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आपके अंदर मैडनेस होना जरूरी है...

सलोनी अरोरा | Mar 12, 2017, 14:14 IST

  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
आपके अंदर मैडनेस होना जरूरी है...
आमिर खान 14 मार्च को 52 वर्ष के हो रहे हैं। निर्माता-निर्देशक परिवार के युवक की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के सबसे बड़े एक्टर बनने की यात्रा बहुत ही रोचक है। आज ना केवल कमर्शियल सिनेमा में मेथड एक्टिंग करने के साथ आमिर की फिल्में सबसे बड़ी कमाई करने वाली हैं। भाषा हो या लुक बारीकी से किरदार में ढलते हैं। आमिर के जन्मदिन पर उनकी जिंदगी के कुछ खास पहलुओं को हम साझा कर रहे हैं...

मे री फिल्मों में आने की कहानी बहुत इंटरेस्टिंग है। मेरे चचाजान (नासिर हुसैन), अब्बाजान (ताहिर हुसैन) यहां तक कि अम्मी भी नहीं चाहतीं थी कि मैं फिल्मों में आऊं। उन्हें लगता था कि कुछ ऐसा काम करूं जिसमें कुछ सिक्योरिटी नहीं है। मैं कॅरिअर के लिए कुछ स्टेबल करूं। वो चाहते थे मैं इंजीनियर या डॉक्टर बनूं लेकिन मैं ये सब नहीं कर पाया। उन्हें लगता था फिल्मों में डाउनफॉल बहुत जल्दी मिलते हैं, उन्हें लगता था कि मैं कैसे उन सब चीजों को झेल पाऊंगा। वे लोग प्रोटेक्टिव थे मेरे लिए, लेकिन मैं कुछ और कर ही नहीं कर पाया। मैं खुद भी नहीं चाहता था कि उन पर मुझे लांच करने की जिम्मेदारी हो।
मैं एफटीआईआई में जा रहा था, कुछ शार्ट फिल्मों के लिए काम। मेरा दोस्त आदित्य भट्टाचार्य ने एक शार्ट फिल्म बना रहा था "पैरानॉयड', उसमे कोई डायलाग या म्यूजिक कुछ नहीं था। वो चालीस मिनट की फिल्म थी। जब मैं उसके लिए शूटिंग करने जाता तो सुबह हॉकी लेकर निकलता, घर में सबको ऐसा बताता कि मैच खेलने जा रहा हूं। उस फिल्म में मैं हीरो, स्पॉट बॉय, अस्सिटेंट सबकुछ था। जब फिल्म बन गयी तो डिंपल थिएटर में उसकी स्क्रीनिंग शबाना जी के लिए रखी। फिल्म देखने के बाद उन्होंने कहा मुझे ये तो समझ नहीं आया कि तुम लोगों ने क्या बनाया है लेकिन वो लड़का कौन है। मैं वहीं था मैं उनसे मिला तो उन्हें बताया गया कि मैं ताहिर साहब का बेटा हूं। वे उस समय उनकी फिल्म कर रही थी कहने लगी मैं ताहिर को बताउंगी। मैंने कहा आप ऐसा नहीं कर सकती उन्हें मत बताइयेगा। ऐसा ही दूसरा वाकया हुआ जावेद साहब के साथ। मैं नासिर साहब के साथ ऑफिस में कुछ पेपरवर्क कर रहा था। उसी दौरान जावेद साहब उनसे मिलने आये। उन्होंने पूछा ये कौन है? चचाजान ने बताया कि मेरा भतीजा है, मुझे असिस्ट कर रहा है।
जावेद साहब ने कहा "इसको स्टार होना चाहिए, सहायक क्यों बना रखा है?' मेरे कान उनकी बातचीत में ही लगे थे। मन में सोच रहा था लेकिन कभी कह नहीं पाया कि अब तो सब कह रहे हैं बना ही दीजिये फिल्म। ये बात यही खत्म हो गयी। फिर एक दिन मैं चचाजान के साथ उनके किसी दोस्त को मिलने गए। उन्होंने मुझे अपने दोस्त से मिलवाया उसके बारे में बताया। फिर दोस्त को बोले "ये मेरी अगली फिल्म का हीरो है। लव स्टोरी फिल्म बना रहे हैं हम।' तब मुझे पता चला कि मेरे लिए वे फिल्म बना रहे हैं। इसके पहले तक मुझे यही लगता था कि वो नहीं चाहते मैं फिल्मों में आऊ। उसी दौरान उन्होंने और मंसूर (मंसूर खान ,कजिन) ने 'होली' देखी थी। तब उन्होंने तय किया कि मुझे फिल्म में ले रहे हैं। 'क़यामत से क़यामत तक' का बनना तय हुआ। मंसूर उस समय दूसरी फिल्म लिख रहे थे। बाद में चचाजान की तबियत गड़बड़ हुई तो तय हुआ कि मंसूर ही फिल्म निर्देशित करेंगे। मंसूर ने स्क्रिप्ट पढ़ी और कहा कि वे थोड़े चेंजेस चाहते हैं। उनके चेंजेस इतने थे कि 80 फ़ीसदी फिल्म बदल गयी। तब QSQT का टाइटल "नफरत के वारिस' था। हम लोग इससे सहमत नहीं थे। कई चर्चाओं में एक बार मंसूर ने अंग्रेजी में कहा कि टाइटल ऐसा होना चाहिए जैसे "हियर टू इटरनिटी', चचाजान ने तब इसे "क़यामत से क़यामत तक' नाम दिया। उसकी एंडिंग भी दो तरह की थी।

