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हिंदू दक्षिणपंथ के नए प्रतीक-पुरुष का उदय

राजदीप सरदेसाई | Mar 31, 2017, 08:49 IST

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rajdeep sirdesai.
योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद उनके उदय की नरेंद्र मोदी से तुलना की जा रही है। मोदी की तरह आदित्यनाथ भी गरीब परिवार में जन्मे अविवाहित हैं, कम उम्र में घर छोड़ चुके हैं और उन्होंने हिंदुत्व की राजनीति में सार्थकता पाई है। मोदी की तरह वे करिश्माई व विवादास्पद हैं। और प्रधानमंत्री की तरह ही आदित्यनाथ को भी अंग्रेजी भाषी बुद्धिजीवी संदेह और भय की दृष्टि से देखते हैं। अब तो हमें कहा जा रहा है कि योगी ही भविष्य के प्रधानमंत्री हैं।

यह सही है, लेकिन ठीक ऐसा भी नहीं है। बेशक दोनों के लालन-पालन और भगवा बिरादरी में दोनों के अाधार में समानता है लेकिन, उनके राजनीतिक उत्थान में अंतर भी उतना ही स्पष्ट है। मोदी की दीक्षा आरएसएस की शाखाओं में हुई, वे प्रचारक बनें और फिर उन्होंने अच्छा-खासा वक्त परदे के पीछे रहकर भाजपा में संगठक की भूमिका निभाई, जिससे वे भाजपा की निर्णय प्रक्रिया के केंद्र में आ गए।
उन्हें अक्टूबर 2001 में बिना एक भी चुनाव लड़े गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया लेकिन, तब तक उन्होंने राज्य में भाजपा के आर्किटेक्ट की प्रतिष्ठा हासिल कर ली थी। इसके विपरीत आदित्यनाथ हमेशा से ‘बाहरी’ रहे और अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता व गोरखपुर में पांच बार सांसद रहने के बाद भी वे उत्तर प्रदेश भाजपा नेतृत्व क्रम में हाशिये पर ही रहे हैं।
2017 के चुनाव में भी, भाजपा की प्रचार सामग्री में उनका कोई खास वजूद नहीं रहा। आदित्यनाथ की आगे कूच राम मंदिर आंदोलन से शुरू हुई और उन्हें अपने संरक्षक गोरखनाथ मंदिर के महंत अवैद्यनाथ का उत्तराधिकारी बनाया गया। तब वे उम्र के तीसरे दशक में ही थे। अवैद्यनाथ हिंदू महासभा के सदस्य थे और अयोध्या में मंदिर निर्माण पर जोर देने वाले संत-साधु समाज के अभिन्न अंग थे। उन्होंने कभी आक्रामक हिंदू राष्ट्रवाद के लिए प्रतिबद्धता छिपाई नहीं।

उग्र हिंदुत्व के प्रति एेसी ही प्रतिबद्धता ने आदित्यनाथ की राजनीति को आकार दिया। उनकी हिंदू युवा वाहिनी हिंदू बहुसंख्यकवादी समाज के विचार को बढ़ाने में अग्रणी है, जिसमें मुस्लिमों को दोयम दर्जा स्वीकार करना होगा। फिर चाहे गोवध विरोध हो, घर वापसी हो या लव जेहाद, ‘शत्रु’ हमेशा से मुस्लिम हैं। यहां तक कि 16वीं लोकसभा में भी वे प्राय: ‘हिंदू’ मुद्‌दों पर ही केंद्रित रहे, खासतौर पर गोवध पर।
मोदी में हमेशा सिर्फ हिंदुत्व हीरो से आगे देखे जाने की इच्छा दिखाई देती है। 2002 के गुजरात दंगों और उसके बाद की घटनाओं ने उन्हें हिंदू राष्ट्रवादी हीरो बना दिया था, इस छवि का उपयोग उन्होंने बड़ी कुशलता से राजनीतिक पूंजी निर्मित करने में किया। यह वह वक्त था जब उन पर सांप्रदायिक रूप से भड़काने वाले बयान देने (याद करें, ‘हम पांच, उनके पच्चीस)’ और विश्व हिंदू परिषद के प्रवीण तोगड़िया जैसे नेताओं को धार्मिक भावनाएं भड़काने और दंगा करवाने का लाइसेंस देने के आरोप लगे।
2007 में दोबारा गुजरात का मुख्यमंत्री चुने जाने के बाद वे उतने ही प्रयासों से विकास पुरुष की छवि बनाने में लग गए, जिसने उनके राजनीतिक उदय को बरकरार रखा है। यहां तक कि उन्होंने तोगड़िया से भी दूरी बना ली, नियम विरुद्ध सड़क किनारे बने मंदिरों को तोड़ने के आदेश दिए और विहिप का गुस्सा भी झेला। यह रणनीतिक था या नहीं पर इससे खुद को नया रूप देने की इच्छा या कम से कम समावेशी राजनीति का मुखौटा लगाने की इच्छा तो जाहिर होती ही है।

