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कहानी: स्वार्थी राक्षस

ऑस्कर वाइल्ड | Jan 22, 2017, 00:00 IST

कहानी: स्वार्थी राक्षस
प्रत्येक दिन दोपहर को जब लड़के स्कूल से पढ़कर लौटते थे तो वे राक्षस के बगीचे में खेलने के लिए जाते थे। यह बगीचा बड़ा और सुन्दर था जिसमें मुलायम हरे घास की मखमल बिछी हुई थी। घास पर सुन्दर पुष्प आसपास के सितारों की तरह जड़े हुए थे। बगीचे से बाहर मौलश्री के वृक्ष थे जिसमें बसन्त ऋतु में गुलाबी और मोती के समान श्वेत मृदुल कलिकायें प्रस्फुटित होती थीं। शरद ऋतु में जिन वृक्षों में बढ़िया फल लगते थे, चिड़ियां इन वृक्षों पर बैठती थीं और मधुर राग में गाया करती थीं। बच्चे उन्हें सुनने के लिए अपना खेल स्थगित कर दिया करते थे। "हम यहां कितने सुखी हैं? वे एक दूसरे से कहा करते।' एक दिन राक्षस वापस आया। उसने छोटे छोटे बच्चों को अपने बगीचे में खेलते पाया। "तुम वहां क्या कर रहे हो,' राक्षस ने बड़ी ही रूखी आवाज में कहा और जिसे सुनकर सब लड़के भाग गए। यह मेरा बगीचा है। यह कोई बतलाने की बात नहीं है और मैं इसमें अपने अलावा किसी दूसरे को नहीं खेलने दूंगा। राक्षस ने कहा। इसके बाद उसने बगीचे के चारों तरफ एक ऊंची दीवाल खड़ी की और एक नोटिस बोर्ड लगा दिया जिसमें लिखा था "आम रास्ता नहीं और जो प्रवेश करेगा वह जुर्म का भागी होगा।' वह सचमुच में बड़ा स्वार्थी राक्षस था। बेचारे बच्चों को खेलने के लिए कोई स्थान नहीं था। उन्होंने सड़क पर खेलने की चेष्टा की लेकिन सड़क धूल से भरी हुई थी और पत्थर भी पड़े हुए थे। वे बगीचे की ऊंची दीवाल के चारों तरफ चक्कर लगाते थे और भीतर के सुंदर बगीचे की चर्चा करते थे। स्कूल से लौटते वक्त वे एक दूसरे से कहते "हम बगीचे में कितने खुश रहते थे'
तब बसन्त ऋतु आई और सब जगह छोटी-छोटी कलिकाएं और नन्हीं-नन्हीं चिड़ियाएं दिखने लगीं। केवल स्वार्थी राक्षस के बगीचे में अब भी शीत ऋतु थी। चिड़ियों ने बगीचे में गीत नहीं गाए क्योंकि वहां बच्चे खेलने नहीं आते थे। एक दिन घास में से एक सुंदर फूल उगा लेकिन जब उसने राक्षस के बगीचे की वह सूचना देखी तो उसे इतना दुख हुआ कि वह फिर से जमीन पर गिरकर मुरझा गया। इस सूचना से बर्फ प्रसन्न हुए, उन्होंने कहा–"बसन्त ऋतु इस बगीचे को अपना वरदान देना भूल गई है, इसलिए हम लोग साल भर यहीं रहेंगे।'
तत्पश्चात् बर्फ ने सारी घास को अपने सफेद लबादे से ढंक दिया और कोहरे ने पेड़ों पर सफेदी पोत दी। तब उन्होंने उत्तरी हवा को बुलाया और हवा दिन-रात बगीचे में बड़े जोर से बहती और इसने मकानों की चिमनी को गिरा दिया। कुछ समय बाद ओले भी आए और वे राक्षस के महल की छत पर प्रतिदिन तीन घंटे तक बरसते रहे जब तक कि उसकी लगभग सभी चीजें नहीं टूट गईं।
