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CRIME: हमदर्दी के लिए खतरनाक अपराधी लेते हैं मानसिक बीमारी का सहारा

पवन कुमार | Feb 20, 2017, 11:32 IST

  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
CRIME: हमदर्दी के लिए खतरनाक अपराधी लेते हैं मानसिक बीमारी का सहारा
देश में साइको किलिंग के मामले सामने आ रहे हैं। हाल ही में एक और वीभत्स चेहरा सामने आया। खुद को आईआईटियन बताने वाले उदयन ने भोपाल में अपनी गर्लफ्रेन्ड की हत्या कर उसे संदूक में सीमेंट के घोल में दफना दिया । बाद में एक और खुलासा हुआ- उदयन अपने माता-पिता की हत्या कर पहले ही उन्हें घर के बगीचे में गाड़ चुका था। ऐसे अधिकतर मामलों में सजा में नरमी के लिए आरोपी खुद को मानसिक बीमार बताते हैं। भास्कर ने ऐसे ही तीन चर्चित मामलों की पड़ताल की। खुद वकीलों, विशेषज्ञों ने कहा- साइको क्रिमिनल्स अपराध करने से पहले अच्छे से जानते हैं कि उनका शिकार कौन है, जब पकड़े जाते हैं तो बीमारी का बहाना बनाने लगते हैं।
पढ़िए दिल्ली से पवन कुमार की रिपोर्ट...
केस-1... झारखंड ,सुरेंद्र मिश्रा
11 अगस्त 2000 को एक आटो पार्ट्स व्यापारी चंद्रशेखर चौबे अपने ड्राइवर विद्युत कुमार मोदी के साथ कार में छास नाला के पास पहुंचे। इसी दौरान एक मेडिकल स्टोर का मालिक सुरेंद्र मिश्रा वहां आया और उसने देसी कट्‌टे से चौबे की गोली मार कर हत्या कर दी। हत्या के बाद सुरेंद्र व्यापारी के ड्राइवर को धमकी देते हुए वहां से फरार हो गया। इस मामले में पुलिस ने सुरेंद्र मिश्रा पर हत्या का मामला दर्ज कर उसे गिरफ्तार किया था। निचली अदालत ने सुरेंद्र मिश्रा को उम्रकैद की सजा सुनाई। हाईकोर्ट ने भी इसे बरकरार रखा। जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो सुरेंद्र के वकील ने आईपीसी 84 का सहारा लेते हुए सुरेंद्र की सजा माफ करने की अपील की।
बचाव में कहा...
वकील ने कहा सुरेंद्र सिजोफ्रेनिया से पीड़ित है। घटना के बाद सुरेंद्र को कुछ याद नहीं रहता। बीमारी की अवस्था में उसे शिव भगवान दिखाई देते हैं और वह उसे कुछ भी करने का आदेश देते हैं।
सबूत के तौर पर सुरेंद्र के उपचार की वर्ष 1987 व 1988 की दवा की पर्चियां भी पेश की थीं।
याचिका खारिज करते हुए जज ने सवाल उठाया...
वो यूं तो सभी काम करने में सक्षम है, ऐसे में उसे पागल कैसे मानें? बीमार था तो भागा कैसे, गवाह को कैसे धमकाया?
2011 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जज पी सताशिवम व सीके प्रसाद की पीठ ने फैसला सुनातेे हुुए कहा कि अगर सुरेंद्र मिश्रा ने सिजोफ्रेनिया से पीड़ित होकर यह अपराध किया होता तो वह मौके से भागता नहीं। उसने ड्राइवर को धमकी भी दी। इसलिए दलील को खारिज किया जाता है।
दलील... वो धारा जिसका अपराधी फायदा उठाते हैं
भारतीय दंड संहिता की धारा 84 के तहत यह प्रावधान है कि किसी भी मानसिक रोगी द्वारा अगर खराब मानसिक दशा के दौरान हत्या या अन्य गंभीर अपराध कर दिया जाता है तो उसे सजा नहीं दी जा सकती। इस प्रावधान के तहत बचाया जा सकता है। पर यह साबित करना होता है कि घटना के समय वह मानसिक रूप से बीमार था।
सुमीत वर्मा, अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट
केस-2... कर्नाटक, बीए उमेश रेड्‌डी
21 महिलाओं से दुष्कर्म, हत्या करके निशानी के लिए कपड़े रख लेता था