इसके विपरीत आदित्यनाथ की राजनीतिक यात्रा में न तो खुद की पुनर्खोज है और न कोई मुखौटा है। दो दशकों से उनकी सार्वजनिक टिप्णणियों में लगातार भावनाएं उद्वेलित करने, अल्पसंख्यकों को डराने-धमकाने के प्रयास और हिंसा भड़काना ही रहा है। दंगे से लेकर नफरत फैलाने वाले भाषणों तक उनके खिलाफ आपराधिक आरोपों में संवैधानिक मर्यादा और राजनीतिक स्तर पर नैतिक व्यवहार के प्रति तिरस्कार ही दिखता है। उनके समर्थक गोरखपुर में बार-बार चुने जाने को इस बात का सबूत बताएंगे कि उन्हें काफी जनसमर्थन प्राप्त है लेकिन, वे यह नहीं समझते कि चुनावी जीत से आपराधिक व्यवहार वैध नहीं हो जाता।

नि:संदेह उग्र हिंदुत्व को बेधड़क बढ़ावा देने और अधिक हिंसक हिंदुत्व को गले लगाने से आदित्यनाथ नरेंद्र मोदी की बजाय बाल ठाकरे ही अधिक लगते हैं। यह शिवसेना ही थी, जिसने राजनीतिक व संवैैधानिक मर्यादाओं को दरकिनार कर समर्थकों से विरोधियों को सबक सिखाने को उकसाया था- फिर वे ‘बाहरी’ प्रवासी हों या ‘राष्ट्र विरोधी मुस्लिम।’
ठाकरे भी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हो सकते थे लेकिन, उन्होंने ‘रिमोट कंट्रोल’ रहना स्वीकार किया। अब मोदी की तरह उन्हें भी कड़े, व्यर्थ बातें न करने वाले प्रशासक और कानून-व्यवस्था की दृष्टि से मजबूत नेता की तरह पेश किया जा रहा है।
हालांकि, उत्तर प्रदेश जैसे विशाल व जटिल राज्य पर शासन करना गुजरात को संभालने से कहीं ज्यादा कठिन है। फिर आदित्यनाथ पर मोदी की तुलना में कहीं ज्यादा बोझ है। खासतौर पर योगी अपने उन पैदल सैनिकों को कैसे काबू करेंगे, जिन्हें तो निश्चित ही लग रहा होगा कि अब उनका वक्त आ गया है।
एंटी रोमियो दस्तों का खतरा उतना ही वास्तविक है, जितना उन समूहों के जॉब जाने व आजीविका के जोखिम का, जो हिंदुत्व की विश्वदृष्टि में फिट नहीं बैठते। उतना ही खतरा भावनात्मक रूप से उत्तेजना लाने वाले और विभाजनकारी राम मंदिर आंदोलन का।
वर्ष 2001 में मोदी को गुजरात भेजते वक्त आरएसएस जानता था कि वह जोखिम ले रहा है लेकिन, वह काम कर गया और गुजरात राजनीतिक हिंदुत्व की मूल प्रयोगशाला बना। योगी को मुख्यमंत्री नियुक्त कर और भी बड़ा जोखिम लिया गया है लेकिन, संघ परिवार के लिए बड़े संभावित फायदे के लिए : भारत के राजनीतिक रूप से सबसे निर्णायक राज्य में हिंदू वोट बैंक को मजबूत करना।
पुनश्च : मुख्यमंत्री नियुक्त करने के तुरंत बाद योगी आदित्यनाथ को संसद में बोलते सुनने के बाद भाजपा के एक वरिष्ठ सांसद ने मेरी तरफ मुड़कर कहा, ‘देखिए, कितनी सौम्यता से वे बोल रहे हैं। निश्चित ही वे उन सारी बातों से आपको चकित करेंगे, जो प्रधानमंत्री के रूप में मोदी में दिखाई देती हैं।’ सराहनीय लहजा बताता है कि हमने हिंदू दक्षिणपंथ के लिए एक नए राजनीतिक आइकन को उभरते देख लिया है : कथित ‘हाशिया’ अब आखिरकार मुख्यधारा बन गया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
राजदीप सरदेसाई
वरिष्ठ पत्रकार
rajdeepsardesai52@gmail.com
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Web Title: rising of symbolic man of hindu rightist
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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