Home »Bihar »Patna» Fact And Differnce About Toilet Soap And Bathing Soap

यकीन मानिए, आप भी शौच के बाद हाथ धोने वाले साबुन से नहाते हैं!

dainikbhaskar.com | Dec 17, 2012, 00:02 IST

  • हमारे दैनिक उपयोग में आने वाला एक महत्वपूर्ण उत्पाद है साबुन। साबुन रासायनिक और आयुर्वेदिक/हर्बल दो प्रकार के होते हैं। सामान्यत: हम टेलीविजन पर आने वाले विज्ञापनों को देख कर दैनिक उपयोग में आने वाले साबुन का चुनाव करते हैं। लेकिन, इनमें से ज्यादातर टॉयलेट सोप यानी कि शौच करने के बाद हाथ धोने वाले साबुन शामिल होते हैं। भारत में बहुत कम साबुन हैं जिन्हें बाथिंग सोप का दर्जा मिला हुआ है।


    आइए, हम आपको बताते हैं आप जिस साबुन से नहाते हैं, उनमें से कौन-कौन सा साबुन है बाथिंग बार और कौन सा है टॉयलेट बार। साथ ही आगे की स्लाइड्स में साबुन से जुड़ी कुछ रोचक चीजों के बारे में भी बताते हैं।

    ( और खबरों के लिए क्लिक करें )

    ये भी पढ़ें,

    PIX: दोस्तों ने बनाया मजाक, ये छोरी देश को दिलाएगी मिस यूनिवर्स का खिताब!

    PIX: वेश्यावृत्ति से जुड़ी एक ऐसी सच्चाई, जिससे बहुत लोग अंजान होंगे!

    PICS: मोनालिसा की 'बेशर्म' अदाएं, पोर्नस्टार सनी लियोनी भी शर्मा जाएं!

  • साबुन बनाने की प्रक्रिया में 3 महत्त्वपूर्ण घटक वसीय अम्ल ,कास्टिक सोडा और पानी होते हैं। वसीय अम्ल (FATTY ACID ), जिसका मुख्य स्रोत नारियल, जैतून या ताड़ के पेड़ होते हैं, इसे जानवरों की चर्बी से भी निकाला जाता है। इसे टालो(TALLOW ) कहते हैं जो की बूचड़खाने से मिलता है। टालो से निकले गए वसीय अम्ल अपेक्षाकृत सस्ते होते हैं। इस वसीय अम्ल(FATTY ACID ) से सोडियम लौरेल सल्फेट (SLS) का निर्माण होता है जो झाग बनाने में प्रयुक्त होता है।

    आगे की स्लाइड में जानें कैसे करेंगे आप जानवरों की चर्बी से बनाए साबुन की पहचान।

  • यदि आप शाकाहारी हैं और आपके साबुन में जानवरों की चर्बी के बारे में पता करना है तो साबुन के रैपर पर TALLOW शब्द देख लें। टैलो लिखा है तो वह साबुन आपके लिए नहीं है। आपको फिर बिना टैलो वाले साबुन का उपयोग करना चाहिए।

    आगे की स्लाइड में जानें टॉयलेट साबुन, जानवरों को नहाने के साबुन और बाथिंग सोप में कैसे करें पहचान।

  • साबुन के वर्गीकरण से पहले हम एक महत्त्वपूर्ण शब्द TFM के बारे में जान लें जो सामान्यत: हर साबुन के पैकेट के पीछे लिखा मिल जायेगा। "TFM " का मतलब TOTAL FATTY MATERIAL होता है जो कि साबुन का वर्गीकरण और गुणवत्ता का निर्धारण करता है। साबुन में जितना ज्यादा TFM का प्रतिशत होगा साबुन की गुणवत्ता उतनी ही अच्छी होगी। इस आधार पर हम साबुन को 3 भागों में बांट सकते हैं, जिनमें कार्बोलिक साबुन, टॉयलेट साबुन और नहाने का साबुन यानी बाथिंग बार होता है।


