Home »Haryana »Ambala» PIX: The Seven Gurdwaras 350 Years Old History Of The Guru Is Still Alive

इन सात गुरुद्वारों में आज भी जिंदा है गुरू गोबिंद सिंह का 350 साल पुराना इतिहास

bhaskar news | Jan 19, 2013, 00:03 IST

  • अम्बाला.गुरू गोबिंद सिंह के 348वें प्रकाश उत्सव पर पूरे शहर में एक अलग ही लहर फैली थी। लोगों ने इसे बहुत ही धूम-धूम से मनाया। आज हम आपको इस खबर के जरिए देश में स्थित कुछ ऐसी जगहों के बारे में बताएंगे जहां पर आज भी गुरूजी का इतिहास जीवंत है।

    भास्कर डॉट कॉम के जरिए आप जान सकेंगे अंबाला में स्थिति ऐसे सात गुरूद्वारों के बारे में जो ना केवल हर सिक्ख बल्कि प्रत्येक देशवासी के लिए गौलव का प्रतीक हैं। दसवीं पातशाही गुरु गोबिंद सिंह जी का ननिहाल अम्बाला के लखनौर साहिब में है।

    बाल्यकाल में गुरु जी लंबे समय तक ननिहाल रहे। उनसे जुड़ी साढ़े तीन सौ साल से भी ज्यादा पुरानी चीजें आज भी सहेजी गई हैं। उल्लेखनीय यह है कि अम्बाला में सात ऐसे गुरुद्वारे हैं, जिनके साथ गुरु जी का इतिहास जुड़ा है।

    गुरु गोबिंद सिंह के प्रकाशोत्सव के उपलक्ष्य में दैनिक भास्कर कुछ सिख संगठनों के सहयोग से गुरु जी से जुड़ी कुछ जानकारियां यहां दे रहा है।

    आगे की तस्वीरों पर क्लिक करके जानिए कौन से हैं ये सात गुरूद्वारे और कौन सी यादें जुड़ी हैं इनके साथ...

  • गुरुद्वारा लखनौर साहिब
    लखनौर साहिब गुरु जी का ननिहाल गांव था। अम्बाला कैंट से इसकी दूरी करीब 10 किलोमीटर है। अपनी माता गुजरी जी के साथ वह बचपन में यहां कई महीने रहे। जो उनका ननिहाल घर था, उस स्थान को गुरुद्वारा साहिब का रूप दे दिया गया है। यहां पर गुरु जी से संबंधित कई पुरातन वस्तुओं सहेजी गई हैं। इनमें उनके बिस्तर, पलंग, पुराने बरतन व शस्त्र शामिल हैं। बताते हैं कि गुरु साहिब के नानके बाद में आनंदपुर साहिब में जाकर बस गए थे।
    अगली तस्वीर:गुरुद्वारा गेंदसर साहिब
  • गुरुद्वारा गेंदसर साहिब
    यह गुरुद्वारा लखनौर साहिब से कुछ दूरी पर है। गुरु गोबिंद सिंह जी जब पटना साहिब से आनंदपुर साहिब जा रहे थे, तो अपने ननिहाल लखनौर साहिब में सात महीने ठहरे थे। बचपन में गुरु जी यहां गेंद से खेलते थे। बचपन में उनका नाम गोबिंद राय था। मान्यता है कि यहां पर उन्होंने राक्षस रूपी सांप को तीर मारकर उसका उद्धार किया था। वर्तमान में यहां प्राचीन सरोवर है, जिसके बारे में मान्यता है कि इसमें डुबकी लगाने से कुष्ठ रोग से मुक्ति मिलती है।
    अगली तस्वीर: बादशाही बाग और गोबिंदपुरा गुरुद्वारा
  • बादशाही बाग और गोबिंदपुरा गुरुद्वारा
    यह दोनों गुरुद्वारे अम्बाला सिटी में स्थित हैं। गुरु गोबिंद सिंह अपने मामा किरपाल चंद के साथ यहां आए थे। उनके पास सफेद बाज था। यहां बाग में मौजूद आमिर दीन के पास भी एक बाज था। सफेद बाज देख लालच में आए आमिर दीन ने धोखे से बाज लेने के लिए बाज से बाज लड़ाने की चुनौती दी। गुरु ने कहा कि वह चिडिय़ों को आमिर दीन के बाज के साथ लड़वा सकते हैं। हुआ भी यही, उनकी दो चिडिय़ों ने आमिर दीन के बाज को मार दिया।
  • तभी से कहा जाता है, 'चिडिय़ों से मैं बाज लड़ाऊं, तबे गोबिंद सिंह नाम कहाऊं।' ऐसी मान्यता है कि जहां से उन्होंने चिडिय़ां उड़ाई थी, वहां गोबिंदपुरा गुरुद्वारा है और जहां बाज को मार गिराया गया, वहां बादशाही बाग गुरुद्वारा है।

