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कहानी: झींफरा

Rasrang | Feb 20, 2017, 17:43 IST

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कहानी: झींफरा
कोई किसी का दिया हुआ नहीं खाता। पशु तो अपनी मेहनत की कमाई ही खाता है! ईश्वर ने जिसे चोंच दी है चुग्गा भी देता है...
उसने अपनी जेब से चश्मा निकालकर धोती के पल्ले से अच्छी तरह पोंछा। चश्मे की कमानियों पर पक्का धागा बंधा हुआ था जो कि पसीने और मैल से काला पड़ गया था। चश्मे को पोंछा और आंखों पर चढ़ाकर उसका धागा कानों में लपेट लिया। अब उसकी आंखें मोटी-मोटी दिखने लगीं, अपनी जवानी के दिनों में तो इन आंखों की त्यौरियां और सुंदरता देखने लायक थीं। अचानक सिर में चीसें चलने लगीं। डॉक्टर के पास पहुंचा तो पता चला कि काला मोतिया हो रहा है। जल्दी से ऑपरेशन करवाना ही इलाज है नहीं तो रोशनी जाने का भी खतरा है। उन्होंने ऑपरेशन करवा लिया। तब से चश्मे का साथ है, उन्होंने झुककर बड़ी कठिनाई से लाठी उठाई और धीरे-धीरे चलकर बाड़े में आ गए जहां पशु बंधे हुए थे। एक ओर दो सुंदर भैंसें खड़ी थीं वे पैंतीस-चालीस लीटर दूध देती हैं। एक ओर ट्रैक्टर खड़ा है जिसके ऊपर उनका पोता पड़ोसियों के दो-तीन बच्चों के साथ बैठा खेल रहा है। भरा-पूरा एक किसान का परिवार किन्तु बूढ़े की आंखों में बेबसी और उदासी छाई दिखाई देती है।
उसने आवाज दी, ‘ओ किशन की मां! क्या कर रही है? पता नहीं सारे दिन कहां फंसी रहती है। पोती-पोतों से फुर्सत निकालकर मेरे पास आकर बैठ। आह! आज तो चला ही नहीं जाता। जोड़-जोड़ दर्द कर रहा है। पता ही नहीं लगता क्या दर्द कर रहा है। कहां दर्द हो रहा है? बुढ़ापा भी तो रोग है। सबसे बड़ा रोग! सारी हारी-बीमारी बुढ़ापे में आकर इन्सान को दबोच लेती है। ..... ओह! अब तो हिलना-डुलना ही मुश्किल होता जा रहा है दिनों दिन। तुमने सुना क्या किशन की मां? किशन क्या कह रहा था? वह कह रहा था अपने ऊंट झींफरे की एक टांग टूट गई। बेकार हो गया वह! वह भी तो बूढ़ा हो गया बेचारा! ऊपर से टांग और टूट गई! अरे! बेटा हम भी तो अब बूढ़े और बेकार हो गये!
