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नहीं भूलेंगे वो दिन, जब 35 करोड़ का 'बेवक्त मरहम' नहीं दे सका था तसल्ली

पूर्ण धनेरवा | Jan 26, 2013, 00:26 IST

  • डबवाली. देश के भीषणतम डबवाली अग्निकांड के पीडि़तों को शायद अब मुआवजा मिल जाए, मगर 18 साल की जद्दोजहद के बाद उन्हें अपनों के बदले मिलने वाला यह मुआवजा भा नहीं रहा।

    सभी वो दिन नहीं भुला पा रहे, जब वे इलाज भी नहीं करवा पा रहे थे। एक तरफ अपनों के खोने का गम। दूसरी तरफ जख्मी शरीर। उस पर पैसे की किल्लत। वो बार-बार गुहार लगाते। सरकार आश्वासन देती, मगर जमीनी हकीकत नहीं बदली। भास्कर ने जब उनसे बात की तो ज्यादातर सुबक पड़े।

    प्रेमनगर कॉलोनी की रहने वाली दयानंद शर्मा की बेटी सुमन कौशल हादसे के समय पांचवे दर्जे में पढ़ती थी। सुमन बुरी तरह झुलस गई थीं। घरवालों के पास इतने पैसे नहीं थे कि अच्छा इलाज करवा सकें। किसी तरह सालों में वो ठीक हो सकीं, मगर भारी कीमत चुकाने के बाद।

    सुमन याद करती हैं, 'एक दिन में पूरी जिंदगी बदल गई। हमारी तो गलती भी नहीं थी। 18 साल बाद मुआवजे का क्या मतलब? इससे वो परेशानियां तो दूर नहीं हो सकती जो हम झेल चुके।'


    सुमन दूसरा तर्क भी देती हैं, 'पहले जरूरत के वक्त पैसा मिला नहीं और अब इन परिवारों को पक्के रोजगार की जरूरत है। मुआवजे का पैसा तो एक दिन खत्म हो जाना है मगर उस कांड से पैदा हुई परेशानियां तो जिंदगी भर साथ रहेंगी। मुआवजा उसी समय दे दिया जाता तो सब कुछ बदला हुआ होता'

    यह बात सिर्फ सुमन के मन की नहीं, बल्कि अग्निकांड के सभी पीडि़तों की है। सुमन की तरह ज्यादातर के जख्मों को मुआवजे का यह वेवक्त मरहम राहत नहीं दे सका।

    आगे की तस्वीरों पर क्लिक करके जानिए कैसी है आज भी लोगों की व्यथा...

  • मां, बीवी, बच्चे, भांजे, भांजी चले गए! अब कैसा मुआवजा?
    वीरेश शर्मा, वो शख्स जिन्होंने इस अग्निकांड में मां, पत्नी, आठ साल की बेटी, ९ और ३ साल के दो बेटे, १० महीने का भतीजा, उसकी मां, पांच साल का भांजा और तीन साल की भांजी गवां दिए। वीरेश कैसे वो दिन भूल सकते हैं? मुआवजे मिलने की बात पता चलते ही उनकी आंखों में आंसू आ गए।


    वीरेश बोले, 18 साल बाद मुआवजा। क्या मतलब है इसका? मेरा तो सबकुछ खत्म हो गया। गांव में एक मेडिकल स्टोर चलाते थे। सदमे में पूरा परिवार बीमार पड़ गया। इसी सदमे में पिता सुखदेव और जीजा जगन्नाथ की मौत हो गई। मेडिकल स्टोर बंद करना पड़ा। दवा पानी के लिए पैसा नहीं था।'

    वीरेश थोड़ा संभले और बोले, 'चलो यह भी गनीमत है। शायद अभी भी कुछ राहत मिले' वो आज कॉलोनी रोड पर एक आयुर्वेदिक केंद्र चलाते हैं। इस बीच उन्होंने दूसरी शादी कर ली, मगर वो हादसा हर रोज उन्हें याद आता है।

  • भुला नहीं सकती वो दिन, जरूरत तो तब थी
    वार्ड नंबर 12 में लीलावती का कहना है कि मुआवजा परिवार के सदस्यों की कमी पूरी नहीं सकता। जिंदगी जैसे तैसे कट रही है। मुआवजा मिलने की खबर से थोड़ी राहत जरूर मिली है।

    लीलावती ने अग्निकांड में अपना बेटा और बेटी को खो दिया। इसी सदमे में पति जगन्नाथ की भी मौत हो गई। एक घायल बेटी के इलाज में उन्हें जो परेशानी हुई उसे वो भुला नहीं पा रही। कहती हैं, पैसे तो तब मिलने चाहिए थे।


    ऐसे जख्म नहीं भर पाएगा मुआवजा
    एकता नगरी के रहने वाले अमर लाल अरोड़ा की बेटी गीता भी इस कांड में झुलस गई थी। गीता की शादी नहीं हो सकी है। अमर लाल कहते हैं कि गीता हमेशा तनाव में रहती हैं।

    सरकारें आई और चली गई मगर मानवीय भावनाओं को आहत करने के अलावा कुछ नहीं किया। कहते हैं-ठीक है मुआवजा मिल जाएगा, मगर ऐसे में जख्मों पर महज मुआवजे से मरहम लग पाएगा ?

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Web Title: Will never forget the day when 35 million 'inopportune ointment' could not give assurances
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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