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वे जीवनदायनी सुवास थे

विजय बहादुर सिंह | Feb 21, 2017, 00:00 IST

  • (अनुपम मिश्रा)
    निरुक्तकार मुनि यास्क ने लिखा ही है, ‘अपना और सबका सत्य जानना है तो लोक के पास जाओ।’ अनुपम एक ऐसे ही सत्य की तलाश में जीवन भर चलते रहे। उनकी निगाह में यह सत्य और कुछ नहीं, वह लोक-विवेक और लोकप्रज्ञा थी, जिससे संवाद कर धरती और उसके निवासियों की लड़खड़ाती सांस को फिर से सहेजा और स्वस्थ किया जा सकता था। इस अर्थ में वे भी एक भौतिक-द्रष्टा थे, मार्क्स की तरह।
    हमारी अपनी पश्चिम-प्रेरित और पोषित आधुनिक सभ्यता के बारे में सोचता हूं तो रामायण-महाभारत के कथानक याद आते हैं। रामायण में अगर रावण की सोने की लंका है तो महाभारत में लाक्षागृह और युधिष्ठिर द्वारा बनवाया गया एक ऐसा महल, जिसमें थल की जगह जल और जल की जगह थल तो दिखता ही है, दरवाज़े की जगह दीवार और दीवार की जगह दरवाज़े का एहसास होता है। कहते हैं ये दोनों ही भारतीय जाति की समस्त चेतना और उससे उपजी सोच के प्रामाणिक और कालजयी रंगमंच हैं, लेकिन सार संकेत यह कि जो भी शासन या सभ्यता अतिचार की राह पकड़ती है, उसका विनाश सुनिश्चित है। यह विनाश कोई और नहीं, सभ्यता का विकास करने वाले हम आप ही करते हैं। इसलिए इस देश में ऐसी सभ्यताओं को हमेशा संदेह और आलोचना से देखा गया।
    आगे की स्लाइड्स में अनुपम मिश्रा से जुड़ी कुछ और बातें...
  • जिन दिनों यह देश पश्चिमी सभ्यता की ओर उन्मुख होने लगा, उन्हीं दिनों गांधी ने अपनी कालजयी पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ में कहा कि पश्चिमी सभ्यता राक्षसी है। कौन नहीं जानता राक्षस सभ्यता भोगवादी या भोग-केंद्रित होती है। वह प्रकृति और मनुष्य को कम किंतु भौतिक पदार्थों और यंत्रवाद को ज़्यादा महत्त्व देने लगती है। आजकल यंत्रवाद के लिए बहुप्रचलित शब्द तकनीकवाद है। आधुनिक सभ्यता में परिणामतः हम सब मनुष्य न रहकर उपभोक्ता हो गए हैं। यह उपभोक्तावाद ही तो प्राचीन पदावली में राक्षसवाद कहा गया। अकारण ही नहीं, सर्ग के सारे वरदान धरती-आकाश, नदी-जंगल और पहाड़ हमें कम पड़ने लगे हैं। पुरखों ने प्रकृति के साथ मैत्री और सहयोग का संबंध बनाया था, हम उसे भोज्य सामग्री भर मानने लगे हैं। गांधी भुलाए जा रहे हैं और उनकी शिक्षाएं और संदेश हमें नागवार लगने लगे हैं। तब भी कुछ लोग हैं और थे, जिन्होंने गांधी और उनकी जीवन-दृष्टि का अर्थ और मर्म समझा था। सिर्फ़ अपने लिए नहीं, बल्कि समूची आधुनिक सभ्यता के भले के लिए उसे याद कराना चाहा था। अनुपम इसी टोली के एक विनम्र किंतु गंभीर और तेजस्वी नक्षत्र थे। गांधी शांति प्रतिष्ठान-नई दिल्ली के पर्यावरण-कक्ष के वे सर्वेसर्वा जैसे थे। पिछले कई बरसों से ‘गांधी मार्ग’ जैसी पत्रिका के संपादक भी थे। जिन लोगों ने भी कभी इसे देखा और इसके पन्नों पर नज़र डाली होगी, वे इस बात की तस्दीक करेंगे कि विचार और शैली की दृष्टि से तो यह एक महत्त्वपूर्ण कोशिश थी ही, कला और संपादन-दृष्टि के लिहाज़ से भी यह एक ऐतिहासिक कोशिश रही है।
