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नई पीढ़ी के साथ बातचीत करना भी एक कला है

n.raghuraman | Dec 03, 2012, 10:56 AM IST

नई पीढ़ी के साथ बातचीत करना भी एक कला है

फंडा यह है कि...


आप बातचीत के जरिए नई पीढ़ी को किसी बात के लिए समझा सकते हैं। यह फैसला आपको करना है कि कौन-सी चीज कारगर रहेगी- ताकत या अधिकार का इस्तेमाल करना, या साथ बैठकर बातचीत करना? मेरे ख्याल से दूसरा विकल्प बेहतर है।

२५ नवंबर की शाम मैं अपनी छह वर्षीय भांजी को गेटवे ऑफ इंडिया घुमाने लेकर गया। हमारे वहां पहुंचने तक सूर्यास्त होने लगा था और २६/११ के शहीदों की स्मृति में कैंडल-मार्च की तैयारियां चल रही थीं। मेरी नन्ही भांजी ने मुझसे २६/११ के बारे में कई सवाल पूछे, जिनमें से कुछ का तो मैंने जवाब दिया और कुछ सवालों को टाल दिया। वहां से मैंने एक किताब ली, जिसमें २६/११ से जुड़े उन भयावह दिनों कीं तमाम तस्वीरें व गाथाएं दर्ज थीं।

घर लौटने पर वह तुरंत बिस्तर में जाकर सो गई, जबकि मैं उस किताब में खो गया, जिसमें सामूहिक कब्र जैसी एक तस्वीर थी। उन पन्नों में मौत से संबंधित हजारों 'बातें' दर्ज थीं। मुझे लगा कि वह किताब लेखक के अहंकार का व्यापक स्मारक है, जिसमें मृत देहों का बेतुका संकलन है। मैंने उसे बीच में ही पढऩा छोड़ सोने चला गया।

अगली सुबह २६ नवंबर को मैंने अपनी भांजी को वह किताब हाथ में लिए पाया। वह काफी उत्सुकता के साथ हत्याओं के उन दृश्यों को निहार रही थी। मैं यह देखकर चौंक गया। मुझे समझ में नहीं आया कि वह इस तरह की किताब में आखिर क्या पढ़ रही है।

मैंने संयत स्वर में उससे किताब वापस देने को कहा। इस पर उसने तपाक से कहा- 'लेकिन क्यों?' मैंने उसे समझाते हुए जवाब दिया, 'देखो बेटा, यह किताब बड़े लोगों के लिए है।' 'लेकिन आप तो हमेशा अपनी हर किताब मुझे पढऩे देते हैं। वे भी तो बड़े लोगों के लिए होती हैं।' उसका कहना था। 'हां, लेकिन यह किताब बड़े लोगों द्वारा किए गए कुछ बुरे कामों के बारे में हैं और मैं नहीं समझता कि तुम फिलहाल इसे पढऩे लायक हो', मैंने जवाब दिया।

'तो मैं इसे कब पढऩे लायक होऊंगी?' उसकी किताबें अभी भी किताब पर जमी थीं। 'संभवत: जब तुम १२ साल की हो जाओगी।' यह कहते हुए मैंने वह किताब उसके हाथ ले ली और उसे अपनी किताबों की अलमारी के सबसे ऊपर वाले खंड में रख दिया, ताकि उसका हाथ वहां तक न पहुंच सके। 'मैं अब भी उस तक पहुंच सकती हूं', उसने अपना हाथ ऊपर करते हुए कहा। 'मैं कोई कुर्सी खींचकर लाऊंगी और उस पर चढ़ते हुए किताब को नीचे उतार लूंगी' उसने अपनी समझदारी दिखाते हुए कहा।

यह सुनकर मैंने गहरी सांस ली। जैसा कि ज्यादातर मामलों में होता है, वह सही थी। किताब को उसकी पहुंच से दूर रखने का मतलब यह नहीं कि समस्या हल हो गई। बल्कि इससे तो किताब के प्रति उसकी उत्सुकता और बढ़ जाएगी।

मैंने उसकी कत्थई आंखों में देखा और कहा, 'बेटा, तुम बहुत समझदार और स्मार्ट लड़की हो। और तुम्हें ऐसी कई चीजों के बारे में समझ है, जिन्हें तुम्हारी उम्र के बच्चे नहीं जानते। लेकिन मैं नहीं समझता कि फिलहाल तुम इस किताब को पढऩे के लिए पूरी तरह तैयार हो। जब मुझे लगेगा कि तुम इसे पढऩे लायक हो गई हो, मैं खुद तुम्हें यह दे दूंगा। हालांकि इस किताब में तुमने अब तक जो भी पढ़ा है, उसके बारे में मुझसे कोई भी सवाल पूछ सकती हो।'

वह मेरी बात सुनकर कुछ सोचने लगी। मैंने किताब को नीचे उतारकर उसके समक्ष टेबल पर रख दिया और उससे कहा, 'देखो बेटा, मैंने तुम्हें समझा दिया है कि फिलहाल तुम यह किताब क्यों नहीं पढ़ सकती। लेकिन मैं इसे तुम्हारी पहुंच से दूर नहीं, वरन तुम्हारे सामने रख रहा हूं। मुझे भरोसा है कि तुम इसे नहीं पढ़ोगी।'उसने थोड़ी देर सोचा और आखिरकार सहमति में सिर हिलाते हुए बोली, 'ओके मामा, मैं इसे नहीं पढ़ूंगी। लेकिन मुझसे वादा कीजिए कि जब मैं १२ साल की हो जाऊंगी, तो आप मुझे यह पढऩे के लिए देंगे।'

'हां बिलकुल', छह साल की मोहलत मिलने पर मैंने राहत की सांस लेते हुए जवाब दिया। मेरा यकीन करें, घर के सभी सदस्य इसके बाद से उस किताब पर निगाह जमाए रहे। दिवाली की लंबी छुट्टियों के बाद २ दिसंबर को वह वापस अपने घर चली गई। किताब अभी भी टेबल पर अनछुई रखी है।

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Web Title: article of career mantra
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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