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भास्कर हस्तक्षेप: ऐतबार का सिला यह तो ये सिलसिला ही खत्म हो

कमलेश सिंह | Jan 09, 2013, 01:59 AM IST

अगर किसी को शुबहा था कि हमारी सेना किसी सेना से मुक़ाबिल है तो मंगलवार की सुबह उस अमंगल धुंधलके को मिटाने के लिए काफ़ी थी। हमारा मुक़ाबला एक आतंकी संगठन से है, जो सेना का वेश धरे है। स्टेट एक्टर। सेना के उसूल होते हैं। एक जवान का दूसरे जवान के प्रति व्यवहार की मर्यादा भी निश्चित है। ऐसी क्रूरता माफी के काबिल नहीं। अब देश में बहस छिड़ चुकी है कि हम इस बर्बरता का जवाब कैसे दें। हम ऐसी नीच हरकत नहीं कर सकते पर ऐसा क्या करें बदले में? यलग़ार हो या ना हो? प्रतिकार करें तो अभी क्यों करें? वक्त का चुनाव हम क्यों न करें? व़क्त है एक नज़र इस बात पर डालने का कि ऐसा क्या किया हमने कि ऐसा व़क्त आया। ऐतबार बुरी बात नहीं, ऐतबार कर धोखा खाना भी बुरा नहीं। बार-बार ऐतबार बुरा भी है और बेवक़ूफ़ी भी।
यह कहकर कि पड़ोसी के पास भी परमाणु बम है हम उसे बराबर का मान देते हैं। घोटालों के डर से रक्षा सौदे अटके रहने के बावजूद हम पड़ोसी से पांच गुना ताक़तवर हैं। अर्थव्यवस्था दस गुना मजबूत है, अगर इच्छाशक्ति हो तो साल दो साल में हम सामरिक स्तर पर भी दस गुना हों। ऐसा करना अब आवश्यक हो गया है। पाकिस्तान की आंतरिक राजनीतिक स्थिति से सेना में बेचैनी है। वहां पांच साल अनवरत लोकतांत्रिक सरकार के चलने से सेना को डर है कि देश को लोकतंत्र की आदत ना लग जाए। अपने यहां अस्थिरता का माहौल पैदा करने के लिए पाकिस्तानी सेना भारत के साथ संघर्ष को बढ़ावा देगी। चौंकाने वाली करतूतों को अंजाम देगी पर युद्ध नहीं करेगी। यानी निर्णायक कुछ भी नहीं होगा।
निर्णायक युद्ध में सेना दुश्मनों से निपट लेती है। दुश्मनी मुश्किल होती है शांतिकाल में। अमन की आशा का बंदूक़ों के साए में सांस लेना जीना नहीं है, तमाशा है। अमन के इस तमाशे को ख़त्म करने के लिए युद्ध से भी ज्यादा साहस और संकल्प चाहिए। ये कबूतरदिल नेताओं के बस की बात नहीं जो शांति के कपोत उड़ाते हैं और पत्थरदिल पड़ोसी उसका शिकार कर लेता है। मुंबई में हो या मेंढर में।
ये सिलसिला ख़त्म तभी होगा जब हम पड़ोसी के घर से लगी दीवार को और ऊंची और अभेद्य करेंगे। पूरी दुनिया के साथ संबंध रखेंगे एक उस के सिवा। कोई खेल नहीं। ना क्रिकेट का। ना बातचीत का। ना वीसा, ना ही सांस्कृतिक आदान-प्रदान। सारे रास्ते बंद। सारी ऊर्जा स्वयं को और सुरक्षित बनाने में लगाएं और उन पड़ोसियों से संबंध सुधारें जो आपकी पाकमुखी नीतियों के कारण तिरस्कृत महसूस करते हैं।
तीन जंग और पैंसठ साल के इस अफ़साने में खून से लिखे अध्याय बहुत हैं। पर वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन उसे एक मोड़ पर लाकर छोड़ना अच्छा। वह मोड़ ख़ूबसूरत हो ज़रूरी नहीं।
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Web Title: Bhaskar intervention: if trust sewed it then over the continuation
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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