  • एक ऐसे समय में जिसमें शब्दों का एक अर्थ शोर भी हो चुका हो, भाषा जहां विचार से कहीं व्यवसाय बन चुकी हो, कलात्मकता प्रतिद्वंद्विता और आतंक का नमूना हो चली हो, वहां इतनी सादगी और सहजता शायद ही कोई सौंदर्य माना जाए। सौंदर्य शायद अब प्रदर्शन और चकाचौंध भर है। अनुपम के पिता पं. भवानीप्रसाद मिश्र यह आग्रह गांधी के ज़माने से करते आ रहे थे — ‘यह कि तेरी भर न हो तो कह
    और सादे ढंग से बहते बने तो बह।’
    कवि भवानीप्रसाद मिश्र ने बीसवीं शताब्दी के साठ के दशक में ही लिखी थी यह कविता —
    ‘आप सभ्य हैं क्योंकि हवा में उड़ जाते हैं ऊपर
    आप सभ्य हैं क्योंकि आग बरसा देते हैं भू पर
    आप बहुत चिंतित हैं मेरे पिछड़ेपन के मारे
    आप सोचते हैं कि सीखना ये भी ढंग हमारे’
    यह जो सभ्य होने और दिखने की दंभमण्डित मुद्रा है, सने प्रकृति के समस्त सौंदर्य पर क्रमशः आक्रामक हमला कर जंगल-पहाड़, नदी-तालाब को इस दौर की नागरिकता से लगभग बेदखल करना ही नहीं शुरू किया, बल्कि खारिज़-सा ही कर दिया है। यह अलग बात है कि अब जब उसे अपनी ग़लतियों और चूकों को लेकर कुछ-कुछ एहसास होने लगा है, कहीं-कहीं वह संशोधन की मुद्रा में भी आ गया है।
    गांधी ने तो समूची पश्चिमी सभ्यता को राक्षसी कहा था और भारत के लोग इस शब्द का अर्थ समझते हैं। भवानीप्रसाद मिश्र ने व्यंग्यात्मक लहज़े में उसी को सभ्य कहा।
  • ख्यात पर्यावरणविद् और जल-सेवक अनुपम मिश्र इन्हीं भवानीप्रसाद मिश्र के सबसे छोटे बेटे थे। पिता की तरह वे कवि तो नहीं हो पाए, किंतु उनका समूचा व्यक्तित्व किसी विलक्षण कविता से कम नहीं था। वे जो थे, वही दिखते भी थे और रोज़-रोज़ उसी दिशा में पहले से कुछ अधिक होते चलते थे। ख़ासतौर से ऐसे दौर में जिसमें सभ्य से सभ्यतर और सभ्यतम होने की हिंसक प्रतिद्वंद्विता और नई-नई पहचान और परिभाषा गढ़ी जा रही हो, उसमें कवि या उसके बेटे में अगर असभ्य बने रहने की ख़ूबसूरती सूझ गई हो तो क्या आश्चर्य! अनुपम लगभग इसकी अनदेखी कर उस दिशा की ओर बढ़े जा रहे थे, जहां परिभाषाएं बेमानी हो उठती हैं और मनुष्यता इन फ्रेमों से कहीं बहुत आगे खड़ी दिखाई देती है।

    यह भी कम अद्भुत संयोग नहीं है कि उनका जन्म तब हुआ जब उनके पिता महिलाश्रम वर्धा में शिक्षक थे। इसी वर्धा में गांधी का सेवाग्राम भी है। इसी मिट्टी-हवा-पानी से उनके व्यक्तित्व का संघटन हुआ था। सत्तर के दशक में परिवार दिल्ली आ गया तो अनुपम मिश्र की पढ़ाई-लिखाई यहीं होने लगी और उन्होंने संस्कृत को विषय बनाकर अपनी उच्च शिक्षा पूरी की। पिता यों तो आकाशवाणी में थे पर जल्दी ही गांधी वाङ्मय के संपादक मंडल में शामिल कर लिए गए और समय पाकर गांधी स्मृति निधि के परिसर में रहने लगे। तब से अंतिम दम तक अनुपम इसी आबोहवा में उठते-बैठते और सांसें लेते रहे। वर्धा से गांधी स्मृति निधि-परिसर की इस यात्रा में गांधी-विनोबा और जयप्रकाश की सुवास ने अनुपम को जैसा सुगंधित व्यक्तित्व सौंपा, उसी के फलस्वरूप वे अपनी अनूठी सोच और कर्मों से न केवल भारत, बल्कि दुनिया भर के अनेक देशों में अपनी गंध छोड़ते रहे। आज हम भी अगर उन्हें भूल नहीं पा रहे हैं तो कारण यह कि यह गंध बेहद जीवनदायी है।
