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ये हैं दुनिया के वो 6 देश, जो खुलेआम अमेरिका को दिखाते हैं आंख

dainikbhaskar.com | Mar 21, 2017, 11:28 IST

  • बाएं से... जॉर्डन के किंग अब्दुल्ला बिन अल-हसन, ईरान के प्रेसिडेंट हसन रूहानी और बेलारूस के प्रेसिडेंट अलेक्जेंडर लुकासेन्को।
    इंटरनेशनल डेस्क.नॉर्थ कोरिया के तानाशाह किम जोंग-उन ने अमेरिका को धमकी दी है कि अगर उनके देश पर एक गोली भी चली तो वे पूरे अमेरिका को राख के ढेर में बदल देंगे। हालांकि, सुपरपॉवर अमेरिका को आंख दिखाने वाला नॉर्थ कोरिया इकलौता देश नहीं है। दुनिया में ऐसे कई देश हैं, जो अमेरिका से नहीं डरते। इन देशों का मानना है कि अमेरिका अपने पॉवर के चलते हर देश में दखल देने की कोशिश करता है। अमेरिका ने इन देशों पर कई पाबंदियां भी लगा रखीं हैं, लेकिन ये अमेरिका से खौफ नहीं खाते। इसी सिलसिले में आज हम आपको उन देशों के बारे में बता रहे हैं, जिन पर अमेरिकी की मनमानी नहीं चलती है। आगे की स्लाइड्स में जानें कौन से हैं ये देश...
  • जॉर्डन के किंग अब्दुल्ला बिन अल-हसन।
    मुस्लिम बहुल देश जॉर्डन और अमेरिका के बीच दुश्मनी के बीज जून 1967 से ही पैदा हो गए थे, जब जॉर्डन और इजरायल के बीच जंग छिड़ी थी। इसे अरब-इजरायल वॉर भी कहा जाता है, क्योंकि जंग में इजरायल अकेला था और जॉर्डन के साथ ईरान, इराक, फिलिस्तीन, सीरिया और सऊदी अरब थे। इसके बावजूद इजरायल सिर्फ 6 दिनों में यह जंग जीत गया था। इसमें सबसे ज्यादा नुकसान जॉर्डन को हुआ था। जॉर्डन का मानना था कि अमेरिका ने ही इजरायल का साथ गुपचुप तरीके से दिया। इसके बाद दोनों देशों के बीच तल्ख्यिां और बढ़ती चली गईं, जब अमेरिका और इजरायल की दोस्ती मजबूत होती चली गई। अब भी इजरायल के समर्थन के चलते जॉर्डन और अमेरिका रिश्ते सुधर नहीं सके हैं। जॉर्डन खुलकर अमेरिका का विरोध करता है।
  • क्यूबा के प्रेसिडेंट राउल कास्त्रो।
    क्यूबा की अमेरिका से दुश्मनी 1961 के बाद ही पनपी हुई है, जब यहां के क्रांतिकारी फिदेल कास्त्रो ने सशस्त्र क्रांति कर तत्कालीन प्रेसिडेंट और तानाशाह बतिस्ता की कुर्सी हथिया ली थी। अमेरिका ने कास्त्रो को झुकाने की कई कोशिशें कीं, लेकिन कास्त्रो ने हार नहीं मानी। अमेरिका ने क्यूबा पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगाए, लेकिन कास्त्रो किसी न किसी तरह देश को मुसीबत से निकाल लाए। यहां तक तक अमेरिका ने कास्त्रो को मरवाने की भी कोशिशें कीं, लेकिन अंतिम समय तक अमेरिका कास्त्रो का कुछ नहीं बिगाड़ पाया। 25 नवंबर, 2018 को कास्त्रो का निधन हो गया। अब देश के प्रेसिडेंट कास्त्रो के ही छोटे भाई राउल कास्त्रो हैं। राउल भी हमेशा से अमेरिकी नीतियों के खिलाफ रहे हैं। इसके चलते अब भी अमेरिका और क्यूबा के बीच रिश्ते सामान्य नहीं हो सके हैं।
  • चीन के प्रेसिडेंट शी जिनपिंग।
