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अनोखी घटना से शुरू ये प्रेम कहानी, युद्ध में भगवान की दखल के बाद खत्म हुई

dainkbhaskar.com | Sep 15, 2013, 00:31 IST

  • ये प्रेम कहानी छत्तीसगढ़ में काफी लोकप्रिय है और यहां हर कोई इस कहानी के बारे में जानता है। एक अनोखी घटना से शुरू हुई ये कहानी एक युद्ध पर आकर खत्म हुई। लगभग दो हजार साल पहले उज्जैन राज्य से अलग हुए ढोंगरी, वर्तमान में छत्तीसगढ़ के ढोंगरगढ़ जिले में इस प्रेमकहानी के बारे कई मान्यताएं प्रचालित हैं। dainkbhaskar.com छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध प्रेमकहानियों की सीरीज में इस बार प्रसिद्ध नर्तकी कामकंदला और संगीज्ञ माधवनाल की अमर प्रेम कहानी बताने जा रहे हैं।

    लगभग दो हजार साल पहले राजा कामसेन की वैभवशाली नगरी कामख्या में राजनृर्तकी कामकंदला बहुत प्रसिद्ध थी। उनकी सुंदरता और नृत्य की चर्चा चारों तरफ होती थी। एक बार राजभवन में कामकंदला नृत्य कर रही थी। उसी समय माधवनाल पहुंचे, लेकिन दरबारियों ने उन्हें अंदर नहीं आने दिया। माधवनाल वहीं बैठकर संगीत का आनंद लेने लगे।

    आगे की स्लाइड पर क्लिक कर पढ़ें कि किस अनोखी घटना की वजह से ये दोनों मिले और हर प्रेमकहानी की तरह इन्हें भी मिलने के लिए संघर्ष करना पड़ा-

  • माधवानाल प्रसिद्ध संगीतज्ञ थे, उन्होंने भांप लिया कि तबला का बायां अंगूठा नकली है और नर्तकी के पैरों के घूंघरूओं मे से एक घूंघरू में कंकड़ नहीं है। इससे ताल में अशुद्धि आ रही है। तो वह बोल पड़े 'मैं व्यर्थ ही यहां चला आया। यहां के राजदरबार में एक भी ऐसा संगीतज्ञ नहीं है जो ताल की अशुद्धियों को पहचान सके।'

    द्वारपाल ने उस अजनबी से अपने राजा और राज दरबार के बारे में ऐसा सुना तो उसे तत्काल रोका। वह तुरंत राज दरबार में गया और राजा को सारी बात सुनाई। राजा की आज्ञा पाकर द्वारपाल उन्हें सादर राज दरबार में ले आया।
    उनके कथन की पुष्टि होने पर उन्हें संगत का मौका दिया गया।
    उनकी संगत में कामकंदला नृत्य कर रही थी। ऐसा लग रहा था मानो राग रागनियों का संगम हो रहा हो। तभी अचानक एक भौंरा कामकंदला के वक्ष पर आकर बैठ गया। थोड़े समय के लिए कामकंदला का ध्यान बंटा जरूर मगर नृत्य चातुर्य से वह भौंरे को अपने वक्ष से उड़ाने में सफल हो गयी।

  • किसी ने इसे देखा या नहीं मगर संगत कर रहे माधवानल की नजर से यह बच न सका। इस घटना ने मानो माधवानल को कामकंदला का दीवाना बना दिया। दोनों में प्रेम हो गया जो राजकुमार मदनादित्य को अच्छा नहीं लगा। एक बार राज दरबार में माधवानल के संगत में कामकंदला नृत्य कर रही थी।

  • इससे राजा ने प्रसन्न होकर माधवानल को पुरस्कार दिया लेकिन राजा के द्वारा दिया गया पुरस्कार को उन्होंने राज नर्तकी को दे दिया। इससे राजा कुपति हो गए। राजा ने उन्हें तत्काल राज्य की सीमा से बाहर जाने का आदेश दिया। इस घटना के बाद कामकंदला और माधवानाल अलग-अलग हो गए।

  • माधवानल से कामकंदला भी आसक्त हो गयी। लेकिन दोनों का मेल बहुत मुश्किल था। तब उन्होंने उज्जयनी के राजा विक्रमादित्य की शरण ली और उनसे दया और सहयोग की फरियाद की। राजा विक्रमादित्य ने उन्हें न्याय दलिाकर दोनों में मेल कराया।
  • यहां ऐसी किंवदंती प्रचलित है कि माधवानल को न्याय दिलाने के लिए उन्हें कामावती के राजा से युद्ध करना पड़ा था जिसे रोकने के लिए मां भवानी और महादेव को आना पड़ा था। डोंगरगढ़ का 'कामकंदला-माधवानल सरोवर' इसका साक्षी है।

  • छत्तीसगढ़ के प्रसद्धि साहत्यिकार स्व. हरि ठाकुर ने कामकंदला-माधवानल की किंवदंती को छत्तीसगढ़ की लोककथा कहा है और इसे ढोला-मारू और लोरिक-चंदा के साथ जोड़ने का प्रयास किया है। प्राचीन नाटककार आनंदधर ने संस्कृत में माधवानल नाटक की रचना की थी। सन् 1583 में अकबर के दरबारी कवि आलम ने इस कथा को पद्यबद्ध किया। 'माधवानल की कथा' नामक सन् 1755 में लिखे एक हस्तलखिति पुस्तक बनारस के एक पुस्तकालय में संग्रहीत है।

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Web Title: real love story kamkandla madhvanal king vikramaditya kamsen
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