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PIX : मां ने अपने खून से मिटायी थी इनकी भूख, आज भी कटे सर की पूजा

Pankaj Saw | Dec 07, 2012, 00:08 IST

  • रांची।स्नान करने के बाद सखियों को तेज भूख लगी। इंतजार करने को कहा तो मानी नहीं, अपनी जिद पर अड़ी रहीं। बस फिर क्या, भवानी ने आव देखा न ताव, खड्ग उठाया और काट डाला अपना ही सिर। गले से निकली खून की तानी धाराएं। दो धाराएं दोनों सखियों के मुंह में और अपने कटे सर के मुंह में जाने लगीं। दोनों सखियां खून पीकर तृप्त और भवानी भी संतोष कि सहेलियों की भूख तो मिट गई। सुनने में यह कहानी काल्पनिक भले ही लगती हो पर सारी दुनिया की मां जब ऐसा करे तो विश्वास हो ही जाता है। मां भवानी के इसी सर कटे रूप की पूजा आज भी जारी है, छिन्नमस्तिका के रूप में। दस महाविधाओं में से एक मां छिन्नमस्तिका का विख्यात सिद्धपीठ झारखन्ड की राजधानी रांची से 75 किमी दूर रजरुप्पा नामक स्थान में स्थित है। यही है वह जगह जिसे असम के मां लकामाख्या मंदिर के बाद दूसरी सबसे बड़ी शक्तिपीठ माना जाता है।

    तो आइए हम आपके सीधे लिए चलते हैं रजरप्पा, जहां की हरएक बात उसी तरह विचित्र है जैसा अपना ही सिर काटकर सहेलियों को खून पिलाना...



