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PICS : इस ब्रिटीश मेम ने 1945 में ही दिखाया था साड़ी पहनने का SEXY अंदाज!

Pankaj Saw | Dec 03, 2012, 00:43 IST

  • रांची।यह दुर्लभ तस्वीर 4 जनवरी सन् 1944 के दिन अंग्रेजी अखबार सीबीआई राउंड अप में ‘HOMEGROWN CHEESECAKE’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्ति की ओर था, उसी समय रामगढ़( जो अब झारखंड का एक जिला मुख्यालय है) में स्थित सेना के ट्रेनिंग कैंप में यह तस्वीर खींची गई थी। चित्र में दिखाई दे रही अंग्रेज महिला पैट्रीसिया फ्लीन का साड़ी पहनने का यह अंदाज अंग्रेजों को खूब भाता था। खुद पेट्रीसिया ने यह तस्वीर यह कहते हुए खिंचवाई थी कि एक लड़की को साड़ी ऐसे ही पहननी चाहिए।

    अब हम आपको रुबरू करा रहे हैं साड़ी से जुड़ी कई जानी-अनजानी बातों से। साथ ही खूबसूरत तस्वीरों में देखिए साड़ी में कैसी दिखती हैं आपकी फेवरेट हीरोइनें...

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  • साड़ी शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम यजुर्वेद में मिलता है। ऋग्वेद की संहिता के अनुसार यज्ञ या हवन के समय पत्नी को साड़ी पहनने का विधान है। विधान के क्रम से ही साड़ी जीवन का एक अभिन्न अंग बनती चली गई। इसमें निरंतर कई प्रयोग हुए। जब क्रोध में आकर दुर्योधन ने द्यूत क्रीड़ा में द्रौपदी को जीतकर उसकी अस्मिता को सार्वजनिक रूप से चुनौती दी थी, तब भगवान श्रीकृष्ण ने साड़ी की लंबाई बढ़ाकर उसकी रक्षा की।
  • दूसरी शताब्दी ई. पू. की मूर्तियों में पुरुषों और स्त्रियों के शरीर के ऊपरी भाग को अनावृत दर्शाया गया है। ये कमर के इर्द-गिर्द साड़ी इस प्रकार लपेटे हुए हैं कि पैरों के बीच सामने वाले भाग मं चुन्नटें बन जाती हैं। इसमें 12वीं सदी तक कोई ख़ास परिवर्तन नहीं हुआ। भारत के उत्तरी और मध्य भाग को जीतने के बाद मुस्लिमों ने जोर दिया कि शरीर को पूरी तरह से ढका जाए।
  • हिन्दू महिलाएं साड़ी को एक छोटे से अंग वस्त्र, जिसे सामान्यत: ब्लाउज़ तथा लहंगे, जिसे बोलचाल की भाषा में पेटीकोट कहते हैं, के साथ पहनतीं हैं, जिसमें साड़ी को खोंसकर कमर से पैर तक एक लंबा घेरा बना लिया जाता है। महाराष्ट्र में अक्सर नौ गज़ की साड़ी लांघदार बांधी जाती है। साड़ी में प्रयोग होने वाले रंगों के माध्यम से स्त्री अपने मन के भावों को व्यक्त करती है।
  • चूंकि साड़ी का धर्म के साथ विशेष जुड़ाव रहा है, इसलिए बहुत सारे धार्मिक संकेत चिह्न और धार्मिक परंपरागत कला का समावेश इसमें होता था। लोक कलाकार, जिन्होने समाज की रूढ़ियों की वजह से धर्म परिवर्तन किया था, उन्होंने कला का विस्तार करते हुए गंगा-यमुना संस्कृति का प्रयोग साड़ियों को डिज़ाइन करते समय किया और आज पीढ़ी दर पीढ़ी यह कला अपनी विरासत नई पीढ़ी को सौपती हुई आगे बढ़ रही है।
  • आज भारत सहित अनेकों देशों में साड़ी महिलाओं द्वारा भिन्न-भिन्न प्रकार से पहनी जाती है। साड़ी को भिन्न-भिन्न प्रकार से पहनने की कई शैलियां आज मौजूद हैं। ऐसा ज़रूरी नहीं है कि साड़ी पहनने के जिस प्रकार को सबसे अधिक पसन्द किया जाता है, उस प्रकार से ही हमेशा पहनें। साड़ी को पहनने के भी कई तरीक़े हैं।
  • स्त्रियां अपनी लम्बाई, कद-काठी और मौके के अनुसार साड़ी पहनने का प्रकार चुन सकती हैं। जैसे- फ्री पल्लू साड़ी, पिनअप साड़ी, उल्टा पल्लू, सीधा पल्लू, लहंगा शैली, मुमताज शैली और बंगाली शैली की साड़ियों को अपनी पसंद के अनुसार पहना जा सकता है।
  • भौगोलिक स्थिति, पारंपरिक मूल्यों और रुचियों के अनुसार बाज़ारों में साड़ियों की असंख्य किस्में हैं। कांजीवरम साड़ी, बनारसी साड़ी, पटोला साड़ी और हकोबा मुख्य शैलियां हैं। मध्य प्रदेश की चंदेरी, महेश्वरी, मधुबनी छपाई, असम की मूंगा रेशम, उड़ीसा की बोमकई, राजस्थान की बंधेज, गुजरात की गठोडा, पटौला, बिहार की तसर, काथा, छत्तीसगढ़ी कोसा रेशम, दिल्ली की रेशमी साड़ियां, झारखंडी कोसा रेशम, महाराष्ट्र की पैथानी, तमिलनाडु की कांजीवरम, बनारसी साड़ियाँ, उत्तर प्रदेश की तांची, जामदानी, जामवर एवं पश्चिम बंगाल की बालूछरी एवं कांथा टंगैल आदि प्रसिद्ध साड़ियां हैं।
  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
Web Title: PICS: The British Mem Saab shown in 1945 how to we
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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