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टीचर.. स्कूलों से गायब, कालेजों में ‘मेहमान’

संजीव पाण्डेय | Sep 05, 2012, 03:38 IST

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बिलासपुर.शिक्षक दिवस पर विद्यार्थी न सिर्फ शिक्षकों का सम्मान करेंगे, बल्कि उनके गुणों का बखान भी करेंगे, लेकिन उन स्कूलों का क्या, जहां शिक्षक हैं ही नहीं। राज्य माध्यमिक शिक्षा मिशन से वर्ष 2011 में खुले 117 में से 70 स्कूल ऐसे हैं, जहां शिक्षक तो दूर, प्रिंसिपल तक की पोस्टिंग नहीं की गई है। अब ऐसे में शिक्षक दिवस और शिक्षा का अधिकार, सब-कुछ स्कूली छात्र-छात्राओं के साथ मजाक ही लगता है। केंद्र सरकार के सहयोग से राज्य माध्यमिक शिक्षा मिशन ने वर्ष 2010-11 में अविभाजित बिलासपुर जिले को 117 हाईस्कूल की सौगात दी। ग्रामीण बच्चे शिक्षा से महरूम न रहें, इसलिए अगस्त 2011 में सभी स्कूल शुरू कर दिए गए। इस समय स्कूल के सेटअप को मंजूरी तक नहीं मिली थी। ऐसे में मिडिल स्कूल के शिक्षकों को अध्यापन की जिम्मेदारी दी गई। मान भी लिया गया कि शिक्षकों की व्यवस्था आनन-फानन में कर पाना संभव नहीं है। इन स्कूलों में पढ़ने वाले हजारों बच्चों ने उधार में मिले एक या दो शिक्षकों के भरोसे 9वीं कक्षा की पढ़ाई पूरी कर ली। अब सभी वे 10वीं बोर्ड कक्षा में पहुंच गए हैं, इसके अलावा हाईस्कूल की कक्षा भी बढ़ गई है। ऐसे में मिडिल स्कूल के एक या दो शिक्षक के भरोसे पढ़ाई संभव नहीं है। मिडिल स्कूल के शिक्षकों ने भी हाईस्कूल से नाता तोड़ लिया है। वैसे भी राज्य में शिक्षा का अधिकार लागू है, जिसके हिसाब से हाईस्कूल की पढ़ाई व्याख्याता या फिर शिक्षाकर्मी वर्ग-1 के सहारे ही होगी। स्कूल शिक्षा विभाग ने जून में अपर डिवीजन टीचर और हैडमास्टर को प्रमोशन देकर व्याख्याता बना दिया। इनकी पदस्थापना शिक्षा मिशन के स्कूलों में हुई। शहरी ही सही, शिक्षा मिशन के तकरीबन 50 स्कूलों में एक या दो शिक्षकों की पदस्थापना हो गई। अब समस्या उन 70 स्कूलों का है, जहां शिक्षक तो दूर, प्रिंसिपल तक की पदस्थापना नहीं हुई है। ऐसे स्कूल के बच्चों के लिए शिक्षक ‘विलुप्त’ हैं और वे शिक्षक दिवस के महत्व को जानते हुए भी इससे अनजान बने रहेंगे। जरूरत नहीं, फिर भी की गई पोस्टिंग: हाईस्कूल खमतराई में पांच व्याख्याता और एक प्रिंसिपल की पदस्थापना पहले से है। यहां भी स्थिति ऐसी है कि सेटअप की पूर्ति संख्या के आधार पर हो गई है, लेकिन गणित और अंग्रेजी के शिक्षकों की कमी है। इसके बाद भी जिला पंचायत ने कला संकाय की व्याख्याता पंचायत अनिता साहू और हिंदी विषय के पूनम तिवारी का ट्रांसफर खमतराई कर दिया। शेष पेज 17 अतिशेष शिक्षकों का वेतन माध्यमिक शिक्षा मिशन से जारी नहीं होगा, लिहाजा प्राचार्य ने इन शिक्षाकर्मियों को ज्वाइनिंग देने से मना कर दिया। दोनों शिक्षाकर्मी ग्रामीण स्कूल से हटाकर शहरी स्कूल में भेजे गए। शिक्षकों का सेटअप दरकिनार शहर से लगे हाईस्कूल परसदा में पिछले शिक्षण सत्र में ही 5 व्याख्याता और एक प्रिंसिपल की पदस्थापना हुई। हाईस्कूल के लिए शासन से जारी सेटअप विषय न सही संख्या के आधार पर पूरी हो गई। गांव विधानसभा अध्यक्ष का है, लिहाजा पिछले सत्र तक