    अमेरिका की विदेश नीतियों के चलते हमेशा से ही किसी न किसी बात पर चीन और अमेरिका के बीच तनातनी के हालात बनते रहे हैं। ताजा मामला साउथ चाइना सी को लेकर है, जिसके चलते अमेरिका और चीन आमने-सामने हैं। हाल ही में चीन ने अमेरिका को धमकी दी है की अगर अमेरिका साउथ चाइना सी में उन्हें जाने से रोकेगा तो परिणाम के तौर पर उसे बड़े युद्ध का सामना करना पड़ सकता है। अमेरिका के फॉरेन मिनिस्टर रेक्स टिलरसन की ‘साउथ चाइना सी’ की रणनीति के जवाब में चीन की तरफ से ये रिएक्शन आया है।
    कई देश कर रहे हैं साउथ चाइना सी पर अपने दावे
    साउथ चाइना सी दक्षिणी-पूर्वी एशिया से प्रशांत महासागर के पश्चिमी किनारे तक स्थित है। साउथ चाइना सी कई दक्षिणी-पूर्वी एशियन देशों से घिरा है। इनमें चीन, ताइवान, फिलीपीन्स, मलयेशिया, इंडोनेशिया और वियतनाम हैं। ये सभी देश साउथ चाइना सी पर अपने-अपने दावे कर रहे हैं।
  • रूस के प्रेसिडेंट व्लादिमिर पुतिन।
    रूस से अमेरिका की दुश्मनी जगजाहिर है। दुश्मनी का यह सिलसिला सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद से ही चला आ रहा है। सोवियत यूनियन के विघटन के बाद तो रूस और अमेरिका के बीच कई बार जंग के हालात बने। इस दुश्मनी का कारण यही है कि सोवियत यूनियन के विघटन में अमेरिका ने ही मुख्य भूमिका निभाई थी। इससे अब सोवियत यूनियन से अलग हुए कई देश रूस के बजाय अमेरिका का समर्थन करते हैं। रूस के प्रेसिडेंट व्लादिमिर पुतिन पर अमेरिका का आज तक जोर नहीं चला। क्रीमिया पर रूस के कब्जे के बाद से ही दोनों देशों के बीच तनातनी बढ़ी हुई है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो रूस अब अमेरिका समर्थित नाटों देशों से जंग की तैयारी में लगा हुआ है।
  • बेलारूस के प्रेसिडेंट अलेक्जेंडर लुकासेन्को।
    कभी सोवियत यूनियन का हिस्सा रहा बेलारूस हमेशा से ही रूस के करीब रहा। साल 2008 में अमेरिका ने बेलारूस में हुई कुछ घटनाओं पर बेलारूस सरकार पर मानवाधिकार के उल्लंघन का सीधा आरोप मढ़ दिया था। इसके बाद दोनों देशों के बीच दुश्मनी इतनी बढ़ गई थी कि 2000 में दोनों देशों ने अपने-अपने एम्बेसेडर वापस बुला लिए थे। इसके बाद हर मामले में अब बेलारूस रूस का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सपोर्ट और अमेरिका का विरोध करता रहता है। बेलारूस को रूस से पेट्रोलियम पदार्थों से लेकर हथियारों तक की मदद मिलती रहती है।
  • ईरान के प्रेसिडेंट हसन रूहानी।
    ईरान से अमेरिका की दुश्मनी का कारण ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। हालांकि, दोनों देशों के बीच दुश्मनी का सिलसिला जून 1967 से ही शुरू हो गया था, जब ईरान ने इजरायल के खिलाफ जंग में जॉर्डन का साथ दिया था। जॉर्डन के साथ ईरान का भी साफतौर पर कहना था कि अमेरिका ने इजरायल की मदद की। वहीं, फिलिस्तीन के मुद्दे पर अमेरिकी नीतियों से भी ईरान सहमत नहीं। ईरान के परमाणु कार्यक्रम के चलते अमेरिका उस पर कई प्रतिबंध लगा चुका है, लेकिन ऑयल रिच ईरान आर्थिक रूप से इतना मजबूत है कि उस पर अब तक अमेरिका का ज्यादा जोर नहीं चल सका है।
  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
Web Title: Countries does not approve of the current US leadership
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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