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मुस्लिम औरतों के लिए अभिशाप है तीन तलाक: सलमा आगा

Bhaskar News Network | Oct 19, 2016, 02:30 AM IST

मुस्लिम औरतों के लिए अभिशाप है तीन तलाक: सलमा आगा
समाज सुधार के नाम पर दोबारा नहीं लिख सकते मुस्लिमों के पर्सनल लॉ

फिल्म निकाह से भारतीय हिंदी फिल्मों में इंट्री लेने वाली पाकिस्तानी मूल की अभिनेत्री सलमा आगा तीन तलाक के खिलाफ हैं। वह कहती हैं तीन तलाक मुस्लिम औरतों के लिए अभिशाप है। इससे इन्हें मुक्ति मिलनी चाहिए। तीन तलाक की इजाजत तो कुरआन भी नहीं देता है। मैं शुरू से ही तीन तलाक के खिलाफ रही हूं। मंगलवार को एक कार्यक्रम में शामिल होने चतरा पहुंची सलमा आगा ने कहा कि इस मसले को तो उन्होंने बहुत पहले ही उठाया था। उनकी पहली फिल्म निकाह इसी मसले पर आधारित है। बहुत कम लाेगों काे पता है कि फिल्म निकाह का नाम पहले “तलाक तलाक तलाक” ही रखा गया था।

लेकिन कुछ कारणाें से बाद में इस फिल्म का नाम बदल कर निकाह कर दिया गया। पिछले कई सालों से ब्रितानी नागरिक रहीं सलमा आगा को हाल ही में भारत सरकार ने ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया कार्ड दिया है। 1980 के दशक में ही बॉलीवुड में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के बाद भी उन्होंने इतनी देर से ओसीआई क्यों लिया।



सलमा कहती हैं दरअसल हिंदुस्तान का माहौल इतना पुरसकुन है कि उन्हें इसकी कभी जरूरत ही महसूस नहीं हुई। लेकिन जब उनके बच्चों ने उनसे यह कहा कि जहां हम रहते हैं, वहां की नागरिकता तो होनी ही चाहिए तो उन्होंने ओसीआई के लिए दरख्वास्त लगा दिया। यह आसानी से मिल भी गया।

तीन तलाक खत्म हो

तीन
तलाक प्रथा बंद होनी चाहिए क्योंकि यह महिलाओं को नुकसान पहुंचा रही है। विधि आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक की प्रथा पर जनता से राय मांगी है और चर्चा कराने की बात कही है। चर्चा के बाद सरकार ने यह मत दिया है कि तीन तलाक महिलाओं के हित में नहीं है। -वैंकेया नायडू, केंद्रीय मंत्री





नायडू का यह बयान इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्यों समेत कई मुस्लिम संगठन और नेता इस बात पर जोर दे रहे हैं कि शरिया कानून बदला नहीं जा सकता। केंद्र सरकार को तीन तलाक के मुद्दे पर जनमत संग्रह कराने की सलाह देते हुए ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के जफरयाब जिलानी ने हाल ही में दावा किया था कि 90 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं शरिया कानून का समर्थन करती हैं। सात अक्टूबर को केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिमों में जारी तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह प्रथाओं का विरोध किया था और लैंगिक समानता एवं धर्मनिरपेक्षता के आधार पर इनपर दोबारा गौर करने की वकालत की थी। कानून एवं न्याय मंत्रालय ने अपने हलफनामे में लैंगिक समानता, धर्मनिरपेक्षता, अंतरराष्ट्रीय नियमों, धार्मिक प्रथाओं और विभिन्न इस्लामी देशों में मार्शल लॉ का उल्लेख करते हुए कहा कि शीर्ष अदालत को तीन तलाक और बहुविवाह के मुददे पर नए सिरे से निर्णय देना चाहिए।

धर्मग्रंथों की बातों से अपनी व्याख्या नहीं निकाल सकता कोर्ट:बोर्ड

हलफनामे में बोर्ड ने कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर मुस्लिमों के पर्सनल लॉ दोबारा नहीं लिखे जा सकते हैं। संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 29 में भी इन प्रथाओं को संरक्षण मिला है। बोर्ड ने कहा कि धर्मग्रंथों में लिखी बातों से अदालत अपनी व्याख्या नहीं निकाल सकती है।

बोर्ड ने कहा कि आपराधिक न्यायिक प्रक्रिया और घरेलू हिंसा से महिलाओं की रक्षा संबंधी कानून और मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों की रक्षा) कानून के तहत महिलाओं को पर्याप्त कानूनी रास्ते मिले हुए हैं।

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Web Title: मुस्लिम औरतों के लिए अभिशाप है तीन तलाक: सलमा आगा
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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