"मुझे यह समझ नहीं आता कि मेरे बाग में बसन्त का उदय क्यों नहीं हो रहा है। राक्षस ने कहा, "मैं आशा करता हूं कि कुछ दिन में ऋतु परिवर्तन होगा।' लेकिन बगीचे में न तो बसन्त ऋतु ही आई और न ग्रीष्म ऋतु ही आई। शरद ऋतु ने सभी बगीचों में सुनहरे फल फूल दिए परन्तु राक्षस के बगीचे के लिए अब भी कुछ न मिल सका। शरद ने कहा "यह राक्षस बहुत स्वार्थी है। इसलिए इस बगीचे में सदा ही शिशिर का राज्य रहा और बर्फ कोहरा, ओले और उत्तरी हवायें यहां अपनी क्रीडाएं करती रहीं।
एक दिन सुबह जब राक्षस अपने बिस्तर पर लेटा जाग रहा था तो उसने एक मोहक गीत सुना। इसकी ध्वनि इतनी मधुर थी कि उसने सोचा कि शायद राजा के गायक गण इस मार्ग से जा रहे हैं। सचमुच ही उसकी खिड़की के बाहर एक कोयल गाना गा रही थी लेकिन उसने यह गाना इतने अधिक दिनों बाद सुना था कि आज उसे यह पक्षी गायन संसार का सबसे सुन्दर संगीत प्रतीत हुआ। इस संगीत के बाद ही ओलों ने उसके सिर पर बरसना बंद कर दिया और उत्तरी हवा ने भी अपना गर्जन बंद कर दिया। इसके बदले उसके खिड़की के खुले अंगों में से सुन्दर महक आने लगी। तब उसने कहा "मैं सोचता हूं कि आखिर बसंत आ ही गई'। उसने देखा दुर्ग की चार दीवारी में एक छोटा सा छेद था जिसमें से कुछ लड़के रेंगकर दुर्ग में घुस आए ये और वहां के बगीचे में लगे वृक्षों की डालियों पर बैठे हुए थे। वह जितने पेड़ देख सकता था उसने देखे और प्रत्येक पर एक न एक बालक बैठा पाया। बहुत दिनों के बाद बच्चों को अपने ऊपर बैठा हुआ देख पेड़ इतने प्रसन्न हुए कि उनमें फूल उग आए। पक्षीगण भी प्रसन्नता से अपनी कूकें मार रहे थे। यह बहुत सुन्दर दृश्य था। इसके साथ बगीचे के एक कोने में अब भी शिशिर थी। यह कोना दुर्ग में बने हुए महल के सबसे अधिक दूर पर था। यहां एक छोटा लड़का खड़ा हुआ था। इतना छोटा था कि वह पेड़ों की डालियों तक नहीं पहुंच सकता था। और वह अपनी इस असफलता से झुंझलाकर इधर-उधर घूमता हुआ रो रहा था। बेचारे वृक्ष पर भी काफी कोहरा और बर्फ ढंका हुआ था। "बच्चे मेरे ऊपर चढ़ जाओ' वृक्ष ने अपनी डालें इतनी नीचे झुका ली जितनी संभव थी। परन्तु बच्चा फिर भी न चढ़ सका। यह देखकर राक्षस का हृदय द्रवित हो उठा, "उफ्फ मैं कितना स्वार्थी रहा हूं। अब मैं समझा कि बसन्त मेरे यहां क्यों नहीं ठहरती? अब मैं इस बच्चे को वृक्ष के शिखर पर बैठाऊंगा। वहां से दरवाजा खटखटाऊंगा और तब मेरा बगीचा हमेशा बच्चों के खेल का मैदान बन जाएगा' वह अपनी करनी पर दु:खी था। वह बगीचे में चला गया। लेकिन लड़कों ने जैसे ही उसे देखा वे उससे इतना डर गए कि वे देखते ही भाग गए और बगीचे में पुनः शिशिर ऋतु का राज्य छा गया। केवल वही एक छोटा लड़का बचा जो दौड़कर भाग नहीं सका क्योंकि उसकी आंखें आंसुओं से भरी थीं इसलिए वह राक्षस को आते हुए न देख सका। राक्षस ने इसी बच्चे को चुपके से पीछे से जाकर पकड़ लिया और उसे प्यार भरे हाथों से लेकर वृक्ष के शिखर पर बैठा दिया। उसके ऐसा करते ही पेड़ में फूल लग गए छोटे बच्चे ने भी अपने दोनों हाथ फैलाकर राक्षस के गले में डाल दिए और उसे चूम लिया। जब दूसरे लड़कों ने यह सब देखा तो समझ लिया कि राक्षस अब दुष्ट नहीं रहा है और वे दौड़कर बगीचे में आए और बसन्त भी आ गई और उनको देखकर राक्षस ने कहा, "प्यारे बच्चों अब यह तुम्हारा ही बगीचा है। उसने दुर्ग की दीवार को तोड़ डाला।