हाईस्कूल की सुविधा पाने वाले गांव में इस साल हायर सेकेंड्री स्कूल भी खुल गया। इस हिसाब से यहां 11 व्याख्याताओं की पदस्थापना होनी चाहिए। जिला पंचायत ने पिछले दिनों ट्रांसफर के सहारे यहां 4 व्याख्याताओं (पंचायत) को पदस्थ कर दिया। अब यहां 9 व्याख्याता हैं, जिनमें एक ही विषय के दो-दो व्याख्याता हैं। स्कूल में प्राचार्य तो मिले नहीं और प्रभारी प्राचार्य आरएस राजपूत ने किसी तरह की जानकारी देने से मना कर दिया। बातों-बातों में खुलासा हो गया कि व्याख्याता पंचायत की पदस्थापना विषयवार नहीं की गई है। इसके चलते यहां गणित और बायोलॉजी जैसे अहम विषयों के शिक्षकों की कमी है। ट्रांसफर सिर्फ उन स्कूलों में, जहां शिक्षक हैं सरकारी स्कूल का संचालन स्कूल शिक्षा विभाग के जिम्मे है, लेकिन शिक्षकों की व्यवस्था जिला पंचायत की जिम्मे है। ऐसा इसलिए है कि स्कूल शिक्षा विभाग सीधी भर्ती नहीं कर सकता। शिक्षकों के स्थान पर शिक्षाकर्मियों की नियुक्ति होनी है, जिनकी भर्ती का अधिकार जिला पंचायत के पास है। जिला पंचायत अपने इन्हीं अधिकारों का इस कदर दुरुपयोग कर रही है कि सरकारी स्कूल खाली होते जा रहे हैं। जिला पंचायत शिक्षाकर्मियों की पदस्थापना जरूरत के बजाय सिफारिश के आधार पर करने लगी है। दैनिक भास्कर ने इसी अव्यवस्था को उजागर करने के लिए शहर से लगे उन हाईस्कूलों का दौरा किया, जो पिछले साल राज्य माध्यमिक शिक्षा मिशन से खोले गए। बंद हो गया एक स्कूल ऐसा नहीं है कि शहरी स्कूलों में शिक्षकों की पर्याप्त व्यवस्था का विरोध किया जा रहा है। सवाल ट्रांसफर से शहरी स्कूल पहुंचने वालों का भी नहीं, बल्कि उन ग्रामीण स्कूलों का है, जहां पढ़ने वाले शिक्षक को तरस रहे हैं। जहां शिक्षक पर्याप्त हैं, वहां और शिक्षक भेजे जा रहे हैं, जबकि शिक्षकविहीन स्कूल शिक्षक को मोहताज है। कोटा का बगधरा स्कूल शिक्षक न होने के कारण ही बंद हो गया। अब स्कूल भवन में आंगनबाड़ी चलती है। यहां शिक्षक जरूरत से ज्यादा उसलापुर के स्कूल शिक्षकों के मामले में इतने धनी हैं कि यह बच्चों के बजाय शिक्षकों का स्कूल नजर आता है। यहां हाईस्कूल के लिए 6+1 का सेटअप है, जिसके विपरीत 1 प्रिंसिपल सहित 7 व्याख्याता कार्यरत हैं। हायर सेकेंडरी में 5 व्याख्याताओं की दरकार है, जिसमें 3 की नियुक्ति हो गई है। इसी परिसर में मिडिल स्कूल भी है, जहां 14 शिक्षक पदस्थ हैं। 13 शिक्षक पहले से थे, जहां जिला पंचायत ने ट्रांसफर के सहारे एक और शिक्षक को पदस्थ कर दिया। मिडिल स्कूल की दर्ज संख्या 347 है। शिक्षा का अधिकार कानून का अक्षरश: पालन किया जाए तो भी 40 बच्चों पर एक शिक्षक के हिसाब से 9 की जरूरत होगी। शिक्षाकर्मियों को भेजा वापस: महमंद हाईस्कूल का हाल भी कुछ ऐसा ही है। यहां जिला पंचायत ने 4 शिक्षाकर्मियों का ट्रांसफर किया है, जबकि जरूरत दो की थी। यहां भी प्रिंसिपल ने दो शिक्षाकर्मियों को ज्वाइनिंग दी, जबकि दो को वापस जिला पंचायत के हवाले कर दिया।
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Web Title: Mission secondary education without the state's 70
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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