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हमारे सिनेमा की कल्चरल वैल्यू बहुत स्ट्रॉन्ग है

सलोनी अरोरा | Mar 19, 2017, 11:22 IST

हमारे सिनेमा की कल्चरल वैल्यू बहुत स्ट्रॉन्ग है
करीना और सैफ अली खान का बेटा तैमूर 20 मार्च को तीन महीने का हो रहा है। सैफ ने पैटरनिटी ब्रेक लेकर बेटे के साथ भरपूर वक्त बिताया और उसकी देख-रेख भी की। लेकिन अब वो अगली फिल्म 'शेफ' की शूटिंग पूरी करने में जुटे हैं। मुंबई के बांद्रा इलाके में सैफ का ऑफिस अनगिनत किताबें, हॉलीवुड की कुछ कल्ट फिल्मों के पोस्टर्स और उनकी खुद की फिल्मों के पोस्टर्स से सजा है। इसी ऑफिस में हुई मुलाकात में सैफ ने सिनेमा, परिवार और अपने कल्चर पर इत्मीनान से बात की...

आप 90 के दशक से हिंदी सिनेमा में काम कर रहे हैं, क्या बदलाव देखते हैं?
फिल्में बदल चुकी हैं। सिनेमा में मेच्युरिटी आ रही है। बॉलीवुड टाइप की फिल्में बनती रहेंगी, लेकिन जो हमारी इंडियन फिल्म इंडस्ट्री है वही ग्लोब में हमारी स्पेशल जगह बना सकती है। मुझे ये बॉलीवुड नाम ही पसंद नहीं, कुछ गंदा सा लगता है। दिलीप कुमार साहब, विमल रॉय, गुरु दत्त इन लोगों को बॉलीवुड से नहीं जोड़ सकते। मेरे दिमाग में बॉलीवुड एक चटपटा, नाच-गाना टाइप मूवमेंट था जो आने वाले वर्षों में कम हो जाएगा या ख़त्म हो जाएगा। हम लोग फिर से उस दौर को सेलिब्रेट करने लगेंगे जिसे हम इंडियन फिल्म इंडस्ट्री कह सके। मुझे तो उम्मीद है ऐसा होगा।

आपकी फिल्मों का चयन बदल गया है?
फिल्में बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। इंडिया का कल्चर फिल्मों में अब तक काफी कायम है। आर्टिस्ट की जिम्मेदारी होती है जितनी अच्छी फिल्म बना सके बनाए और इंटेलीजेंट निर्देशकों के साथ काम करे। हमारे सिनेमा की कल्चरल वैल्यू बहुत स्ट्राॅन्ग है। मैं सिर्फ अच्छे डायरेक्टर्स के साथ काम करना चाहता हूं और अपनी अच्छी फिल्मोग्राफी डेवलप करना चाहता हूं। मैंने अलग-अलग तरह की फिल्में की हैं अपने कॅरिअर में कुछ अच्छी, कुछ बुरी।

हर आर्टिस्ट कहता है बुरी फिल्में दोस्तों के लिए की? आपने भी...?
ऐसा नहीं कि जो फिल्में गलत की वो दोस्ती में की। कभी मैंने ही ज्यादा सोचा नहीं, कभी ध्यान उठ गया। सोचा ये ट्रेंड चल रहा है तो चलेगा ही। अब मैं सिर्फ अच्छी फिल्में करना चाहूंगा। काफी मेहनत करनी पड़ती है। फिल्मों में काम करना आसान नहीं होता। शहर में ट्रैफिक भी इतना है कि आपको सेट पर पहुंचने में दो-तीन घंटे लग जाते हैं। ऐसे में कोई काम करे तो उस काम का अर्थ होना चाहिए, उसका सही रिटर्न मिलना चाहिए। ऐसा नहीं कि सिर्फ आप नौकरी कर रहे हो तो जो काम मिले वो कर लें।

