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जो सार्थक है, वही सकारात्मक है

राजेश जोशी | Oct 05, 2015, 03:29 IST

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जो सार्थक है, वही सकारात्मक है
मिस्र के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कथाकार नजीब महफूज़ की एक बहुत छोटी-सी कहानी है - प्रार्थना । इस कहानी का अनुवाद हिंदी के चर्चित कथाकार जितेंद्र भाटिया ने किया है:

‘मेरी उम्र सात से भी कम रही होगी जब मैंने क्रांति के लिए प्रार्थना की। उस सुबह भी मैं रोज़ की तरह दाई की उंगली पकड़कर प्राथमिक शाला की ओर जा रहा था, लेकिन मेरे पैर इस तरह घिसट रहे थे जैसे कोई जबर्दस्ती मुझे कैदखाने की ओर खींचे लिए चल रहा हो। मेरे हाथ में काॅपी, आंखों में उदासी और दिल में सब कुछ चकनाचुर कर डालने की अराजक मनःस्थिति थी। निकर के नीचे नंगी टांगों पर हवा बर्छियों की तरह चुभ रही थी। स्कूल पहुंचने पर बाहर का फाटक बंद मिला। दरबान ने गंभीर शिकायती लहज़े में बताया कि प्रदर्शनकारियों के धरने की वजह से कक्षाएं आज भी रद्‌द रहेंगी। खुशी की एक ज़बर्दस्त लहर ने मुझे बाहर से भीतर तक सराबोर कर दिया। अपने दिल की सबसे अंदरूनी तह से मैंने इंकिलाब के ज़िंदाबाद होने की दुआ मांगी।’

यह मजेदार छोटी-सी कहानी सकारात्मकता और नकारात्मकता के अर्थ को उलझाती हुई लग सकती है, लेकिन वास्तविकता यही है कि अलग-अलग स्थितियों में अलग-अलग व्यक्तियों के लिए इन पदों के अर्थ बदल जाते हैं। जैसे स्कूल जाने के प्रति अनइच्छुक बच्चे के लिए स्कूल और क्रांति जैसे पद की सकारात्मकता बदल गई है। वह क्रांति के ज़िंदाबाद होने की कामना इसलिए करता है कि उसके कारण उसे स्कूल से छुट्‌टी मिल गई है । ऐसी स्थितियां आ सकती हैं जब आपको दो सकारात्मक स्थितियों या विचारों के बीच अपने लिए चुनना हो।

चरखे या स्वदेशी आंदोलन में विदेशी कपड़ों और सामान की होली जलाने को लेकर महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर के बीच हुई असहमति और वाद-विवाद को याद किया जा सकता है। (टैगोर इसे पश्चिम से दिल और दिमाग के स्तर पर अलगाव तथा आध्यात्मिक आत्मघात मानते थे। चरखे से बुनाई पर उन्होंने कहा कि जो लोग दूसरे काम के योग्य हैं, उनके द्वारा चरखे पर सूत कातने से क्या भला होगा।) इसमें रवींद्रनाथ का पक्ष सकारात्मक लग सकता है और गांधीजी की कार्रवाई नकारात्मक। तर्क के स्तर पर चाहे रवींद्रनाथ गलत नहीं थे, लेकिन बाद के इतिहास ने गांधीजी के आंदोलन को ज्यादा सही सिद्ध किया। सही से ज्यादा देश के लिए सार्थक भी।

महाभारत में यक्ष और युधिष्ठिर के बीच हुए संवाद में यक्ष ने युधिष्ठिर से प्रश्न किया कि दुनिया में सबसे मूल्यवान क्या है? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया- समय। वस्तुतः समय ही किसी भी स्थिति घटना या विचार की सकारात्मकता और नकारात्मकता को तय करता है। कहा जा सकता है कि सकारात्मकता एक सापेक्ष अवधारणा है। वह दिक और काल के संदर्भ में ही व्याख्यायित होगा। यानी समय, परिस्थिति और स्थान के सदर्भ से काटकर अगर उसे देखेंगे तो वह एक लुजलुजा-सा पद बनकर रहा जाएगा।

