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द इकोनॉमिस्ट ने कहा- अनिवार्य नहीं होना चाहिए ‘आधार’

bhaskar news | Apr 21, 2017, 06:44 IST

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वर्ष 2010 में आधार लॉन्च होने के पहले तक कई भारतीयों के पास अपनी पहचान का कोई सबूत नहीं था। अब 99 फीसदी वयस्कों के पास है। यह सस्ता, साधारण और अच्छा माध्यम है, जिससे पता चलता है कि कौन क्या है। इसकी मदद से राज्यों की योजनाएं का लाभ उन लोगों को मिलने लगा है, जिन्हें वाकई जरूरतमंद हैं। इसकी मदद से भ्रष्टाचार कम हुआ, अरबों रुपए की बचत हुई है।

12 अंकों वाले आधार नंबर को बैंक खाते और मोबाइल फोन से जोड़कर पैसे ट्रांसफर करने जैसे कई कार्य होने लगे हैं। आधार की मदद से लाखों भारतीय आधुनिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन रहे हैं। आधार तैयार करने का मुख्य उद्देश्य मुख्यधारा से अलग-थलग लोगों को जोड़ना और एकजुट करना था, न कि उन्हें बाहर करना। कई भारतीय यह सोचने लगे हैं कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य पहले से अधिक हो चुका है और उसे अनिवार्य करने पर बहस होने लगी है।

इस प्रोजेक्ट, इसके फायदों और जोखिमों को अदालत ने निशाने पर लिया है। हालांकि, सरकार पुरजोर तरीके से उस डर-चिंता का खंडन कर रही है कि करोड़ों लोगों के आधार डेटा का गलत उपयोग किया जा सकता है। हाल के महीनों में नरेंद्र मोदी सरकार ने दर्जनों योजनाओं-कार्यक्रमों को आधार कार्ड से जोड़ा है और उनसे जुड़ने के लिए आधार अनिवार्य कर दिया है। मार्च में मोदी सरकार ने विधेयक में यह बात शामिल कर दी कि सभी करदाताओं को आधार भी टैक्स रिटर्न से जोड़ना होगा। ऐसे ही नियम के तहत बच्चों को स्कूल में दिए जाने वाले भोजन (मध्याह्न भोजन) और हवाई यात्रा का टिकट खरीदने के लिए भी आधार जरूरी कर दिया गया है। सभी नागरिकों के लिए आधार अनिवार्य किए जाने के संसद में एक सवाल पर भारत के वित्त मंत्री का सख्त जवाब था कि ‘हां’ हम ऐसा कर रहे हैं।

बाद में इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में और विवाद बढ़ गया। आधार के संबंध में दायर कई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट के जजों ने अभी कोई फैसला नहीं किया है। लेकिन, पिछले दो वर्ष में शीर्ष अदालत ने कई मौकों पर उल्लेख करते हुए कहा है कि पहचान पुख्ता करने वाली इस योजना को एच्छिक किया जाना चाहिए। या इसे तब तक यथावत रखना चाहिए, जब तक शीर्ष कोर्ट किसी नतीजे पर न पहुंच जाए। उसके बावजूद अभी तक यह मुद्दा बाध्यकारी बना हुआ है और एक खतरा यह भी है कि सरकारी योजनाएं भी भविष्य में कानूनी अड़चनों में फंस सकती हैं।

एक अन्य बात यह मायने रखती है कि पिछले वर्ष मोदी सरकार ने आधार को लेकर एक कानून पारित किया था, जिसमें इसके डेटा की सुरक्षा की कानूनी जवाबदेही का जिक्र था। उसमें उल्लेख है कि राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में जरूरी होने पर ही किसी की जानकारी शेयर की जा सकती है। हालांकि यहां इरादा बिल्कुल स्पष्ट है।

भारत की आजादी के वर्ष 1947 से ही स्वीडन में नागरिकों के लिए ‘नेशनल आईडी सिस्टम’ शुरू हो चुका था। कुछ खामियां उसमें भी थी। उस आईडी को वहां टैक्स, स्कूल, मेडिकल व अन्य ऐसे रिकॉर्ड के साथ जोड़ा गया था जो किसी प्रकार की सुविधाओं से संबंधित थे। लेकिन, भारत नॉर्डिक साम्राज्य वाला देश नहीं है। यहां मोदी सरकार है, जो राष्ट्रवाद पर तो सख्त है लेकिन कभी-कभी लापरवाह नजर आती है। जैसे, पिछले वर्ष सरकार ने अचानक ‘नोटबंदी’ का फैसला करके 121 अरब भारतीयों को संशय में डाल दिया था। ऐसे ही फैसलों के कारण हमेशा यह प्रतीत नहीं होता कि उसे नागरिक अधिकारों की कोई फिक्र है। नोटबंदी के बाद आधार को टैक्स खातों से जोड़ने के नियम ने चिंताएं बढ़ा दी हैं। संभव है कि सरकार टैक्स चोरी करने वालों या देश के खिलाफ साजिश रचने वालों का पता लगाएगी। इससे जाहिर होता है कि आधार की जानकारियों का कहीं न कहीं उपयोग जरूर होगा।

- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव से पहले आधार को फिजूल-अनुपयोगी बताकर उसका विरोध किया था। आज वे ही इसके जरिये भारत को बदलने- पारदर्शी व्यवस्था लाने की बातें कर रहे हैं।
- सरकार के लिए यह फायदेमंद होगा कि वह अपने नागरिकों को ज्यादा सुविधाएं मुहैया कराए। जहां तक आधार की महत्वाकांक्षा की बात है, भारतीयों में यह भरोसा होना चाहिए कि उनकी जानकारियों (डेटा) का दुरुपयोग नहीं होगा।
- सख्त नियम अनिवार्य करने, सुप्रीम कोर्ट को अनसुना करके, आलोचकों को निर्दयतापूर्वक खारिज करने से उद्देश्य के विपरीत ही प्राप्त होता है। सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि वह दुविधाएं दूर करे और अपने विचार बिल्कुल स्पष्ट करे।
कई देशों में अग्रणी बना भारत
भारत के ग्रामीण अंचलों में भी बायोमेट्रिक मशीनें पहुंच गई है, जिसकी मदद से लोगों के थम्ब इम्प्रेशन लिए जाते हैं। सरकार द्वारा संचालित राशन दुकान पर धारक अपना अंगूठा मशीन पर रखता है और निश्चित राशि दुकानदार को मिल जाती है। यानी राशन पाने वाले व्यक्ति के खाते से वह राशि बहुत सुरक्षित तरीके से दुकानदार को हस्तांतरित हो जाती है। राशि हस्तांतरण का इससे बेहतर माध्यम क्या हो सकता है। इसमें भ्रष्टाचार भी नहीं है और सरकार के उस ‘लीकेज’ की बचत भी, जो दशकों तक भारत में हावी रहा था। आधार के जरिये यह तकनीक अपनाने वाला भारत अग्रणी देश बन गया है, ऐसा कई विकसित देशों में भी नहीं है।

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