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बदले की आग

सोशल बोल: इस नोटबंदी को एक न एक दिन चूरन तक आना ही था

सोशल बोल: इस नोटबंदी को एक न एक दिन चूरन तक आना ही था

जिस बैंक का वह एटीएम है, उससे "अभी लंच है, बाद में आना' वाली पर्ची भी निकल सकती थी।
इस नोटबंदी को एक न एक दिन चूरन तक आना ही था 2000 रुपए का नोट, बुधुआ की लुगाई हो गया है। जो सबके निशाने पर रहता है, और सबका अत्याचार सहता है। दिल्ली के एक एटीएम से 2000 के नोट की बजाय चूरन वाले नोट निकले।
काजल लगाते-लगाते आंख फूट जाती है और मजाक करते-करते मजाक सच हो जाता है। आते के साथ ही जिस नोट को चूरन वाला कहा गया था, अब उसकी जगह सच में चूरन वाला नोट निकला। ताज्जुब तो इस बात का है कि निकालने वाले ने कैसे असली-नकली में फर्क कर लिया। हमें तो अब भी जब तक नोट न चल जाए कॉन्फिडेंस नहीं रहता कि नोट असली है या नकली। खैर इसी के साथ साबित हो गया कि देश स्वतंत्र है, किसी को कहीं भी जाने का हक है, अब देखिए न नकली नोट भी एटीएम तक पहुंच गए।
जिसके नोट नकली निकले उसके लिए दुखी मत होइए, नकली ही सही कम से कम निकले तो, वरना जिस बैंक का वो एटीएम है, उससे "अभी लंच है, बाद में आना' वाली पर्ची भी निकल सकती थी। उस आम आदमी के लिए ये आधे सुख-आधे दुःख वाली हालत रही होगी, दुःख नकली नोटों का और खुशी इस बात की कि अब भीड़ छंट गई है और एटीएम के बटन दबा पाने का सुख तो मिला। वर्ना पहले तो हाल ये था कि कई लोग एटीएम से पैसे निकलने वाली खुर्र-खुर्र की आवाज को मिस कर रहे थे। बाजारवाद इस कदर हावी हो चुका है कि नोट निकलने की खुर्र-खुर्र आवाज महंगे दामों में इंटरनेट पर बिक रही थीं, जिन्हें सिर्फ कैश देकर खरीदा और सुना जा सकता था। कुछ पर्यटन कंपनियों ने तो नवविवाहित जोड़ों के लिए एक लग्ज़री हनीमून प्लान भी तैयार किया था, जिसमें 7 दिन और 6 रातों के हनीमून पैकेज में भीड़ भरे एटीएम के अंदर तक दो चक्कर लगवाने भी शामिल थे। वक़्त हर घाव को भर देता है, कुछ को तो सही वक़्त पर भर देता है। ऐसा न होता और एटीएम पर पहले जैसी लाइनें लगी होतीं तो गर्मी में एसी की हवा लेने के लिए दिनभर एटीएम में बैठे रहने वाले हम जैसे लोगों का क्या होता? पर हम लोग शिकायती बहुत हैं। पहले हम शिकायत करते थे, रोज़गार नहीं है, आदमी पैसे नहीं कमा पाता। जिस रोज़ नोट बंद हुए उस दिन से सबके पास पैसे निकल आए। फिर हमें शिकायत हुई कि पैसे निकालने की भी लिमिट है। इसी बहाने कइयों के छिपे चेहरे सामने आए। जीवनभर जिस पड़ोसी ने हमसे शक्कर मांगकर चाय पी है, वो भी शिकायत करता है कि हफ्ते में बस 24 हजार ही निकलते हैं। उसके इतिहास की बातें और वर्तमान की शिकायतें अगर साथ देखें तो निष्कर्ष ये निकलता है कि हफ्ते में ये 24 हजार सिर्फ अदरक और चाय पत्ती पर खर्च कर देता है। चूरन वाले नोटों पर लौटिए। चूरन वाले नोट हमें बताते हैं दुनिया गोल है। गोल दुनिया में हर चीज का नुस्खा होता है। पेट बिगड़ने पर नुस्खा मिलता है, चूरन खा लो ठीक हो जाएगा या खाना बंद कर दो। नोटबंदी का भी नुस्खा ऐसा ही था, "इकॉनोमी बिगड़े तो नोट बंद कर दो सब सही हो जाएगा।' इस नोटबंदी को तो एक न एक दिन चूरन तक आना ही था।

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Web Title: Funny Jokes pics shared on WhatsApp/social sites
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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