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  • मुख्य मंदिर में चार दरवाजे हैं और मुख्य दरवाजा पूरब की ओर है। इस द्वार से निकलकर मंदिर से नीचे उतरते ही दाहिनी ओर बलि स्थान है, जबकि बाईं और नारियल बलि का स्थान है। इन दोनों बलि स्थानों के बीच में मनौतियां मांगने के लिए लोग रक्षासूत्र में पत्थर बांधकर पेड़ व त्रिशूल में लटकाते हैं। मनौतियां पूरी हो जाने पर उन पत्थरों को दामोदर नदी में प्रवाहित करने की परंपरा है। सबसे खास दामोदर और भैरवी नदियों पर अलग-अलग बने दो गर्म जल कुंड हैं। नाम के अनुरूप ही इनका पानी गर्म है और मान्यता है कि यहां स्नान करने से चर्मरोग से मुक्ति मिल जाती है। इसके अलावा दुर्गा मंदिर (लोटस टेंपल) के सामने भी एक तालाबनुमा कुंड है, जिसे कालीदह के नाम से जाना जाता है। इसका प्रयोग भी लंबे समय तक स्नान-ध्यान, पूजा के लिए जल लेने आदि कार्यों के लिए होता रहा पर फिलहाल प्रयोग कम होने के कारण कुंड का पानी गंदा हो गया है।
  • सफेद संगमरमर से कमल के आकार का बना दुर्गा मंदिर अपनी भव्यता के कारण लोटस टेंपल के नाम से जाना जाता है। यहां देवी दुर्गा के अपराजिता स्वरूप की पूजा होती है। विराट मंदिर में कृष्ण के विराट रूप की पूजा होती है। यह प्रतिमा 25 फीट की है। इन दोनों मंदिर के बीच लक्ष्मी की आठ प्रतिमाएं- ऐश्वर्य लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी, गज लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, धन लक्ष्मी, विजया लक्ष्मी, वीरा लक्ष्मी व जया लक्ष्मी स्थापित हैं। इसके अलावा मनसा, मधुमति, पंचमुखी हनुमान, उतिष्ठ गणपति, भगवान शिव, बटुक भैरव, सोनाकर्षण भैरव आदि देवी-देवताओं के मंदिर भी आसपास ही हैं।
  • विराट शिवलिंग छिन्नमस्तिका के मंदिर से सटा शिव का मंदिर है जहां 15 फीट ऊंचा विशाल शिवलिंग पूजा-पाठ के साथ पर्यटकों के लिए भी खास आकर्षण का केंद्र है। मंदिर परिसर में ही 10 महाविद्याओं का मंदिर अष्ट मंदिर के नाम से विख्यात है। यहां काली, तारा, बगलामुखी, भुवनेश्वरी, भैरवी, षोडसी, छिन्नमस्तिका, धूमावती, मातंगी और कमला की प्रतिमाएं स्थापित हैं। इसके अलावा सूर्य का भव्य मंदिर व दुर्गा मंदिर भी आसपास ही हैं।
  • बटुक-भैरव मंदिर में अन्य प्रसाद के अलावा मांस-मछली, शराब, सिगरेट आदि का भी भोग लगता है। मंदिर में दीपावली के समय कालीपूजा बड़े धूमधाम से की जाती है। इसके अलावा वैशाख चतुर्दशी को छिन्नमस्तिका जयंती पर भी खास आयोजन होते हैं। नवरात्र के समय भी यहां खास अनुष्ठान और उत्सव होते हैं। अमावस्या, पूर्णिमा व अन्य त्योहारों के मौके पर भी विशेष पूजा होती रहती है। शक्तिपीठ होने की वजह से रजरप्पा तंत्र साधना के लिए भी प्रसिद्ध है। मंदिर से उत्तर की ओर थोड़ी दूरी पर दामोदर नदी के ऊपर तांत्रिक घाट है जहां तांत्रिक तंत्र साधना करते नजर आते हैं।
  • दस महाविधाओं में से एक मां छिन्नमस्तिका का विख्यात सिद्धपीठ झारखन्ड की राजधानी रांची से 75 किमी दूर रजरुप्पा नामक स्थान में स्थित है। बताया जाता है कि मां का प्राचीन मंदिर नष्ट हो गया था। अत: नया मंदिर बनाया गया, किन्तु प्राचीन प्रतिमा यहां मौजूद है। यह शक्तिपीठ दामोदर-भैरवी नदी के संगम पर स्थित है। दामोदर को शिव व भैरवी को शक्ति माना जाता है। यहां पर भैरवी नदी (शक्तिस्वरुपा) का प्रवाह निम्नतर है तथा दामोदर (ऊपर से बहते हुए भैरवी पर गिरती है। उसके बाद उसे भेडा नदी कहा जाता है। मंदिर में स्थापित प्रतिमा में मां छिन्नमस्थिका का सिर कटा है। बाल खुले हैं और जिह्वा बाहर निकली हुई है। आभूषणों से सजी मां कामदेव और रति के ऊपर खड़ी हैं। दाएं हाथ में तलवार और बाएं हाथ में अपना कटा मस्तक लिए हैं। इनके दोनों ओर मां की दो सखियां डाकिनी और वर्णिनी खड़ी हैं। देवी के कटे गले से निकल रही रक्त की धाराओं में से एक-एक तीनों के मुख में जा रही है।
  • इस प्रतिमा के अलावा वहां आवरण में एक प्रतिमा है, जो मूल पुरातन प्रतिमा हे। यह मूल प्रतिमा कितनी पुरानी है. इसका कोई सही प्रमाण उपलब्ध नहीं है। यहां बकरे की बलि भी दी जाती है. बलि के बाद सिर पुजारी ले जाते हैं और धड बलि देने वाले व्यक्ति को मिलता है। बलि से जो भी रक्त फैलता है, उस पर मक्खी बिल्कुल नहीं लगती है। यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है। छिनमस्तिका मंदिर एक प्रख्यात तांत्रिक पीठ भी है। बंगाल की तारापीठ की भांति यहां भी भक्तगण दिन में ही पूजन-दर्शन कर सकते है। इस मंदिर में ही शेष नौ महाविधाओं का भी मंदिर है।
  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
Web Title: IN PICS : Rajrappa temple a pilgrimage centre in R
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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