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जानिए, क्या है नीतीश और नरेंद्र मोदी के बीच 'सियासी लड़ाई' का सच!

अजय कुमार | Dec 05, 2012, 00:01 IST

  • Cartoon of Nitish Kumar and Narendra Modi

    पटना। साल 2012 बिहार और गुजरात के सत्ताधारी दलों के बीच बयानों की तपिश के लिए भी याद किया जाएगा। यह ऐसी तपिश है जिसकी आंच आने वाले सालों में न सिर्फ महसूस की जाएगी बल्कि इसके सियासी इम्पैक्ट भी दिखेंगे। वास्तव में यह लड़ाई नीतीश बनाम नरेंद्र मोदी की हो गयी है।

    राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि 2014 के लोकसभा चुनाव तक नरेंद्र मोदी को लेकर राजनीति गरमाती रहेगी। राज्य के मौजूदा राजनीतिक- सामाजिक समीकरणों में नरेंद्र मोदी जदयू यानी नीतीश कुमार के लिए सहज नहीं हैं। आखिर क्या है वजह?

    आइये इसके बारे में आगे की स्लाड्स में कुछ अहम वजहों पर डालते नजर:

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  • Nitish Kumar

    जदयू को अपनी छवि प्यारी : जदयू चाहता है कि उसकी धर्मनिरपेक्ष छवि पर कोई बट्टा नहीं लगे। उसकी यह कोशिश भाजपा के साथ गंठबंधन और बिहार की सत्ता चलाते हुए करनी है। जाहिर है यह काम थोड़ा मुश्किल है पर दोनों दलों ने इस मुद्दे पर अपनी सीमाएं भी तय कर रखी है। यही वजह है कि मामला बयानों से आगे नहीं बढ़ पाता। भाजपा का एक धड़ा जहां मोदी को अपना लीडर मानने से गुरेज नहीं करता, वहीं जदयू हिंदुत्व की छवि से खुद को दूर रखना चाहता है।

  • Nitish Kumar

    मुस्लिम वोटों पर नीतीश की नजर : इसे जदयू किसी भी हाल में अपने दायरे से बाहर नहीं जाने देना चाहता। लालू प्रसाद के वोट बैंक में यह आबादी बड़ी भूमिका अदा करती रही है। यादव 10 परसेंट हैं और मुस्लिम आबादी 16 परसेंट। समीकरण के हिसाब से कहें तो इन दोनों समूह ने ही लालू प्रसाद को लंबे समय तक सत्ता से टिकाये रखा था। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मालूम है कि किसी भी राजनैतिक चूक का उन्हें बड़ा नुकसान हो सकता है। यही वजह है कि उन्होंने मुस्लिम आबादी के विकास और उत्थान के लिए उनके लिए कई योजनाएं शुरू की। ऐसा कर वह जताना चाहते हैं कि लालू प्रसाद छद्म धर्मरिनपेक्षता के लंबरदार हैं और वे वास्तविक हितैषी।

  • Nitish Kumar

    पीएम पद की दावेदारी : अब जबकि भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने कह दिया कि नरेंद्र मोदी पीएम पद के उम्मीदवारों में शामिल हैं तो जदयू की रणनीति लोकसभा सीटों को अधिक से अधिक अपनी झोली में डालने पर नजर है। जदयू की समझ है कि अगर बिहार की 40 संसदीय सीटों में से उसके खाते में अधिक सीटें आती हैं तो पीएम पर उसकी दावेदारी मजबूत होगी। जदयू के अंदरखाने में माना जा रहा है कि कोई भी राजनैतिक गठबंधन नरेंद्र मोदी की जगह नीतीश कुमार को तवज्जो देगा। लोकसभा के पिछले चुनाव में जदयू ने 20 सीटों पर कब्जा जमाया था। जदयू की कोशिश है कि इन सीटों को 30 के आंकड़े के पार किया जाए।

  • Nitish Kumar & george fernandise

    सामाजिक आधार का सवाल: प्रेक्षक मानते हैं कि राजद और जदयू का सामाजिक आधार लगभग एक जैसा है। 1995 के विधान सभा चुनाव के ठीक पहले जॉर्ज फर्नांडीज और नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद से बगावत समता पार्टी बनायी थी। पर उस चुनाव में नीतीश कुमार को सात सीटें ही मिल सकी थी। नीतीश की उस हार की बड़ी वजह लालू प्रसाद के सामाजिक आधार को नहीं बेध पाना था। करीब एक दशक की मशक्कत के बाद नीतीश कुमार ने पिछड़ों, अति पिछड़ों, सवर्णो, दलितों और अल्पसंख्यकों को मिलाकर एक समुच्चय बनाने में कामयाब हुए।

  • Narendra modi in Patna with Bihar BJP leaders

    नरेंद्र मोदी और सत्ता में रहने का द्वंद्व है भाजपा पर भारी

    नरेंद्र मोदी को लेकर कम से कम बिहार में भाजपा की दुविधा उजागर हो चुकी है। वह यह तय नहीं कर पा रही है कि उसे नरेंद्र मोदी का समर्थन किस हद तक करना है। लिहाजा, इस मसले पर पूरे साल भाजपा का अंतरविरोध सामने आता रहा। पार्टी के कुछ लोग जहां नरेंद्र मोदी पर उतने मुखर नहीं हो पाते तो दूसरी ओर एक धड़ा राजधानी में मोदी का बर्थ डे केक काट नीतीश कुमार की राजनीतिक लाइन को खुल्लम-खुल्ला चुनौती देता है।

  • ABVP

    तुष्टीकरण बनाम संतुष्टीकरण: जदयू के साथ सत्ता में आने के बाद नीतीश कुमार ने अल्पसंख्यकों के लिए कई योजनाएं चलायी। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के मुद्दे पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का तीखा विरोध सामने आया तो इसके पीछे सत्ता का मोह ही माना जा रहा है। सत्ता में आने से पहले संघ या भाजपा का मुख्य एजेंडा राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठ और लालू राज का अल्पसंख्यकों के प्रति तुष्टीकरण का था। लेकिन अब इस मुद्दे से भाजपा ने लगता है कि खुद को अलग कर लिया है। या इसके विरोध का जिम्मा अपने छात्र या अन्य संगठनों को सौंप दिया है। ( फोटो कैप्शन: नीतीश का विरोध करते ABVP कार्यकर्ता )

  • Sushil Modi

    सामाजिक समीकरण के विस्तार की रणनीति: बिहार की सत्ता में आने के बाद भाजपा अपने मातृ संगठनों के सहारे सामाजिक आधार को विस्तार-समृद्ध करने की दिशा में गंभीरता के साथ प्रयास कर रही है। राज्य में भाजपा का सामाजिक आधार सवर्ण माने जाते रहे हैं। पर सत्ता में बने रहने के लिए अकेले यह आधार अब कारगर नहीं होगा। इसलिए उसने अति पिछड़ों और दलितों को अपने साथ लाने की रणनीति शुरू की। मध्यवर्ती जातियों मे से कुछ लोगों को विधान परिषद में भेजा जाना इसका सटीक उदाहरण माना जा सकता है। विधानसभा के पिछले चुनाव में भाजपा को पहली बार जबरदस्त कामयाबी 91 सीटें हासिल कर मिली।

  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
Web Title: Truth about Bihar CM Nitish and Gujrat CM Narendra Modi political fight
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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