» The Crowd Triggered Violence At India Gate

भीड़ के हिंसक होने के बाद हुआ लाठीचार्ज

Dainikbhaskar.com | Dec 24, 2012, 12:18 IST

  • नई दिल्ली.दिल्‍ली में चलती बस में गैंगरेपके खिलाफ हुई 'युवा क्रांति' रविवार को हिंसक हो गई और सोमवार को आंदोलन की धार भी कुंद पड़ गई। शनिवार और रविवार को हजारों की संख्‍या में युवा सड़कों पर उतर गए थे। फिर यह आंदोलन कैसे हिंसक हो गया, यह बड़ा सवाल है। सरकार ने आंदोलनकारियों पर सख्‍ती की और अब इसकी जांच कराने का ऐलान भी हो गया है। आज आंदोलन कुंद भले ही हो गया है, पर यह कई सबक दे गया है।
    1. सोशल साइट्स से नहीं सफल हो सकता कोई आंदोलन
    फेसबुक पर ‘हैंग द रेपिस्ट’ नाम से एक पेज बनाया गया और लोगों से 22 दिसंबर को इंडिया गेट पर जुटने का आह्वान किया गया। फेसबुक और एसएमएस के जरिए किए गए आह्वान पर राजपथ पर कुछ युवा जुटे। उनके बीच वे लोग भी शामिल हो गए जो वीकेंड पर इंडिया गेट घूमने आए थे। इस तरह उनकी तादाद अच्‍छी-खासी हो गई। मीडिया ने भी उनके आंदोलन का अच्‍छा कवरेज किया। ऐसे में भीड़ और युवाओं का उत्‍साह बढ़ता गया। लेकिन आंदोलन करने वाले संगठित नहीं थे। 'फेसबुक फ्रेंड्स' की अपील पर जुटे युवा वहां भी गुट तक ही सीमित रह गए और आंदोलन दिशाहीन हो गया।
    रविवार को इंडिया गेट पर हुए युवाओं के प्रदर्शन और उसके बाद हुए बर्बर लाठीचार्ज की एक बड़ी वजह भी यह रही कि असंगठित युवाओं के प्रदर्शन में जिसने जो चाहा, किया। कई युवा तोड़फोड़, मारपीट, पत्‍थरबाजी पर उतर गए। उन्‍हें रोकने वाला कोई नहीं था। सो, पुलिस ने उन पर जबरदस्‍त सख्‍ती की। (देखें रविवार के प्रदर्शन की 125 तस्वीरें)

