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Cover Story:इन महिला अफसरों ने नक्सल इलाकों में बदलाव अभियान छेड़ा

dainikbhaskar.com | Jan 22, 2017, 00:00 IST

Cover Story:इन महिला अफसरों ने नक्सल इलाकों में बदलाव अभियान छेड़ा

बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्र में हाल ही में सीआरपीएफ की डिप्टी कमांडेंट बनकर आई उषा किरन इस समय सुर्खियों में हैं। नक्सल समस्या से जूझ रहे बस्तर संभाग में विषम परिस्थितियों और चुनौतियों से लड़ने वाली और कई उषा भी हैं, जो लंबे समय से वहां डटी हुई हैं। ये उच्चशिक्षित महिलाएं जान जोखिम में डालकर उन इलाकों में ड्यूटी कर रही हैं जिनमें पहले केवल पुरुष ही काम करते थे। ये दुर्गम इलाकों में पैदल और बाइक से पहुंचती हैं। लोगों की समस्याओं के हल खोजती हैं। उनके अच्छे व्यवहार से पुलिस की छवि बदली है। पढि़ए रायपुर से संदीप राजवाड़े की रिपोर्ट...

पहली पोस्टिंग से अब तक यहीं डटी हैं...
संगीता पीटर डीएसपी , कोंडागांव

डीएसपी संगीता पीटर पिछले 7 साल से नक्सल प्रभावित बस्तर क्षेत्र में तैनात हैं। 2009 में जगदलपुर से शुरू हुई जिम्मेदारी अब कोंडागांव जिले तक जारी है। वे बताती हैं कि यहां महिला अधिकारी की तैनाती कम ही की जाती है। संगीता की भी ड्यूटी पुलिस हेडक्वार्टर में है लेकिन उन्हें लोहांडीगुड़ा के एसडीओपी का प्रभार मिलने से प्रभावित थानाें तक मूवमेंट रखना होता है। इसके अलावा जिले या नक्सली प्रभावित किसी भी गांव में महिलाओं के साथ होने वाली घटनाओं की जांच-पड़ताल के लिए उन्हें जाना पड़ता है। वे बताती हैं कि हम गांव के लोगों के बीच जाकर उनके मन में पुलिस के प्रति विश्वास जगाने के लिए उनके बीच खाना और कैंप का आयोजन कर कम्युनिटी पुलिसिंग पर जोर दे रहे हैं। इसका असर भी दिखाई दे रहा है अब गांव की महिलाएं हमें देखकर बात करने को तैयार हो रही हैं और हमसे जुड़ रही हैं।
जिले में सिर्फ एक ही महिला अधिकारी...
ममता कहरा एसआई नारायणपुर

सब इंस्पेक्टर ममता कहरा ने नक्सल प्रभावित नारायणपुर जिले में 5 साल बिताएं हंै। जिले के किसी भी गांव या नक्सल प्रभावित क्षेत्र में महिला अपराध होने पर उन्हें ही जांच के लिए जाना पड़ता था। उनके काम के दौरान जिले में न तो कोई महिला पुलिस अधिकारी थी न ही उनके नीचे कोई एएसआई। कई बार तो बिना किसी फोर्स के ही बाइक में कुछ जवानों के साथ सादी पोशाक में गांव के अंदर गई हैं। वे बताती है कि पुलिस को आता देख नक्सली अपनी उपस्थिति बताने के लिए पहले तो फटाका फोड़ने के साथ तुरही (एक तरह का वाद्ययंत्र) बजाते हुए चेताते हैं। हम भी जवानों के साथ उनकी ही दिशा में बढ़ते हैं तो वे पीछे चले जाते हैं। गांववालों से बात करने के लिए कभी-कभी अपना परिचय छिपाते हुए दूसरे विभाग जैसे राशन कार्ड, स्वास्थ्य विभाग वाले या सर्वेयर बनकर जाना पड़ता है।
हथियार और घेरे के बीच जिंदगी...
उनैजा खातून डीएसपी बीजापुर

डीएसपी उनैजा खातून अंसारी पिछले डेढ़ साल से बीजापुर में तैनात हैं। वे बताती हैं कि जब उनका ट्रांसफर नक्सल प्रभावित इस जिले में हुआ तो उन्होंने इसे अन्य पदस्थापना की तरह लिया। इस जिले में महिला अधिकारियों के साथ करीब 100 महिलाकर्मी पदस्थ हैं। महिलाओं को सर्चिंग में शामिल नहीं किया जाता है। उन्होंने बताया कि जिला मुख्यालय कार्यालय के साथ उन्हें आवापल्ली एसडीओपी का चार्ज भी दिया गया है। उस एरिया में नक्सल प्रभावित तीन प्रमुख थाने आते हैं, जहां जांच या गांव तक अक्सर जाना होता है। कई बार नक्सलियों की उपस्थिति और सामने से नक्सली वर्दी पहने लोगों से भी सामना हुआ है। उनकी गोलियों के बीच अपने कदम बढ़ाने होते हैं। कई बार क्राइम सीन और पीड़िता से बात करने के लिए उन्हें तैयार करना और समझाना कठिन हो जाता है।

नक्सली क्षेत्र से
ग्राउंड रिपोर्ट

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Web Title: Rasrang
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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