    आगे की स्लाइड में जानें कार्बोलिक साबुन का क्या होता है उपयोग।

  • CARBOLIC SOAP : इस साबुन को GRADE 3 SOAP की लिस्ट में रखा जाता है। इसमें TFM का प्रतिशत 50% से 60% तक होता है और यह साबुन सबसे घटिया दर्जे का साबुन होता है। इसमें फिनायल की कुछ मात्रा होती है जिसका उपयोग सामान्यत: फर्श या जानवरों के शरीर में लगे कीड़े मारने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। यूरोपीय देशों में इसे एनिमल सोप या जानवरों के नहाने का साबुन भी कहते हैं। साबुन के पीछे TFM का प्रतिशत देखकर आप खुद समझ जाएंगे कि आपका साबुन किस ग्रेड का है।

    आगे की स्लाइड में जानें टॉयलेट सोप के बारे में, जिससे ज्यादातर भारतीय नहाते हैं...

  • TOILET SOAP : इस साबुन को GRADE 2 SOAP की लिस्ट में रखा जाता है। गुणवत्ता के आधार पर दूसरे दर्जे का साबुन होता है। भारत में इस प्रकार के साबुन का उपयोग ज्यादातर लोग करते हैं। सामान्यतया इसका उपयोग शौच इत्यादि के बाद हाथ धोने के लिए होता है। इसमें 65% से 78% TFM होता है। कार्बोलिक साबुन की अपेक्षा इसके इस्तेमाल से त्वचा को कम नुकसान होता है। भारत में इस श्रेणी के कई उत्पाद हैं। आप खुद भी साबुन खरीदने से पहले रैपर को देख कर पढ़ सकते हैं।

    आगे की स्लाइड में जानें वास्तव में कौन सा साबुन है बाथिंग बार, जो नहीं पहुंचाता है आपको नुकसान।

  • BATHING SOAP: इस साबुन को GRADE 1 SOAP की लिस्ट में रखा जाता है। यह गुणवत्ता के आधार पर सर्वोत्तम साबुन है तथा इसका उपयोग स्नान के लिए किया जाता है। इस साबुन में TFM की मात्रा 76% से अधिक होती है। इस साबुन के रसायनों से त्वचा पर होने वाली हानि न्यूनतम होती है। इस लिस्ट में डव साबुन, पियर्स और निरमा के कुछ प्रोडक्ट को रखा जा सकता है।

    आगे की स्लाइड में जानें साबुन में इस्तेमाल किए जाने वाले केमिकल आंखों में चले जाएं तो क्या होगा।

  • बिहार के आरा के रहने वाले राणा रोहित कहते हैं कि अक्सर टीवी पर विज्ञापन देखकर हम साबुन खरीद लेते हैं। हममें से ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं होता है कि कौन सा साबुन बाथिंग सोप है और कौन सा साबुन टॉयलेट सोप।

  • साबुन में झाग के लिए इस्तेमाल होने वाले रसायन सोडियम लारेल सल्फेट से त्वचा की कोशिकाएं शुष्क हो जाती हैं और कोशिकाओं के मृत होने की संभावना रहती है। यह आंखों के लए अत्यंत हानिकारक है। नहाते समय साबुन यदि आँखों में चला जाये तो इसी रसायन के असर से हमे तीव्र जलन का अनुभव होता है, त्वचा पर खुजली और दाद की संभावना होती है। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि कोई भी रासायनिक साबुन त्वचा के लिए लाभदायक नहीं है। लेकिन, साबुन का उपयोग करना बंद नहीं किया जा सकता है ऐसे में हमें उसी साबुन का इस्तेमाल करना चाहिए जिसमें TFM की मात्रा 76% से ज्यादा हो।

  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
Web Title: Fact and differnce about Toilet soap and bathing soap
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
पढ़ते रहिए 5.5 करोड़ + रीडर्स की पसंदीदा और विश्व की नंबर 1 हिंदी न्यूज़ वेबसाइट dainikbhaskar.com, जानो ख़बरों से ज़्यादा।

Stories You May be Interested in

      More From Patna

        Trending Now

        पाएं लेटेस्ट न्यूज़ एंड अपडेट्स

        दैनिक भास्कर के ट्रेंडिंग खबरों के नोटिफिकेशन रखेंगे आपको अपडेट..

        * किसी भी समय ब्राउजर सेटिंग्स बदलकर नोटिफिकेशंस ऑफ कर सकते हैं.
        Top