  • यों तो अनुपम मिश्र ने शुरू-शुरू में प्रेस-फ़ोटोग्राफ़र के रूप में अपनी पहचान बनानी शुरू की और एक अरसे तक कैमरे को अपने कंधे से लटकाया भी, पर जल्दी ही उन्हें लगा कि अकेला कैमरा काफ़ी नहीं है। क़लम भी ज़रूरी है। पर लिखते क्या? क्या भिंड और मुरैना के जौरा से डाकुओं के आत्मसमर्पण की रिपोर्ट? वे जल्दी ही इस एहसास तक पहुंचे कि इससे बड़ी कुछ अन्य रपटें भी हैं, जिनकी ज़रूरत दुनिया भर को है, देश को तो है ही। निश्चिय ही वे रपटें उस जल, थल और आकाश की हैं, जिन्हें कुछ विकासवादी निरंतर अपनी ख़ब्त में बर्बाद किए जा रहे हैं। भारत के उन गांवों की सनातन प्रज्ञा की हैं, जिन्हें कल तक गांव-देहात समझ नज़रअंदाज़ किया जाता रहा। आज तक भी जिनकी लोकतांत्रिक नागरिकता आधी-अधूरी या फिर वोट डालने की टोकन ज़िम्मेदारी तक महदूद मानी गई। अनुपम मिश्र दिल्ली की चमक-दमक के प्रति लापरवाह बने मोटा-झोटा खादी का कुरता-पायजामा और जैकेट पहन, पांवों में मामूली-सी चप्पल डाल इन्हीं दूर-दराज के गांवों-देहातों की ओर निकल पड़ते। कोई आध्यात्मिक दार्शनिक नहीं। मार्क्स के यहां फिर भी वर्ग-भेद और वर्ग-युद्ध है। अनुपम की दृष्टि में सब पहले मनुष्य हैं, अंत तक भी उन्हें इसी की साधना करनी चाहिए और ‘पानी’ तो सबका बचना चाहिए। अनुपम को न केवल मनुष्य-समाज बल्कि प्राणिमात्र, स्थावर और जंगम सहित सबकी चिंता थी।
  • याद है जब वे मेरे कहीं जाने के लिए रिक्शा ढूंढ़ने गांधी स्मारक निधि के सामने वाले रिंग रोड पर राजघाट की ओर जाने वाले फ़ुटपाथ पर चल रहे थे, अपनी इन यात्राओं के बारे में बताते चल रहे थे कि इन दिनों वे किस काम में व्यस्त हैं। वो नब्बे के दशक की बात है। इसी सिलसिले में उन्होंने मुझसे मालवांचल के विदिशा जिले की बावड़ियों के बारे में जानना चाहा था। इसी सिलसिले में वे यह भी पूछ बैठे कि आपका गांव तो अयोध्या के पास है, वहां भी तो तालाब, बावड़ियां और कुएं खूब होंगे? तभी मेरा ध्यान उन तालाबों की ओर चला गया। बचपन में हम बच्चे जिसमें नहाते और जल-किल्लोल करते थे। चरागाहों से लौटते पशु पानी पिया करते थे। विदिशा की बावड़ियां तो स्थापत्य की अद्भुत रचनाएं हैं। अनुपम राजा भगीरथ की तरह चाहते थे कि आसन्न जल-संकट से बचने का बस एक ही उपाय है कि इन सबका पुनरुद्धार किया जाए। ‘आज भी खरे हैं तालाब’ उनकी इसी साधना की परिणति है। दुनिया को न भी सही (गोकि बाद में दुनिया ने भी उन्हें माना) पर देश को वे यह याद दिलाना चाहते थे कि पानी के संरक्षण की जिन विधियों को हमारे पुरखों ने खोजा था, वे आज भी हमारे काम की हैं। अनुपम मिश्र का दर्द इन नदियों और पहाड़ों के लिए भी था। कहें तो समूचे पर्यावरण के लिए था। अकारण नहीं उनकी कोशिश से गांधी शांति प्रतिष्ठान के पर्यावरण-कक्ष से साफ़-सुथरी हिंदी में जो पहली ख़ूबसूरत किताब आई, वह ‘हमारा पर्यावरण’ थी। हिंदी भाषा और साहित्य के मौसमी ठेकेदारों ने उसे शायद ही अपने काम का समझा।