सारे दिन वे खेलते रहे और शाम के वक्त वे राक्षस से विदा लेने आए। "लेकिन तुम्हारा छोटा साथी कहां है? मेरा मतलब उस बच्चे से है जिसे मैंने पेड़ पर चढ़ा दिया था' उसने कहा। राक्षस उसे सबसे अधिक प्यार करता था क्योंकि उस बच्चे ने उसे चूमा था। "हमें उसका पता नहीं है। बहुत सम्भव है कि वह चला गया हो' बच्चों ने कहा। "तुम लोग उससे यहां कल आने के लिए कह देना'-राक्षस ने कहा। लेकिन बच्चों ने जवाब दिया- "हम नहीं जानते हैं कि वह कहां रहता है और न हमने उसे पहले कभी देखा।' यह सुनकर राक्षस दु:खी हुआ।
प्रतिदिन दोपहर को जब स्कूल की छुट्टी हो जाती थी तब बच्चे आते। राक्षस के साथ खेलते थे लेकिन जिस छोटे बच्चे को राक्षस प्यार करता था वह कभी नहीं दिखाई दिया। राक्षस इन सब बच्चों के प्रति बहुत ही दयालु था। तथापि वह अपने छोटे मित्र को देखने के लिए तरसता रहता था और हमेशा उसके विषय में चर्चा करता था। वर्ष बीतते गए, राक्षस बहुत वृद्ध और शिथिल हो चला उसमें अधिक खेलने की क्षमता नहीं रही। इसलिए वह एक बड़ी आराम कुर्सी पर बैठा रहता और अपने बगीचे की प्रशंसा किया करता। वह कहता "मेरे बगीचे में कई प्रकार के सुन्दर पुष्प हैं लेकिन सब पुष्पों में बच्चे ही सबसे अधिक सुन्दर पुष्प हैं। "जाड़े में एक दिन सुबह कपड़े पहनते हुए राक्षस ने देखा। उसने शिशिर के प्रति घृणा प्रकट नहीं की क्योंकि वह जानता था कि सोता हुआ बसंत ही शिशिर होता है।
अब उसने अचानक ही अपनी आंखें मलीं और वह आश्चर्य चकित हो देखता रहा। उसके बगीचे के सबसे दूर वाले कोने में एक पेड़ था जो सुंदर सफेद कलियों से लदा था। उसके नीचे वही छोटा लड़का खड़ा था जिससे उसने सबसे पहले प्यार किया था। वह बगीचे में उस लड़के के पास गया और जब उसके पास पहुंचा तो उसका चेहरा क्रोध से लाल हो गया। वह बोला "यहां तुम्हें किसने बांधा है।' उस लड़के की हथेली पर और उसके पैर पर दो-दो कीलों के चिह्न थे। उसे देखकर वह झल्लाकर फिर बोला, "किसने तुम्हें यहां बांध रखा है? मुझे जल्दी बताओ जिससे मैं उसे अपनी तलवार के घाट उतार सकूं।' "मेरे दादा। ऐसा मत कहो। यह तो प्यार के घाव हैं।' उस बालक ने उत्तर दिया। "तुम कौन हो?' राक्षस ने पूछा और कुछ क्षणों में वह उस छोटे बच्चे के सामने घुटने टेककर नत मस्तक हो गया। राक्षस की इस स्थिति पर बच्चे को बहुत हंसी आई ओर उसने कहा, "दादा तुम एक बार और मुझे अपने बगीचे में खेलने दो फिर मैं आज ही तुम्हें अपने बगीचे में ले चलूंगा। क्या जानते हो कि मेरा बगीचा कौन है? मेरा बगीचा तो स्वर्ग है।' उसी शाम को जब बाल मंडली उस बगीचे में खेलने गई तो उसने देखा कि उस पेड़ के नीचे सफेद पत्तियों से पूरी तरह ढंका हुआ राक्षस वहां मरा पड़ा है।
ऑस्कर वाइल्ड
प्रख्यात साहित्यकार
अनुवाद : नंदलाल जैन
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(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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