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किसी एक फूल का नाम लो!

चंडीदत्त शुक्ल | Feb 08, 2013, 12:33 IST

किसी एक फूल का नाम लो!
उदासी की हर शाम धुलकर खुशी की सुबह बन जाती है, जब खयालों में आ पहुंचता है मौसमों का राजा या कि कहें — ताजगी से भरा उम्मीद का विचार। ऐसा ही है जीवन। हताश ऋतुओं के बाद जागता है बार-बार। गहरी काली रातें डूबने पर आती है खिलखिलाकर हंसती शफाफ सुबह। ज़िन्दगी इकलौती ऐसी ट्रेन है, जो देर तक नाउम्मीदी के प्लेटफॉर्म पर नहीं रुकती।
मन बुझा-बुझा सा। गुमसुम। तन थका-थका सा। लथपथ। जीवन रुका-रुका सा। हतप्रभ। बेइरादा, यूं ही भटकते वक्त, झुरमुट के बीच से दबे पांव एक जानी-पहचानी खुशबू आई और सांसों में घुल गई, जैसे किसी ने लताओं का जाल हटाकर दिल पर हौले-से दस्तक दे दी। कभी ऐसा कुछ हुआ है? यकीनन, नसीब वाले होंगे, जो इस तरह का वाकया पेश आया हो.. पर न भी हुआ हो सुगंध का सुनहरा संयोग तो बस करो इतना कि उदासियों से सिल गए होंठों को जुंबिश दो।
किसी एक फूल का नाम लो। उसका रंग शब्दों में घोल लो। रूप बसा लो आंखों में। उसकी खुशबू की याद करो सांस में। ठंडी हवा की एक लहर घुल जाएगी सीने तक। ख्वाबों में फहराने लगेगा वसंत का पीला आंचल। वसंत, यानी ऋतुराज। कहने को बस एक और मौसम भर, पर हकीकत में बदलाव की मुकम्मल रुत। याद, एहसास और जागृति। उदासी की हर शाम धुलकर खुशी की सुबह बन जाती है, जब खयालों में आ पहुंचता है मौसमों का राजा या कि कहें — ताजगी से भरा उम्मीद का विचार। ऐसा ही है जीवन। हताश ऋतुओं के बाद जागता है बार-बार। गहरी काली रातें गुजरने पर आती है खिलखिलाकर हंसती शफाफ सुबह।ज़िन्दगी इकलौती ऐसी ट्रेन है, जो देर तक नाउम्मीदी के प्लेटफॉर्म पर नहीं रुकती।
अच्छा साथी, एक बात बताओ तो जरा! सालभर में कितने मौसम आते हैं? वही तीन — आम जुबान में सर्दी, गर्मी और बरसात..। पर सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता। छोटे-छोटे कितने बदलाव हैं। वसंत, शरद, शिशिर, हेमंत, पतझड़ आदि-इत्यादि। हर रुत के अपने रंग, अपना एहसास, अपनी छवि और अपनी ही छुअन। बारिश में भीगी सड़क, पतझड़ में वीरान राहें, जाड़े में ठिठुरती पगडंडियां और वसंत में हरी-भरी वादियां। ज़िन्दगी ऐसे ही मौसमों का मेला है। कभी बरसती, कभी सुलगती, कभी सिसकती और कभी किलकती। कोई ऋतु कहती है — पिया मिलन को जाना तो अगले ही मौसम की तड़पती सदा बताती है — मोहे छोड़ गए बालम। सांसों और मौसमों की रिश्तेदारी पुरानी है। एक जैसी आदत। एक जैसी जद्दोजहद। एक जैसा हौसला।
और इन सबके बीच एक सेतुबंध है। एक पुल है। एक जरिया है। आगे बढ़ने का। वह है हौसला। यहां भी ज़िन्दगी जैसी समानता है। रंग-बिरंगे फूलों की। मुश्किलों की मार के बीच खुद को संभाल लेने का विचार जैसे हमें जगा देता है, वैसे ही फूल भी हैं, जो हर व्याधि की मौजूदगी में जीवन को खुशबुओं की सौगात दे जाते हैं।
फूल हमें सब कुछ सिखाते हैं। निष्काम रहने का मंत्र। अपना कुल धन दूसरों को बांट देने का हुनर। मुसीबतों के सामने डटे रहने का हौसला। और सबसे बड़ी बात — प्रकृति की मार, इंसान के लालच और कीट पतंगों की दादागीरी झेलते हुए भी हंसनेमुस्कुराने और खिलखिलाने का सदाबहार अंदाज। बादशाह के बगीचे में खिलते हैं तो किसान की कुटिया के कोने में भी हंस पड़ते हैं। हीरोइनों की चोटी में डोलते हैं तो गर्ल नेक्स्ट डोर की जुल्फों में भी सज जाते हैं। किताबों के बीच याद बनकर मुरझा जाते हैं तो प्रणय निवेदन के समय मचल उठते हैं। क्यों न इनसे सबक लें। आओ, जीवन के वसंत को हमेशा के लिए जगा लें। हौसले के फूल खिला लें ज़िन्दगी की फुलवारी में, इस वादे के साथ कि इनकी खुशबू को जुगनुओं की तरह हथेली में कैद कर लेंगे।
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Web Title: article of aha zindagi
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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