आप नवाब सैफ हैं, शूटिंग पर कितनी लग्जरी रहती है आपके साथ।
ऐसा कुछ नहीं है, जैसा शूटिंग का माहौल होता है वैसे रहते हैं। बचपन में हम जंगलों में घूमते थे, मैंने काफी आउटडोर कैंपिंग की है। इंडिया और विलायत में स्लीपिंग बैग, टेंट और बस की छत पे भी सोते थे। लोकेशन में फायदा हो, फिल्म में क्वालिटी आएगी तो मुझे कही पर भी ट्रेवल करने में परेशानी नहीं आती। मुझे याद है जब हमने "रेस' फिल्म की शूटिंग की थी, दुबई के बाहर तीन घंटे की ड्राइव थी। जब वहां पहुंचे तो चारों तरफ रेतीला और खाली रास्ता था। वो जगह मुझे बहुत खूबसूरत लगी। मैंने डायरेक्टर्स को ये नहीं कहा कि तीन घंटे ट्रेवल करके इतना बाहर ले आए। मैंने ख़ुशी जाहिर की। आज भी मुझमें वही बात है। जंगलों में आसानी से शूटिंग कर लेता हूं। एक्टर के तौर पर मैं काफी जिम्मेदारी खुद भी उठाता हूं, अपने कपड़े, लुक्स सभी पर मेहनत करता हूं। सब कुछ डायरेक्टर पर नहीं छोड़ता। डायरेक्टर सबसे बिजी इंसान होते हैं उन्हें शूटिंग के साथ अरेंजमेंट भी देखने होते हैं। मैं काफी तैयारियां अपने आप ही करता हूं।

अपनी फिल्में एडिटिंग के दौरान देखते हैं?
मैं अपनी फिल्में नहीं देखता। मैंने एक्टर के तौर पर मेहनत की, ईमानदारी से अपना काम किया। अब बाद में किस तरह से डायरेक्टर उसको एडिट करेंगे, क्या कहां एडजस्ट करेंगे, कुछ पता नहीं होता। एडिट का मतलब ये नहीं कि पूरा सीन उड़ा दिया, मतलब कैसे काट के कहां जोड़ा। इसके बाद फिल्म पूरी कैसी लगेगी। हॉलीवुड में जॉनी डेप कहते हैं "मैं फिल्म की शूटिंग करने के बाद कभी देखता नहीं क्योंकि मैं देखना ही नहीं चाहता कि क्या किया उन्होंने फिल्म के साथ।' ये बात ज्यादा लोग समझ नहीं पाएंगे, लेकिन मैं अब समझता हूं। शूटिंग के बाद कैसे बिगाड़ा या सुधारा या जोड़ा जा सकता है। कुछ साल पहले मैं बहुत बैचैन होता था कि देखूं क्या बनाया है, कैसे बनाया है। अब मुझे सिर्फ इस बात का डर रहता है कि फिल्म अच्छी बनी हो। वरना मुझे बहुत बुरा लगता है, क्योंकि मेहनत के साथ हम खुद से ही बहुत उम्मीदें कर लेते हैं। अब मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता यदि मैं अपनी फिल्में ना भी देखूं। दूसरे लोग देखे और बताए कि आपने कैसा काम किया।

ये एक्टर सैफ का इवॉल्विंग फेज है?
इंसान इवॉल्व होगा तो एक्टर अपने आप होगा। मेरी आने वाली फिल्में बहुत अलग और अच्छी हैं। उनमें जो कहानी हैं, वो दिल को छूने वाली हैं।

आपके ऑफिस में किताबें बहुत सारी हैं?
पपप ये तो वह सब हैं जिन्हें मैं पढ़ चुका हूं। मेरा घर ऑफिस के ऊपर वाले फ्लोर पर ही है। इससे ज्यादा किताबें घर पर हैं। जिन किताबों को फिर से पढ़ना चाहता हूं उन्हें भी घर पर रखा हुआ है। अब बुक्स ऑफिस में शिफ्ट कर दी हैं। इन दिनों क्रिश्चियनिटी के इतिहास की एक किताब है, बहुत रोचक है वही पढ़ रहा हूं।
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Web Title: Navrang
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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