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समस्या का समाधान भी बन जाता है व्यवसाय

एन. रघुरामन | Feb 13, 2013, 10:59 IST

  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
वे कोयंबटूर में एक जाने-पहचाने किसान थे, फिर उन्होंने ऑटोमोबाइल पाट्र्स का बिजनेस शुरू किया और फिर कोयंबटूर के ही नजदीक स्थित उटी में एक रिसॉर्ट बनाकर मशहूर हो गए। एक सुबह अचानक उनकी मृत्यु हुई, तब किसी ने यह नहीं सोचा था कि उनके अंतिम संस्कार में इतने सारे लोग शरीक होंगे। उनके करीबियों को एक ट्रैक्टर के ऊपर खुली शव गाड़ी चढ़ानी पड़ी। अव्यवस्था के बीच लंबी शवयात्रा के दौरान मृत शरीर ही ट्रैक्टर से नीचे गिरने लगा, लेकिन उनके अनुयायियों ने किसी तरह उसे बचा लिया। इस घटना ने सबको बेहद व्यथित किया, क्योंकि आम तौर पर यही माना जाता है कि मृत शरीर का हर हाल में आदर किया जाना चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं कि मृतक के करीबियों की भी कुछ ऐसी ही भावनाएं होंगी।
जब किसी बड़े नेता की मृत्यु होती है तो उनके पार्थिव शरीर को सार्वजनिक जुलूस की शक्ल में ले जाया जाता है और जिस वाहन में उसे रखा जाता है, वह अक्सर किसी रथ की तरह सजा होता है। लेकिन आम आदमी, चाहे उसकी हैसियत कैसी भी हो, उसे शायद ही कभी ऐसी विदाई नसीब होती है। इस घटना और इससे पैदा हुए सवाल ने मदुरै में अंतिम संस्कार का प्रबंध करने वाले लोगों को सोचने पर मजबूर किया और वे कुछ नया करने की जुगत में लग गए। नतीजा यह हुआ कि उन्होंने एक शव वाहन को रथ की तरह नए सिरे से डिजाइन कर दिया। शहर के लोगों ने इस आइडिया को खूब पसंद किया और आज कई ऐसे शव वाहन देखने को मिल जाएंगे, जिनमें नीचे स्टेज के साथ ऊपर सजा हुआ गुंबद बनाया गया है। उनमें सीढिय़ां बनाई गई हैं, स्ट्रेचर और कुर्सियों की व्यवस्था की गई है और कई दार्शनिक उक्तियां लिखी गई हैं। मदुरै में स्थित गवर्नमेंट राजाजी हॉस्पिटल के बाहर ऐसी एक-दो नहीं, बल्कि दर्जनों गाडिय़ां हर समय खड़ी दिख जाती हैं।
आज के दौर में काले या फीके रंग के शव वाहनों का चलन कम होता जा रहा है। मदुरै में शवों को लाने-ले जाने के लिए चमकीले रंगों के वैन, जिनमें मृतक के संबंधियों की जरूरत के हिसाब से बदलाव किया जा सकता है, खूब लोकप्रिय हो रहे हैं। इन वाहनों को सोरक्का रथम या शवयात्रा रथ नाम दिया गया है और इसकी शुरुआत अस्पताल से शव को ढोने वाली एम्बुलेंस कंपनियों ने की है। शहर में यह काम करने वाली मुख्य रूप से चार कंपनियां हैं, जो इसके लिए जरूरत के हिसाब से 1500 से 12000 रुपए तक चार्ज करती हैं। घर से श्मशान घाट की दूरी के अनुपात में यह रकम बढ़ती जाती है। नए जमाने के शव वाहन मुहैया कराने वाली इन कंपनियों का तर्क है कि खुली शव गाड़ी की तुलना में यह बेहतर विकल्प है और इसमें खर्च भी कम आता है। किसी की मौत को अपना व्यवसाय बनाने की भावना में बहे बगैर ये ऑपरेटर्स अपने बिजनेस को नए आयाम दे रहे हैं। वे लोगों के खर्च करने के सामथ्र्य और उन्हें बेहतर अनुभव देने की कोशिश कर रहे हैं। भावनात्मक हुए बगैर यदि निष्पक्ष रूप से इस मुद्दे पर विचार करें तो करीबी लोगों के लिए अपने मृत संबंधी के लिए कुछ अच्छा करने का यह आखिरी मौका होता है।
फंडा यह है कि...
जीवन के हर क्षेत्र में कोई भी काम करते हुए समस्याएं आती ही हैं। सफल व्यवसायी वही होते हैं, जो इन समस्याओं की पहचान कर उनके बेहतर समाधान का रास्ता तलाशते हैं। याद रहे कि समाधान हमेशा बिकाऊ होता है।
raghu@dainikbhaskargroup.com
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Web Title: article of career mantra
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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