  • रविवार को ये हुआ
    दैनिकभास्‍कर.कॉम की टीम रविवार को दिन भर राजपथ और इंडिया गेट इलाके में रही। रविवार सुबह ठीक साढ़े 6 बजे राष्ट्रपति भवन के सामने प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया था। इन युवाओं को पुलिस ने बसों में भरकर राजधानी दिल्ली के बाहर भेज दिया था। लेकिन फिर भी इन्होंने पुलिस के खिलाफ नारेबाजी नहीं की थी। एक बार फिर इंसाफ मांगते हुए ये युवा जैसे-तैसे इंडिया गेट पहुंचे थे। पुलिस ने इंडिया गेट पर लोगों को पहुंचने से रोकने के लिए दिल्ली के 7 मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए थे। फिर भी युवा पैदल ही छोटे-छोटे समूहों में इंडिया गेट पहुंच रहे थे। युवाओं के हाथों में इंसाफ की मांग के बैनर थे।
    11 बजे तक इंडिया गेट के चारों ओर पुलिस की बैरीकेंडिग थी। धारा 144 लागू थी लेकिन फिर भी पुलिस युवाओं को संगठित होने और प्रदर्शन करने से नहीं रोक रही थी। लगभग 11 बजकर दस मिनट पर युवाओं का एके समूह बैरीकेंडिंग तोड़ते हुए इंडिया गेट पर दाखिल हुआ। यह समूह 'वी वांट जस्टिस' के नारे लगा रहा था।
    इसके साथ ही इंडिया गेट पर चारों और चक्कर लगाकर नारेबाजी कर रहे युवा प्रदर्शनकारियों के अन्य समूह भी इंडिया गेट पर दाखिल होने शुरू हुए और यहां भीड़ बढ़ने लगी। ज्यादातर युवा छोटे-छोटे समूहों में थे और एक दूसरे से अपरिचित थे। इंडिया गेट पर भीड़ को लीड करने वाला कोई नेता नहीं था। दोपहर बारह बजे तक नारेबाजी में न्याय और बलात्कारियों को फांसी चढ़ृाने की बात की जा रही थी।
    इसी बीच दिल्ली पुलिस ने इंडिया गेट पर प्रदर्शन की इजाजत दे दी। यहां भीड़ लगातार बढ़ रही थी। छात्र संगठन आइसा (एआईएसए), एबीवीपी और एनएसयूआई के सदस्य भी अपने-अपने बैनर लिए पहुंचने लगे। राजपथ के एक ओर आम आदमी पार्टी का समूह प्रदर्शन कर रहा था तो इंडिया गेट पर अस्मिता थिएटर से जुड़े युवा नारेबाजी कर रहे थे।
    लेकिन इंडिया गेट का माहौल उस वक्त खराब हुआ जब प्रदर्शनकारियों की भीड़ अचानक राष्ट्रपति भवन की ओर बड़ी और पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े। भीड़ ने बैरीकेडिंग तोड़ दी और पुलिसवालों पर पत्थरबाजी की। इसके बाद पुलिस ने भी जवाबी कार्रवाई की। कई बार भीड़ पर फायर किए गए आंसू गैस के गोलों को उठाकर पुलिस की ओर ही फेंक दिया गया जिस कारण पुलिस को पीछे हटना पड़ा।
    अलगाव और नेतृत्‍वविहीनता के चलते आंदोलनकारी भीड़ अराजक हो गई थी। तो एक सबक यह भी है कि बिना नेता के कोई आंदोलन सफल नहीं हो सकता।
  • बिना किसी मकसद के आंदोलन को सफल नहीं बनाया जा सकता
    राजपथ और इंडिया गेट के पास जुटे आंदोलनकारियों का कोई स्‍पष्‍ट लक्ष्‍य नहीं था। दैनिकभास्‍कर.कॉम की टीम जब इस इलाके में लोगों के मूड का जायजा ले रही थी, तो पता चला कि वहां पहुंचा हर युवा इंसाफ की मांग तो कर रहा था, लेकिन निजी बातचीत में वहां आने और रुकने का अलग-अलग मकसद बयां कर रहा था। राजनीतिक पार्टियों से जुड़े लोग अलग-अलग समूह में भाषणबाजी कर रहे थे, तो युवाओं का भी अलग-अलग गुट था। जिनका कोई गुट नहीं था, वे अपनी पसंद के मुताबिक समूह से जुड़ने के लिए इधर-उधर भटक रहे थे।
    वहां जो नारे लग रहे थे, उनसे भी साफ था कि आंदोलनकारियों का कोई एक स्‍पष्‍ट लक्ष्‍य नहीं था। कोई दिल्ली पुलिस के जवानों को सुना कर नारा लगा रहा था, 'ये बात पक्की है, दिल्ली पुलिस छक्की है' तो कोई कह रहा था, 'दिल्ली में सेफ कौन, शीला और सोनिया' और 'दिल्ली पुलिस एक काम करो चूड़ी पहनकर आराम करो।'
    नारेबाजी में राहुल गांधी, सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और केंद्र सरकार पर भी निशाना साधा जा रहा था। अन्ना आंदोलन के दौरान सुना गया नारा, 'सारा यूथ यहां हैं, राहुल गांधी कहां है' भी फिजाओं में गूंजने लगा।
  • जनता पर पड़ी लाठियां, उत्पाती चुपके से निकल लिए
    टीम अन्‍ना का आंदोलन हो या फिर राजपथ पर युवाओं का वर्तमान आंदोलन, यह सभी आंदोलन वक्‍त के थपेड़े नहीं सह पाते हैं और इनकी भ्रूण हत्‍या हो जाती है। ये पुलिस की सख्‍ती नहीं सह पाते। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि ऐसे आंदोलनों के पीछे कोई एक संगठन नहीं होता है। लोग जुटते जाते हैं और आंदोलन बढ़ता जाता है। कोई फेसबुक के माध्‍यम से आता है तो कोई एसएमएस के माध्‍यम से। लेकिन ऐसी भीड़ को लीड करने वाले नेता का अभाव ही ऐसे आंदोलन की मौत का
    जिम्‍मेदार बनता है। हर व्‍यक्ति भावनाओं में बहकर प्रदर्शन में शामिल तो हो जाता है लेकिन इसे आगे नहीं बढ़ा पाता है। इसके अलावा ऐसे आंदोलनों में समाज विरोधी ताकतों का घुसना भी बड़ा आसान रहता है। कौन किस भेष में यहां आ रहा है, इसका पता लगाना बहुत मुश्किल होता है।
    दिल्‍ली में गैंगरेप पीडि़त को न्‍याय दिलाने के लिए हुए आंदोलन में भी ऐसा ही हुआ। रविवार को व्‍यक्ति आधारित संगठनों, समाजसेवा के नाम पर अच्‍छा जनाधार खड़ा करने वाली शख्‍सीयतों, राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों और कुछ असामाजिक तत्‍वों के घुसने के चलते ही मामला बिगड़ा।
    इन स्‍वार्थी तत्‍वों ने उत्‍पात मचा कर पूरे आंदोलन की दिशा बिगाड़ दी और पुलिस को भी सख्‍ती के लिए मजबूर किया। आम जनता वहां पुलिसिया कहर का शिकार बनी और उत्‍पाती धीरे से निकल गए।
    किसी भी आंदोलन की सफलता के लिए यह जरूरी है कि उससे जुड़ने वाले लोगों का अपना अलग मकसद नहीं हो।
  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
Web Title: The Crowd triggered violence at India Gate
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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