    वे सब तो व्याकरण -अनुवाद, कविता-कहानी के बल पर हिंदी को बचाए और जिलाए रखना चाहते थे। सभ्य शासन बड़े लोगों के लिए तो स्वीमिंग पुल तक सोच पाता था। बाद में तो उनकी एक और ख़ूबसूरत और महत्वपूर्ण किताब हमारे हाथ आई — ‘राजस्थान की रजत बूंदें’। दोनों ही में जल-संरक्षण की विधियों के साथ-साथ जल के प्रति लोक-व्यवहार की ख़ूबसूरती और नैतिकता की भी याद दिलाई गई थी। आज तो हम ख़ूबसूरत, एडवांस और सभ्य लोग (?) अपनी पहुंच से नदियों-झरनों-पहाड़ों से उनकी नैसर्गिक दिव्यता छीन उन्हें बदसूरत और बदहाल बनाए दे रहे हैं। अनुपम मिश्र ने बीच-बीच में हमारे इस सभ्याचरण पर भी मीठी शिकायतें की हैं, पर हमारी चमड़ी कितनी मोटी है, इसे वे शायद समझ नहीं पाए। फिर हम अपने भोगोन्माद में इतने मस्त हैं कि हमें भी ऐसे अनुपमों की क्या परवाह!
    चाहे सारी नदियों को जोड़ने की बात हो, चाहे बड़े-बड़े बांधों को बनाने की, अनुपम और उनके साथी शायद ही कभी इससे सहमत हो पाए। अख़बारों में इसके बारे में वे निरंतर शासनकर्ताओं को आगाह करते रहे। अनुपम की लिखी एक और किताब उनके द्वारा भेजी जाकर मुझे मिली थी — ‘तैरने वाला समाज डूब रहा है’। उनके इन शीर्षकों के शब्दों पर सोचता हूं तो सोचता ही रह जाता हूं।
  • तालाबों के आगे ‘खरे’ और बूंदों के पहले ‘रजत’ जैसे विशेषणों का प्रयोग मुझे सोचने को मजबूर करता है। तुलसीदास ने इस ‘खरे’ शब्द का प्रयोग कई जगहों पर किया है — ‘राम सो खरो है कौन, मो सो कौन खोटो।’ यहां खरा का ठीक-ठीक अर्थ-बोध होता है। अनुपम को कभी तुलसी पढ़ते तो नहीं देखा, पर उनके कवि-पिता के सिरहाने रामकिंकर उपाध्याय की मानस-व्याख्याओं को रखे कभी ज़रूर देखा था। तब और कुछ नहीं तो अनुपम की सांस में भी इसकी गंध गई होगी।
    एक और बात जो अनुपम मिश्र की गद्य-भाषा को लेकर कहना चाहता हूं, वह यह कि उनके शब्द बेहद घरेलू और वाक्य साफ़-सुथरे, अनलंकृत। सादे तो इतने जैसे दूध-भात हों। विचारों में पौष्टिकता से भरपूर और चौपालों पर चर्चा के योग्य। पर उनमें इतनी शालीनता और विनम्रता भी जैसे वे उनके नहीं, आम लोक-जीवन की आपसी चिंताओं की बतकहियां हों।
    सर्वथा अहिंसक स्वभाव के अनुपम हमारे समय की ऐसी उपस्थिति थे, जिसे अतिवादी सभ्यता का उपचारक कहा जा सकता है। भोगवाद के विरुद्ध बगैर किसी सीधी और आक्रामक टिप्पणी के वे अपने मुहावरे में कुछ ऐसा कह जाते थे जिसके चलते हमें अपने रंग-ढंग पर कई बार सोचना पड़ता था।
    अनुपम यों तो लगभग सात दशकों का जीवन जी चुके थे। इकलौते बेटे शुभम को भी गृहास्थाश्रम में प्रवेश करा चुके थे। तब भी हमारी इस दुनिया को उनकी ज़रूरत थी। अब इस ज़िम्मेदारी को कौन लेता है, यही देखना है।
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