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कॉन्फिडेंट नहीं हैं तो कृपया मुंह बंद रखें

N.Raghuraman | Jan 25, 2013, 11:02 IST

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कॉन्फिडेंट नहीं हैं तो कृपया मुंह बंद रखें
डिपार्टमेंटल स्टोर से खरीदारी कर निकल रही एक बुजुर्ग महिला से कैश काउंटर पर बैठे युवा कैशियर ने कहा कि उसे अपने साथ शॉपिंग बैग वगैरह लाना चाहिए क्योंकि प्लास्टिक बैग पर्यावरण के अनुकूल नहीं होते। कैशियर का उस बुजुर्ग महिला से कहना था कि उसे इस तरह की चीजें अपनाते हुए एन्वायरमेंट-फ्रेंडली हो जाना चाहिए।
कैशियर की बात सुन शालीनता के नाते बुजुर्ग महिला ने खेद व्यक्त किया और कहा, ‘हमारे दिनों में इस तरह की पर्यावरण संबंधी समस्याएं नहीं थीं।’
यह सुनकर किसी भी आधुनिक युवा की तरह कैशियर ने उससे थोड़े उग्र स्वर में कहा, ‘यह हमारे आज की समस्या है। ऐसा इसलिए क्योंकि आप पुरानी पीढ़ी के लोगों ने आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण को संरक्षित रखने की परवाह नहीं की और इसका खामियाजा हम भुगत रहे हैं।’ यह सुनकर उस बुजुर्ग महिला से रहा नहीं गया और वह उस पर बिफरते हुए बोली, ‘उन दिनों हम दूध की बोतल इत्यादि को वापस स्टोर को लौटा दिया करते थे। स्टोर उन्हें वापस प्लांट में भेज देता, जहां पर उन्हें धोकर, कीटाणुमुक्त कर दोबारा भरा जाता था। इस तरह ये बोतलें बार-बार इस्तेमाल होतीं। हम हर बार नया पेन खरीदने की बजाय एक ही पेन में बार-बार स्याही भरते हुए लगातार इसका इस्तेमाल करते थे। हमारे दिनों में रेजर में ब्लेड को बदलते थे, न कि ब्लेड के खराब होने पर पूरा रेजर ही फेंक दिया जाता था। और आप कहते हैं कि हमें पर्यावरण की फिक्र नहीं थी?’
उसका यह कहना वहां मौजूद लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए पर्याप्त था। मगर उस बुजुर्ग महिला ने किसी की परवाह नहीं की और अपनी बात जारी रखते हुए कहा, ‘हम सीढ़ियों पर चढ़ते-उतरते थे, क्योंकि हमारे दिनों में हरेक शॉप या ऑफिस बिल्डिंग में एस्कलेटर नहीं लगे थे। हम किराना स्टोर तक चलकर जाते थे और दो-तीन ब्लॉक ऊपर चढ़ने के लिए हम हर बार ३क्क् हॉर्सपावर की मशीन का इस्तेमाल नहीं करते थे।’
इसके बाद उसने शोकेस में रखे बेबी नैपकिंस की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘उन दिनों हम छोटे बच्चों की नैपीज खुद धोते थे, क्योंकि हमारे पास इस तरह की ‘यूज एंड थ्रो’ टाइप की चीजें नहीं थीं। हम कपड़ों को रस्सी पर सुखाते थे, दो किलोवाट बिजली की खपत करने वाली किसी वॉशिंग मशीन में नहीं। हमारे दिनों में कपड़े विद्युत ऊर्जा के जरिए नहीं, बल्कि वास्तव में पवन व सौर ऊर्जा से सूखते थे। छोटे बच्चों को अपने बड़े भाई या बहनों के छोटे पड़ गए कपड़े पहनने को मिलते थे, न कि उन्हें हर बार ब्रांड-न्यू कपड़े खरीदकर दिए जाते।’
तब तक वहां काफी लोग जमा हो चुके थे, जो उसकी बात ध्यान से सुन रहे थे। बुजुर्ग महिला ने आगे कहा, ‘उन दिनों घर के हरेक कमरे में नहीं, बल्कि पूरे घर में एक टीवी (या रेडियो) हुआ करता था और इस टीवी की स्क्रीन भी छोटी होती थी। तकरीबन रूमाल के आकार की। किचन में हम हाथ से ही मसाला वगैरह पीसते थे, क्योंकि हमारे पास हर काम के लिए इलेक्ट्रिक मशीन नहीं थी। जब हम बाहर भेजने के लिए किसी नाजुक सामान की पैकिंग करते थे, तो इसमें कुशन के तौर पर पुराने अखबारों की कतरनें इस्तेमाल करते थे, आज की तरह स्टायरोफोम या प्लास्टिक बबल की पट्टी नहीं। उन दिनों हम लॉन की घास साफ करने के लिए पेट्रोल से चलने वाली मशीन का इस्तेमाल नहीं करते थे। हम घास कटाई के लिए ऐसी मशीन का इस्तेमाल करते थे, जो इंसानी शक्ति से चलती थी। इस तरह काम करते हुए हमारी एक्सरसाइज भी हो जाती थी, जिससे हमें हेल्थक्लब जाकर बिजली से चलने वाली ट्रेडमिल पर दौड़ने की भी जरूरत नहीं थी।’
उस बुजुर्ग महिला का गुस्सा अब तक शांत नहीं हुआ था। उसने कैशियर को घूरते हुए आगे कहा, ‘जब हमें प्यास लगती तो हम किसी नल पर जाकर पानी पी लेते, न कि गला तर करने के लिए दूसरे देश से आई पानी की बोतल मंगाते। हम अपने घर में सारी चीजें पकाते थे, न कि पैकेट, टिन या प्लास्टिक की पैकिंग में आने वाले खाने का इस्तेमाल करते। हम खुद ही अपनी सब्जियां धोते और सलाद वगैरह काटते।’
अपनी बात को विराम देते हुए उसने आगे कहा, ‘उन दिनों लोग ट्राम या बस में सफर करते थे तथा बच्चे भी पैदल या साइकिल से स्कूल जाते थे। हमारे यहां कमरों में एक इलेक्ट्रिक सॉकेट होता था, न कि विभिन्न एप्लायंसेस को चलाने के लिए दर्जनों सॉकेट लगे होते थे। और हमें घर के सबसे नजदीकी पिज्ज जॉइंट की लोकेशन पता करने के लिए अंतरिक्ष में २क्,क्क्क् मील दूर स्थित उपग्रह से सिग्नल प्राप्त करने हेतु कम्प्यूटराइज्ड गैजेट्स की भी जरूरत नहीं थी।’
आखिर में उसने चुटकी लेते हुए कहा, ‘क्या यह दुखद नहीं है कि मौजूदा पीढ़ी हम पुरानी पीढ़ी के लोगों पर यह आरोप लगाए कि हमने पर्यावरण का ख्याल नहीं रखा?’
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Web Title: article of career mantra
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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