बूढ़ा बड़बड़ाता रहा। बोलते-बोलते उसकी आंखों में आंसू भर आए। पैर कांपने लगे। उसने धीरे-धीरे लाठी का सहारा लेकर एक हाथ जमीन पर टिका लिया फिर धरती पर ही बैठ गया। उसकी आवाज सुनकर उसकी पत्नी आई! बुढ़िया की उम्र कोई पैंसठ-छियासठ बरस की होगी। वह उसके पास आकर जमीन पर बैठ गई और डांटना शुरू कर दिया। ‘तुम्हारी आदत नहीं गई। सारे दिन बच्चों को रोकते-टोकते रहते हो। आपका क्या लेते हैं? उनको अपनी मर्जी के अनुसार काम करना चाहिए। पर आप हरेक बात में टांग अड़ाये बगैर नहीं मानते। क्या बात हो गई। झींफरे को क्या हो गया...? कहकर बुढ़िया बूढ़े की ओर देखने लगी।
बूढ़ा पता नहीं कौनसी दुनिया में जाकर खो गया। बुढ़िया की बात सुनकर एकदम चमका। ‘हूं! क्या हुआ? कुछ नहीं हुआ! बस झींफरा बूढ़ा हो गया। उसकी टांग टूट गई... झींफरा अब इन लोगों के काम का नहीं रहा... तुम्हें याद है...? कहते-कहते बूढ़ा अतीत के गहरे कुएं में उतर गया। उसके झुर्रियां पड़े चेहरे पर कई रंग आये और उतर गए। जवानी के दिनों की झलक जैसे आंखों में तैर रही थी।... तुम्हें याद है क्या? मैं तुम्हें पीहर से लेकर आ रहा था। इस झींफरे पर बैठकर ही हम आ रहे थे। किशन की उम्र तब ग्यारह-बारह साल की होगी। राह में हमें दो लुटेरों ने रोक कर लूटना चाहा। उन्होंने झींफरे की नकेल की तरफ हाथ किया तो झींफरा गलगला कर उनके ऊपर चढ़ गया। फिर तो ऐसा भागा... ऐसा भागा... कि हवा हो गया! लुटेरे देखते ही रह गए। तुमने तो उस दिन घर आकर पूरे पांच रूपए का प्रसाद बांटा। उस दिन यदि झींफरा नहीं होता तो लुटेरे हमें जीते छोड़ देते क्या? कहीं पर मार-मूरकर फेंक देते। मैंने उस दिन झींफरे के पैरों में घुंघरू बांधे थे। वह जब छम-छम कर चलता तो देखने वाले देखते ही रह जाते। उस दिन तो तुमने भी कहा, ‘झींफरा! तू तो मेरे भाई जैसा है रे। तूने आज हमारी जान बचाई है। उस जमाने में जब लोग रुपए के दर्शन करे बिना ही मर जाते थे गांव के नम्बरदार ने झींफरे के पूरे पांच सौ रुपए बोल दिए। पर हमने बेचा नहीं। नम्बरदार ने कहा, ‘मामराज! तुम्हारे ऊंट सरीखा ऊंट इलाके में दूसरा नहीं है? कहते-कहते बूढ़े का गला भर आया। बुढ़िया की आंखों से आंसू सरक कर गालों पर आ गए। उसी झींफरे की आज टांग टूटी हुई है। किशन कहता है वह बेकार हो गया।
उस दिन गणगौर थी। अपने गांव में दस-बारह गांवों का मेला भरा था। ऊंटों की दौड़ हुई, हमारे झींफरे ने सबसे पहले आकर सौ रुपए और आधा सेर चांदी की शर्त जीती थी। वह तो झींफरे का दम-खम था कि अपनी किस्मत ही पलट दी। उन सौ रूपए से जमीन ठेके पर लेकर खेती की। इन्द्र देवता भी उस साल खूब बरसे। भरपूर फसल हुई। पूरी पांच सौ मन बाजरी और सौ मन मूंग-मोठ हुए थे। घर में रखने को जगह ही नहीं थी। झींफरै ने अपनी ताकत से सारी जमीन उलटकर उपजाऊ बना दी। इस झींफरै के प्रताप से हम साल दर साल मालदार होते गए। घर में अन्न-धन के भंडार भर गए। इस झींफरै के ही बलबूते पर किशन बड़े से बड़े कालेज में उच्च शिक्षा प्राप्त कर आज बड़ा किसान बन गया। खेती-बाड़ी की पढ़ाई करके नए-नए तरीकों से खेती करने लगा। यहां तक तो ठीक है पर कुछ तो पशुधन की इज्जत करनी चाहिए। कुछ तो हया-दया इंसान के मन में होनी ही चाहिए। सारी उम्र जिसकी मेहनत की कमाई खाई, बुढ़ापे में उसकी टांग टूट गई तो...!
