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PICS : 'सत्ता का संग्राम' जानिए पर्दे के पीछे का सच : पहले से ही थी नाराजगी, बस था वक्त का इंतजार!

Bureau Report. | Jan 09, 2013, 11:16 AM IST

रांची। अर्जुन मुंडा सरकार से झामुमो के समर्थन वापसी की नींव चार माह पूर्व ही रख दी गई थी। झामुमो को इंतजार था सही वक्त का। 28-28 माह का बहाना मिला, जिसकी आड़ में पार्टी ने सरकार से अलग होने का फैसला कर लिया। सरकार में भाजपा के 18 विधायक थे, तो झामुमो के भी 18 विधायक।

लिहाजा झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन चाहते थे कि उन्हें भी वही सम्मान मिले, जो सीएम को मिल रहा है। ऐसा हो न सका। शिबू की सलाह को सरकार ने कभी तव्वजो नहीं दी। 2010 के राज्यसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में उद्योगपति केडी सिंह ने पर्चा भरा। इन्हें झामुमो विधायकों का समर्थन मिला। 2012 में नोट फॉर वोट का मामला उजागर हुआ। इसकी जांच की जिम्मेवारी सीबीआई को सौंपी गई। अर्जुन मुंडा ने दो साल पहले वाले चुनाव की भी सीबीआई जांच की अनुशंसा कर दी। इससे झामुमो की नाराजगी बढ़ी।

इसीबीच गोड्डा के भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने झामुमो और गुरुजी के खिलाफ बयानबाजी शुरू की। यहां तक कह दिया कि शिबू और हेमंत संथाल के विकास विरोधी हैं। इससे दोनों दलों के बीच की कड़वाहट बढऩे लगी। झामुमो ने खुले तौर पर इसका विरोध करते हुए भाजपा को चेतावनी दी कि सांसद के बयानों पर रोक लगाएं। भाजपा ने न सिर्फ चुप्पी साधे रखी, बल्कि पार्टी के कई नेता निशिकांत के समर्थन में सामने आ गए। झामुमो को यह नागवार गुजरा।

तभी झामुमो ने 28-28 माह के समझौते की बात उठाई। भाजपा ऐसे किसी समझौते की बात से सीधे मुकर गई। झामुमो नेताओं ने गुरुजी को समझाया कि सरकार आपकी बात तो नहीं ही मान रही है, अब झूठा साबित करने पर भी तुली है। यह बात गुरुजी को खल गई। जब कोर कमेटी की बैठक हुई, तो एक नेता ने कहा कि गुरुजी के फेस वैल्यू पर ही झामुमो टिका है। संथाल में भाजपा का नेता शिबू सोरेन के खिलाफ बयानबाजी करता है और यहां सरकार उन्हें झूठा साबित करने पर तुली है। ऐसे में सत्ता से अलग नहीं हुए, तो पार्टी का अस्तित्व ही मिट जाएगा।

आप भी तस्वीरों में जानिए पूरा मामला -

फोटो - रमीज़.

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Web Title: 'power struggle' Know The Truth Behind the scenes
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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