका खारिज करते हुए टिप्पणी की, जिसमें कहा कि वह पति से ज्यादा पढ़ी-लिखी हैं। उनके पास प्रोफेशनल डिग्री भी है, वे स्वयं भी कमा सकती हैं।

एक अन्य मामले में जिला न्यायाधीश रेखा रानी ने गौर किया कि पूर्व पति ने महिला को 12 हजार रु. का गुजारा भत्ता दिए जाने के खिलाफ अपील दायर की। वह उस महिला को नौकरी ढूंढ़ने में मदद करने को भी तैयार हो गया। और एक वर्ष के लिए उसे बारह हजार रु. का गुजारा भत्ते का भुगतान को भी तैयार हुआ। अपीलकर्ता ने कहा कि उस पर वित्तीय बोझ न डाला जाए तथा महिला को ईमानदारी से काम ढूंढ़ने का प्रयास करने का निर्देश दे। पति का तर्क था कि महिला उससे अधिक योग्यता रखती है। अदालत ने महिला को निर्देश दिया कि नौकरी ढूंढ़े और पूर्व पति पर बोझ न डाले।

दिल्ली उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायमूर्ति एसएन ढींगरा ने कुछ वर्ष पूर्व में एक फैसले में कहा कि किसी बेरोजगार व्यक्ति को अपनी परित्यक्त पत्नी को गुजारा भत्ता देने के लिए विवश नहीं किया जा सकता है। विशेषकर जब पति और पत्नी दोनों समान स्थिति में हो तो किसी को गुजारा भत्ता देने के लिए कदापि बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। जस्टिस ढींगरा ने कहा कि प्रचलित कानून के तहत पति को अपनी कमाई से परित्यक्त पत्नी को गुजारा भत्ता देना पड़ता है, लेकिन कोई कानून यह नहीं कहता है कि अलग रह रही पत्नी को पति तब भी गुजारा भत्ता दे, जब वह कमाता भी न हो। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ वर्ष पहले रोहताश सिंह बनाम श्रीमती रामेंद्र मामले में फैसला दिया था कि यदि पत्नी स्वयं पति को छोड़कर स्वेच्छा से अलग रहने लगे तो उस स्थिति में पत्नी गुजारा भत्ते की हकदार नहीं होगी।
इन मामलों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि देश में बदलते हुए हालात में कानून का रुख भी बदल रहा है। अक्सर यही समझा जाता है कि तलाक की याचिका के बाद गुजारा भत्ता की हकदार पत्नी ही होती है। घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 की धारा 12 द्वारा पत्नी अपने लिए सुरक्षा की मांग करती है, साथ ही गुजारा भत्ता और निवास के हक की मांग भी करती है।
इसके अलावा सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भी पत्नी भरण-पोषण के लिए न्यायालय से गुहार लगाती है। कई स्थितियों में जहां पति या पत्नी की आर्थिक हालत कमजोर हो, तो हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 24 के तहत मुकदमा लड़ने के लिए भी दूसरे पक्ष से राशि की मांग अदालत के सामने रखते हैं तथा अदालत की स्वीकृति से लेते हैं। यह भी चलन तेजी से बढ़ रहा है कि पति द्वारा तलाक मांगने की स्थिति में पत्नियां घरेलू हिंसा की शिकायत का मामला गढ़कर अदालत में आती हैं। ऐसे में न्यायाधीश न्यायबुद्धि से फैसला लेकर तमाम हालात को सामने रख यथार्थवादी फैसला देते हैं।
फैक्ट-घरेलू हिंसा कानून 2005 की धारा 12 में पीड़ित व्यक्ति के लिए अनुतोषों (राहत)
के आदेश प्राप्त करने हेतु प्रक्रिया दी गई है।
नंदिता झा
हाईकोर्ट एडवोकेट,
नई दिल्ली
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Web Title: nandita jha article for knowledge bhaskar
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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