मामराज ने बात बीच में छोड़कर आंखों से चश्मा उतारा और एक बार फिर पाेंछा और कहने लगा, ‘ठीक है सरकार ने तुम्हें कर्जा दे दिया ट्रैक्टर खरीदो और भी साधन खरीदो पर पशुओं का सम्मान करना भी सीखो। यह क्या बात हुई कि बूढ़ा हो गया तो लाठी मारकर घर से बाहर खदेड़ दो। कहां जाएंगे बेचारे मूक जानवर? यही है तुम्हारी इन्सानियत! मेरा तो कहना है कि जिस किसान के घर में पशु न हों वह कैसा किसान? बिना पशु के घर श्मशान जैसा लगता है! कोई किसी का दिया हुआ नहीं खाता। पशु तो अपनी मेहनत की कमाई ही खाता है! ईश्वर ने जिसे चोंच दी है चुग्गा भी देता है। किसी का किसी पर अहसान नहीं। रही बात बुढ़ापे की! वह तो सभी पर आएगा। ट्रैक्टर और ऊंट की बराबरी करता है किशन। भई! मशीन, मशीन है और पशु, पशु है। मशीन से खेती करके आप धन कमा सकते हो। किन्तु प्रेम नहीं मिल सकता। मशीनों से काम कर-करके आप भी एक दिन मशीन बन जाओगे! क्या जाने किशन कि पशु और किसान की भी एक आपस की जबान होती है जिससे वे एक-दूसरे को समझते और समझाते हैं। जब मैं सारे दिन खेत में काम करके घर की ओर चलने का विचार करता तब यहीं झींफरा समझ जाता। प्रेम से बलबलाने लगता। उछाले मारता। मैं चिलम पीकर उसका धुआं मुंह से निकालता तो उस धुएं को पीने के लिए मेरे कंधे पर अपनी गर्दन रख देता। मैं चिलम का धुंआ इसके मुंह पर छोड़ता तो सिर ऊंचा उठाकर जोर से बलबलाता तो मेरी सारे दिन की थकान एक साथ ही उतर जाती। तुम्हें पता तो है उन दिनों घरों में कितने चोर-उचक्के घुस जाते थे। रात के समय गैर आदमी को देखकर झींफरा क्रोध से पांव पटकने लग जाता। उछलने लगता। मजाल थी, कभी कोई गैर आदमी खराब नीयत से इसकी नकेल की तरफ हाथ कर ले। बूढ़े का सांस फूल गया। सांस लेने के लिए थोड़ी देर रूककर फिर बोला, ‘इसके पुण्य-प्रताप से ही हम इतने फले-फूले! तुम तो यह बात अच्छी तरह जानती हो!’ कहता हुआ मामराज खड़ा होकर ऊंट के पास गया और उसकी गर्दन हाथ से सहलाने लगा। ऊंट धीरे-धीरे पसर गया। इस तरह लग रहा था जैसे कोई ऊंट के मलहम लगाता हो। बूढ़ा बड़बड़ाने लगा, ‘ओहो बुढ़ापा! बेचारे को कव्वों ने तो तंग कर दिया। जगह-जगह चोंच मारकर घाव कर रखे हैं। कौन दवाई लगाये भाई तुम्हारे? औ किशन की मां, ‘जा! सरसों का तेल और साथ ही कोई पुराना गुदड़ा। ऊपर डाल देंगे तो कव्वों से तो जान बचेगी।’ किशन कहता... और बूढ़े की आवाज मुंह में ही रह गई। उनका पांच-छः बरस का पोता आकर तुतलाती जबान में कहने लगा, ‘दादा! मेला पापा बन्दूक लेतर आया है! कहता है झींफरा बूढ़ा हो गया! उसते गोली मालेंगे!’
मामराज ने मुड़कर देखा कि उसका बेटा किशन हाथ में बन्दूक लिए खड़ा है। किशन जैसे ही मामराज के पास आया, तो वह अटकते-अटकते रूआंसा होकर बोला, ‘बेटा! तुम्हारी मां और मैं भी बूढ़े हो गए! एक-एक गोली हमको भी मार दे। राम तुम्हारा भला करे! कहते हुए बूढ़े ने जाकर ऊंट की गर्दन को अपनी बांहों में ले लिया।
डॉ. मंगत बादल
प्रख्यात राजस्थानी साहित्यकार
जन्म : मार्च 1951,सिरसा हरियाणा
सम्मान : साहित्य अकादमी
अनुवाद : सावित्री चौधरी
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