मेरी डायरी
मेरी एक डायरी है जिसमंे संवाद और शब्द लिखता हूं और उससे ही रियाज करता हूं। मैं कम फिल्में करता हूं लेकिन मेरा काम करने का तरीका ही ऐसा है। मैं एक साथ दो फिल्में नहीं कर सकता। दंगल के लिए फिजिकल ट्रांसफॉर्मेशन के कारण फिल्म को ज्यादा वक्त देना जरूरी था।

जल्दबाजी नहीं
शुरुआती दौर में कुछेक फिल्में मेरी गलत रहीं। इसका इल्जाम किसी को नहीं दूंगा। उसके बाद मैंने तय किया जल्दबाजी में फिल्में नहीं करूंगा। फिल्म बनाते समय ऐसा कोई मकसद नहीं होता कि उसकी कमर्शियल सक्सेस को ध्यान में रखें। हम सिर्फ अच्छी कहानी कहने की कोशिश करते हैं। "तारे जमीन पर', "थ्री इडियट्स' हो या "पीके' या फिर "दंगल'।
एक लाइन में सुनाओ कहानी...
चचाजान के साथ मैंने फिल्मों के अलावा जिंदगी के भी कई सबक सीखे हैं। उनकी एक आदत थी जब भी कोई कहानी सुनाने आता तो आखरी में उससे पूछते इस कहानी को एक लाइन में बताओ। जो एक लाइन में ना बता सके मतलब सब गड़बड़ है। एक और बात वो हमेशा कहते थे एक्टर को सीन को गहरायी से समझना चाहिए। पर्सनल जिंदगी में उनके काम करने का तरीका बहुत अलग था। वे हमेशा अपनी शूटिंग वगैरह के काम निपटा कर शाम को छह बजे घर लौट आते थे, मैं तो आज तक ऐसा नहीं कर पाया।
बायोग्राफी पढ़ता हूं
फिल्मी पर्सनालिटीज पर लिखी गयी किताबंे पढ़ना पसंद करता हूं। मैंने नरगिस जी, मीना कुमारी, गुरु दत्त जी पर लिखी किताबें पढ़ी हैं। सिर्फ इंडियन ही नहीं विदेशी कलाकारों के बारे में पढ़ता हूं। मुझे लगता है कुछ समय के लिए उनके दौर को, उस दुनिया को मैं फील कर लेता हूं। मैं जानता हूं जो सब लिखा जा रहा है वो पूरा सच नहीं है।
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Web Title: Navrang
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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