कभी बेंगलुरू में लड़कियों के लिए दहशत का पर्याय बने कुख्यात उमेश रेड्‌डी को जयश्री मराडी से दुष्कर्म व हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। खुद को "जैक द रिपर' के नाम से प्रचारित करने वाले रेड्‌डी पर 21 महिलाओं सेे दुष्कर्म व हत्या के मुकदमे दर्ज किए गए थे। 1998 में पुलिस ने उमेश को यशवंतपुर से गिरफ्तार किया था, जहां उसके पास से एक बैग बरामद हुआ, जिसमें महिलाओं के अंडरगार्मेंट्स थे। वर्ष 2006 में रेड्‌डी को हाईकोर्ट ने मौत की सजा सुनाई थी। जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी 1 फरवरी 2011 को बरकरार रखा। राष्ट्रपति ने 12 मई 2012 को और राज्य सरकार ने 7 मई 2012 को रेड्‌डी की दया याचिका खारिज कर दी। रेड्‌डी पर 21 केस दर्ज हुए थे लेकिन 9 मामलों में अपराध साबित नहीं हुआ।
खुद कानून पढ़ा, बचाव में दी दलील
खुद आरोपी उमेश ने कानून पढ़ा। माफी के लिए पुनर्विचार याचिका दायर की।
कभी बेंगलुरू में लड़कियों के लिए दहशत का पर्याय बने कुख्यात उमेश रेड्‌डी को जयश्री मराडी से दुष्कर्म व हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। खुद को "जैक द रिपर' के नाम से प्रचारित करने वाले रेड्‌डी पर 21 महिलाओं सेे दुष्कर्म व हत्या के मुकदमे दर्ज किए गए थे। 1998 में पुलिस ने उमेश को यशवंतपुर से गिरफ्तार किया था, जहां उसके पास से एक बैग बरामद हुआ, जिसमें महिलाओं के अंडरगार्मेंट्स थे। वर्ष 2006 में रेड्‌डी को हाईकोर्ट ने मौत की सजा सुनाई थी। जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी 1 फरवरी 2011 को बरकरार रखा। राष्ट्रपति ने 12 मई 2012 को और राज्य सरकार ने 7 मई 2012 को रेड्‌डी की दया याचिका खारिज कर दी। रेड्‌डी पर 21 केस दर्ज हुए थे लेकिन 9 मामलों में अपराध साबित नहीं हुआ।
याचिका ठुकराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा...
नृशंस हत्या का एक मामला ही मौत की सजा के लिए पर्याप्त है। यहां तो 11 मामले हैं, अपराध के समय बीमार होने का एक भी सबूत नहीं।
यह कहते हुए जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने 15 अक्टूबर 2016 को पुनर्विचार याचिका खारिज दी। यह भी कहा था कि रेड्‌डी ने जो तथ्य पेश किए हैं, उससे यह कहीं साबित नहीं होता कि अपराध करते समय वह सिजोफ्रेनिया पीड़ित था।
तर्क... केस के सभी पहलुओं के आधार पर तय होते हैं
अदालत दो तरीकों से सच पता करती है। पहला यह कि केस के सभी पहलुओं को देखती है कि हत्या या अन्य गंभीर अपराध किन हालातों में हुआ। दूसरा तरीका यह होता है कि अदालत आरोपी की सत्यता की जांच के लिए एक मेडिकल बोर्ड का गठन करने का आदेश देती है। सजा से बचाने के लिए मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट भी काफी नहीं है।
गौरांग कंठ, अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट
केस-3... मध्य प्रदेश,हरि सिंह गोंड
ससुर को मारकर जला दिया फिर पागलपन के दौरे की दलील दी
23 फरवरी 1995 को श्यामलाल अपने दामाद हरि सिंह गोंड को उपचार के लिए मोहदा से सिंघनपुरी लेकर आया। उस समय श्यामलाल का ससुर हरिलाल भी उसके घर पर आया हुआ था। अचानक रात साढ़े 3 बजे ससुर हरिलाल का शोर सुनकर श्यामलाल की आंख खुल गई। उसने देखा कि उसका दामाद लाठी से उसके ससुर हरिलाल को पीट रहा है। उसने बीच बचाव का प्रयास किया तो उसने उस पर भी लाठी से हमला कर दिया। कुछ देर बाद वह पड़ोसियों को लेकर आया तो देखा घर में आग लगी थी। इस आग में उसका ससुर हरिलाल जलकर मर गया। हरी सिंह गोंड को पुलिस के हवाले कर दिया गया। पुलिस ने जांच की तोे पाया कि हरि सिंह ने हरिलाल की हत्या कर उसके शव को जलाया है।
बचाव में कहा...
आईपीसी 84 के

प्रावधानों का हवाला देकर खुद को सिजोफ्रेनिया बीमारी से पीड़ित
मानसिक रोगी बताते हुए सजा माफ करने की अपील की।
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई जिसे कोर्ट ने 28 अगस्त 2008 को सुनवाई करतेे हुुए याचिका को खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा...
पहले होशोहवास में हत्या की, बाद में खुद को मानसिक रोगी बता कर कहा-कुछ याद नहीं। इसे सच कैसे मान लें।
ऐसा सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जस्टिस डा. अरिजीत पसायत और जस्टिस मुकुंदाकम शर्मा की पीठ ने अपने फैसले में कहा था। यह भी टिप्पणी की गई थी कि जो आईपीसी 84 का हवाला देकर राहत मांगता है उसे कानूनी तौर पर खुद को पागल साबित करना होगा।
तर्क... केस के सभी पहलुओं के आधार पर तय होते हैं
अदालत दो तरीकों से सच पता करती है। पहला यह कि केस के सभी पहलुओं को देखती है कि हत्या या अन्य गंभीर अपराध किन हालातों में हुआ। दूसरा तरीका यह होता है कि अदालत आरोपी की सत्यता की जांच के लिए एक मेडिकल बोर्ड का गठन करने का आदेश देती है। सजा से बचाने के लिए मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट भी काफी नहीं है।
गौरांग कंठ, अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट
... और तथ्य जिनके आधार पर कोर्ट फैसला लेती है
हम सबसे पहले यह देखते हैं कि आरोपी की मानसिक स्थिति सही में खराब है या वो बहाना कर रहा है। आरोपी से अलग-अलग तरह से विशेषज्ञ बातचीत करते हैं। उसके व्यवहार का अध्ययन करते हैं। बीमारी का पिछला रिकार्ड देखते हैं। इसके बाद अपनी रिपोर्ट तैयार कर अदालत को सौंपते हैं।
डा. नीमेश डी देसाई, निदेशक, इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड अलाइड साइंस
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Web Title: Rasrang
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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