उत्तर आधुनिकता के एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण चिंतक जाॅक देरिदा के कथन को इस प्रसंग के साथ ही जोड़कर देखें तो शायद नकारात्मकता तथा सकारात्मकता और समय के संबंध को समझने में ज्यादा सही दृष्टि मिल सकती है। जाॅक देरिदा का मानना है कि चरम निराशा की अवस्था में भी किसी उम्मीद की आकांक्षा समय के साथ हमारे रिश्ते का एक अभिन्न अंग है। नाउम्मीदी, इसलिए है, क्योंकि हमें उम्मीद है कि कुछ अच्छा और सुंदर घटित होगा। मुझे लगता है कि सकारात्मकता से ज्यादा सार्थकता पर बल दिया जाना चाहिए। हमारे समय में, जो कुछ भी हाशिये पर धकेल दिए गए मनुष्य के पक्ष में है, वही सार्थक है और वहीं सही अर्थ में सकारात्मक है।

सकारात्मकता एक लचीला पद है। इसकी व्याख्या हर व्यक्ति अपने ढंग से करता है, कर सकता है। कहा जा सकता है कि नकारात्मकता भी ऐसा ही पद है। सत्ताएं या ताकत की संरचनाएं दोनों ही पदों का अपने हित में हमेशा से ही मनमाना उपयोग करती रही हैं। ताकत के केंद्र चाहे राजनीतिक हों, सामाजिक या धार्मिक। यह सिलसिला एक स्तर पर घर से ही शुरू हो जाता है, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि बच्चा जब पहली बार ‘नहीं कहना सीखता है तभी उसके दिमाग का विकास शुरू होता है । कहा जा सकता है कि ‘नहीं’ तो एक नकारात्मक शब्द है, लेकिन यही मस्तिष्क के विकास की सकारात्मक प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है। एक व्यक्ति के लिए, जो सकारात्मक है वह दूसरे के लिए नकारात्मक हो सकता है और इसी तरह नकारात्मक कभी-कभी बहुत सकारात्मक हो सकता है बल्कि होता ही है।

इतिहास में इसके बहुत उज्ज्वल उदाहरण मिल जाएंगे। स्वाधीनता संग्राम में भगत सिंह द्वारा संसद में बम फेका जाना ही नहीं महात्मा गांधी का करो या मरो जैसा आंदोलन भी अपने ध्वन्यार्थ में नकारात्मक है, लेकिन इतिहास इन दोनों ही घटनाओं की व्याख्या सकारात्मक रूप से ही करेगा। इसलिए कई बार लगता है कि सकारात्मकता और नकारात्मकता वस्तुतः ताकत के खेल के रूप में अपना अर्थ ग्रहण करते हैं। यह पद एक ऐसा औजार है, जिससे सत्ता हर घटना की व्याख्या को अपने पक्ष में मोड़ लेने की कोशिश करती है। समाज का वर्गीय ढांचा अपने आप में अन्याय पर आधारित संरचना है। वह मनुष्य और मनुष्य के बीच फर्क करती है।

पुरुष-सत्तात्मक समाज अन्याय पर आधारित संरचना है। वह स्त्री और पुरूष के बीच भेद करता है। उनके अधिकारों के बारे में भेद करता है। समान अधिकार का दावा करने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में भी क्या सबको समान अधिकार मिल पाते हैं? आरक्षण के बावजूद हम पाते हैं कि कई स्तर पर दलितों के साथ समाज में हर पल अन्याय की घटनाएं होती ही रहती हैं। इन स्थितियों के विरूद्ध समाज में लगातार संघर्ष जारी रहता है। बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में स्त्री विमर्श या दलित विमर्श ने विचार-विमर्श में केंद्रीयता हासिल कर ली। इसके पक्ष और विपक्ष दोनों में ही तर्क दिए जा सकते हैं। दिए जाते रहे हैं।

तो सवाल उठता है कि नकारात्मकता है क्या? स्त्रियों, बच्चों और समाज के कमजोर तबके के लोगों पर होने वाला अन्याय, अत्याचार नकारात्मक है या उसके विरूद्ध असहमति मंें उठा हाथ, विरोध में लिखा या बोला गया शब्द नकारात्मक है? वस्तुतः नकारात्मक जीवन स्थितियों के विरूद्ध खड़ी नकारात्मक कार्रवाई एक वास्तविक सकारात्मकता है।
राजेश जोशी
साहित्य अकादमी अवॉर्ड व शिखर सम्मान से पुरस्कृत हिंदी कवि और लेखक
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(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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