    अगली तस्वीर: गुरुद्वारा मरदो साहिब

  • गुरुद्वारा मरदो साहिब
    गांव मरदो साहिब में यह गुरुद्वारा बना है। गुरु गोबिंद सिंह जी सात वर्ष की उम्र में अपने ननिहाल में आए हुए थे। तब खुद्दो खुड्डी (वर्तमान की हॉकी जैसा) खेल खेलते थे। दोपहर के समय गुरु जी जहां विश्राम करते थे, वहीं मरदो साहिब गुरुद्वारा बना हुआ है। यहां कुछ चित्र भी लगे हैं, जिनमें बाल्यकाल में गुरुजी को खुद्दो खुड्डी खेलते दिखाया गया है।
    अगली तस्वीर:टोका साहिब गुरुद्वारा
  • टोका साहिब गुरुद्वारा
    हरियाणा-हिमाचल सीमा पर रुण नदी के किनारे पर टोका साहिब गुरुद्वारा है। दशम पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंह जी नाहन के राजा मेदनी प्रकाश की प्रार्थना पर उनकी सहायता करने के लिए सिख संगत के साथ यहां आए थे। नाहन के राजा अपने वजीरों के साथ गुरु साहिब के स्वागत के लिए टोका साहिब पहुंचे थे। गुरु साहिब करीब तीन साल तक नाहन रहे।
    और भी जगहें जहां पड़े थे गुरू जी के कदम...
  • यहां भी आए गुरुजी
    सत संगत साहिब...नौवें पातशाह गुरु तेग बहादुर व दसवीं पातशाह गुरु गोबिंद सिंह।
    गुरुद्वारा कंघा साहिब...सुल्लर गांव में, दसवीं पातशाही गोबिंद सिंह जी।
    लौहसिंबली...पंजाब के इस गांव में दसवें पातशाह गुरु गोबिंद सिंह
    हुकम सर साहिब...रानी माजरा (पंजाब) में दसवें पातशाह गुरु गोबिंद सिंह
    गुरुद्वारा पांवटा साहिब... हिमाचल में पडऩे वाले इस स्थान पर गुरु जी के सानिध्य में दस्तार सजाने के मुकाबले होते थे।
    अगली तस्वीर: अंबाला में आगमन
  • गुरु जी का प्रकाश
    23 पौष सुदी सातवीं 1723 (1660 में) पटना शहर में।
    अम्बाला में आगमन
    7 वर्ष की उम्र में अपने माता जी के साथ ननिहाल में कई महीने तक रहे।
    खालसा पंथ की नींव
    1699 में बैसाखी पर खालसा पंथ की नींव रखी। पांच प्यारों को अमृत की दात दी और फिर खुद अमृत की दात मांगी। तभी उनके बारे में कहा जाता है...'वाहो-वाहो गोबिंद सिंह, आपे गुरु चेला...।'
    अगली तस्वीर: गोबिंद सिंह जी के सौहार्द की मिसाल
  • वीर, कवि और दानी
    मानवता और धर्म की रक्षा के लिए 14 युद्ध लड़े। वह महाबली, कवि और दानी के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने चारों पुत्रों और अपनी मां का बलिदान दिया।
    सौहार्द की मिसाल
    जहांगीर प्रजा को जबरदस्ती मुसलमान बना रहा था। कश्मीरी पंडितों ने गुरु तेग बहादुर साहिब को आनंदपुर साहिब आकर व्यथा सुनाई। तब हिंदू धर्म की रक्षा के लिए गुरु गोबिंद साहिब ने अपने पिता जी से अनुरोध किया।
    अंबाला के अन्य ऐतिहासिक गुरूद्वारे...
  • अम्बाला में ऐतिहासिक गुरुद्वारे
    पंजोखरा साहिब... आठवीं पातशाही गुरु हरकिशन साहिब
    मंजी साहिब... छठी पातशाही गुरु हरगोबिंद साहिब
    नथाना साहिब... तीसरी पातशाही गुरु अमरदास साहिब।
  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
Web Title: PIX: The seven gurdwaras 350 years old history of the Guru is still alive
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
पढ़ते रहिए 5.5 करोड़ + रीडर्स की पसंदीदा और विश्व की नंबर 1 हिंदी न्यूज़ वेबसाइट dainikbhaskar.com, जानो ख़बरों से ज़्यादा।

Stories You May be Interested in

      More From Ambala

        Trending Now

        पाएं लेटेस्ट न्यूज़ एंड अपडेट्स

        दैनिक भास्कर के ट्रेंडिंग खबरों के नोटिफिकेशन रखेंगे आपको अपडेट..

        * किसी भी समय ब्राउजर सेटिंग्स बदलकर नोटिफिकेशंस ऑफ कर सकते हैं.
        Top