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महात्मा बुद्ध की मरहम पट्टी

जाहिदा हिना | Nov 11, 2012, 00:08 IST

महात्मा बुद्ध की मरहम पट्टी
जिस तरह कश्मीर को जन्नत कहा जाता है, उसी तरह पाकिस्तान के शुमाली इलाके, खास तौर से स्वात के कुदरती हुस्न की सारी दुनिया में शोहरत रही है। सर ऑरेल स्टीन ने 1920 में लिखा था कि बर्फपोश चोटियों से पिघली बर्फ के साफ पानी में तैरती रंगीन मछलियां, पहाड़ों पर खिले फूलों की कतारें और खुशबू से बोझिल हवाएं यहां आने वालों को अपना दीवाना बना लेती थीं। बौद्ध यात्री इस जगह को महात्मा बुद्ध का बाग कहते थे। इस इलाके में आज भी इसके निशान मौजूद हैं।
जातक कथाओं को वहां मौजूद चट्टानों पर पेंट किया गया है, जो अब धुंधली हो चुकी हैं। इन चीजों की कद्र करने वाला कोई नहीं है, इसलिए बहुत-सी अनमोल चीजें धूल बनकर उड़ गईं हैं। अब यहां आने वाले सैलानी भी इन्हें भुला चुके हैं। यहां चौथी सदी ईसा पूर्व में मसीह की बनाई हुई महात्मा बुद्ध की मूर्ति भी है, जिसमें वो ध्यान में व्यस्त हैं। 1985 में इटली के स्कॉलर अंबर्टाे सिराटो ने इस इलाके में कई प्राचीन वस्तुओं को खुदाई में ढूंढा। उनके साथ हजारा यूनिवर्सिटी में पुरातत्व की शिक्षा हासिल करने वाले कई विद्यार्थी काम कर रहे थे।
इन लोगों को खुदाई में कई पुरानी ऐतिहासिक कब्रें, इंसानी पंजर, मिट्टी की हांडियां और बर्तन मिले। यह हमारा शानदार ऐतिहासिक खजाना और विरासत है। अब से 10-15 बरस पहले तक गर्मियों की छुट्टियां शुरू होते ही स्कूल और कॉलेज की टीचर और स्टूडेंट्स हÊारों की तादाद में स्वात, फिजा घाट, बालूग्राम और आसपास के कस्बों में फैल जाते थे। कराची, इस्लामाबाद, लाहौर और दूसरे शहरों से वहां का रुख करने वाले वहां की कशीदाकारी, शालें और लकड़ी से बनी हुई सजावटी चीजें खरीदते और तोहफे के तौर पर ले कर आते। दोस्तों और अजीजों में बांटते, लेकिन उससे कहीं ज्यादा दिल मोह लेने वाली वहां की कहानियां होतीं। वहां की सरसब्ज वादियों में जन्म लेने वाली मूर्तियों की पुरानी और नई कथाएं, जिनको सब शौक से सुनते। जिन्होंने कभी इन हसीन वादियों को नहीं देखा था, वहां के पहाड़ों पर कदम नहीं रखा था, ये आरÊाू करते कि कभी वहां जा सकें। स्वात और आसपास कई बरस पहले दहशतगर्दी का अजाब नाजिल हुआ। यहां के सादा दिल लोगों को परेशान किया गया, कैसेट-वीडियो की दुकानें बंद करवा दी गईं, हज्जामों से कहा गया कि वो कोई और काम करें, क्योंकि दाढ़ी और मर्दो के बाल तराशना हराम है।
वहां एक चौक है, जो कभी सब्ज चौक कहलाता था, लेकिन जब वहां लगभग 50 मर्दो और औरतों की गर्दनें उड़ाई गईं तो उसे खूनी चौक कहने लगे। वहां होने वाली यह गारतगिरी जब इंतेहा को पहुंची तो पाकिस्तानी फौज ने इस इलाके को इंतेहापसंदों और दहशतगर्दो से खाली कराने के लिए घेरे में ले लिया और फौजी कार्रवाई शुरूकर दी। कई साल कोशिशों के बाद फौज काफी हद तक अमन कायम करा सकी है और दहशतगर्दो को स्वात और आसपास के इलाकों से बाहर किया गया है।
इसके बावजूद 15 साल की मलाला को गोली मारने जैसी वारदात अब भी हो जाती है। यहां की जिन मूर्तियों को तालिबान ने नुकसान पहुंचाया, अब उनको ठीक कराने और आम लोगों की जुबान में बुतों की मरहम पट्टी करने के लिए इटली और कई दूसरे मुल्कों से ऑर्कियोलॉजिस्ट आए हैं। पाकिस्तान के भी कुछ माहिरीन उनके साथ नाम छुपाकर काम कर रहे हैं। डर है कि अगर इंतेहापसंदों को उनके नाम मालूम हो गए, तो वो उन्हें कत्ल करने की कोशिश कर सकते हैं। स्वात के लोग खुश हैं कि इलाके में काफी हद तक अमन है, लेकिन मलाला के वाकये ने उन्हें दहशतजदा कर दिया है। वो कहते हैं कि स्वात के सुनहरे दिन अगर किसी हद तक भी वापस आ जाएं तो वे अपनी खुशनसीबी समझेंगे।
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Web Title: article of zahida hina
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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