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प्रेम की बंशी बजाते हैं गोविंद

सैन्नी अशेष | Aug 15, 2012, 16:04 IST

  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
प्रेम की बंशी बजाते हैं गोविंद
जन्माष्टमी की रात। तिब्बत की सीमा के पास एक चेतना केंद्र का प्रांगण। हम चांद तले बैठे हैं। यहां सदियों से मानवप्रज्ञा के चुने हुए दस्तावेज संरक्षित हैं। हमारी टोली यहां कृष्ण की बहुआयामी संपूर्णता पर संवाद करने पहुंची है। यह जगह बस्ती से कोसों दूर चट्टानी वीराने में है, जहां गर्मियों में घोड़े और सर्दियों में याक ही बेहतर वाहन हैं। यहां बरसात नहीं होती, झरनों, झीलों और नदियों को भरने वाले हिमपात के सिलसिले राह नहीं रोकते। अनोखे फूलों से भरा अगस्त यहां का वसंत है। महीना भर भटके बिना इस जगह को जानना मुश्किल है। पर्यटक यहां कभी नहीं आए। यायावर बीच राह से लौट गए। फकीर को यहां हर लकीर से मुक्त हुए बिना पगडंडी मयस्सर नहीं, लेकिन जिसे पहुंचना ही है, उसे कौन रोक सका? सौंदर्य भीतर जगता है और सीमांतों तक अपने बीज बिखेरता और सहेजता है। हिमालय यूं भी राग की आग को अपनी ठंडी छाती में बचाता आया है। हम जहां बैठे हैं, वह अपरिचित लिपि में छिपा गुप्त संहिताओं का संग्रहालय है। ‘ओयशो’ नामक तलघर में ‘संपूर्ण पुरुष रसायन’ और ‘संपूर्ण स्त्री अवतरण’ जैसे ग्रंथ भी मौजूद हैं। ये ग्रंथ शिव व शक्ति, राधा व कृष्ण स्तर के स्त्री पुरुषों के रहस्य का उद्घाटन करते हैं। ये उनके मिलन और उस मिलन से चेतना व प्रेम की नई क्रांति लाने की योजनाओं से भरे हैं। विद्या के बुनियादी और प्राचीनतम दस्तावेजों में शिव को ‘ओयशो’ कहा गया है, जो नई रचनाभूमि के लिए पुरानी भूमियों का विध्वंस करते हैं। यहां आद्यशक्ति, यानी यूनिवर्सल स्वभाव से अवतरित नवदुर्गाओं के समकक्ष नारियों के स्रोत-संदर्भ हैं और ऐसे दस्तावेज भी हैं, जिनसे पता चलता है कि ‘सखा’ और ‘मैत्रेय’, यानी मित्र रूप में किस तल की मानव चेतना के जरिए कैसे अद्भुत युग और कैसे मन्वंतर रचे जाते हैं। कृष्ण और मनु को यहां वर्णधर्म, अर्थात् व्यक्ति के गुण स्वभाव के प्रणोता के रूप में देखा गया है। वर्ण व्यवस्था को यहां वर्ण की संगठित व स्थापित व्यवस्था के विरुद्ध प्रेम की उन्मुक्तता और चेतना की सहभागिता के लिए योजनारत पाया गया है। धर्म का अर्थ यहां धर्म ही है — स्वभाव! यहां तथाकथित ‘धर्मो’ से उबारने के लिए ही सारे जतन चलते हैं, ताकि प्रेम और प्रतिभा से चेतना के दीए रोशन होते रहें। सांप्रदायिक पुरोहितों द्वारा प्रचारित और दूषित ग्रंथ यहां अमान्य हैं। उन्हें ‘अंधकार की शक्तियां’ कहा गया है। हम संवाद की भूमिका सुन रहे हैं : ‘जबजब मनुष्य अपने सीधे-सादे जीवन को अपनी समूहजनित जटिलताओं से भरकर संगठित रूप से ‘जस्टीफाई’ और ‘मिस्टिफाई’ करता है और पुरुष व स्त्री के सच्चे नातों को प्रकृति व चेतना से दूर ले जाकर ढोंगी बना डालता है, तब-तब कृष्ण व राधा की गहरी रचना स्वभावत: क्रीड़ारत हो जाती है! जहां ‘मास्टर’ और ‘मिस्टिक’ अपना काम कर लेते हैं, वहां संपूर्ण कला संपन्न खेल का उदय होता है। इस अवतरण में तमाम रहस्यकर्मी व रहस्यदर्शी चेतनाएं ‘गोप गोपियों’ के सहकर्मी रूप में एक साथ उतरती हैं। पांच हजार वर्ष में दो बार के बड़े अवतरणों के बाद यह खेल तीसरी बार बीसवीं सदी के में दो महान उपायों के साथ फिर से नवीकृत हुआ..।’ संवाद की भूमिका नमकीन मक्खनी चाय की अंतिम चुस्कियों के साथ संपन्न हुई — ‘सच्चे मनुष्य के पास खोने के लिए भीतरी जंजीरों के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। या तो संपूर्णता की राह में शून्यता के कलाधर हो जाओ या जटिल विचारों के लदान सहित तंबाकू में रमे रहो और ‘जीवन निर्थक है’ की अहंकारी घोषणा करके आत्मघात को निकल जाओ। जीवन के अनंत आयामों के सामने निर्थकता और सार्थकता नहीं बचती, सिर्फ नवरचता खिलती है। चैतन्य की अंगुलियों में बांसुरी विराजती है, बौद्धिकता की अंगुलियों में सिगार और किसी नईपुरानी किताब का अहंकारी उधार विचार! मूल की शल्यक्रिया के बिना कर्मफल सदा से भयावह है। जागना ही क्रांति है। उसके बाद हर कर्म का फल निश्चिंत फलता है। अगला क्षण स्वत: रचनात्मक हो उठता है।’ श्रीकृष्ण आकृष्ट करते हैं और यही ‘कृष्ण’ का मूल अर्थ भी है। ‘कृष्ण’ में ‘क्राइस्ट’ भी छिपे हुए हैं। विद्या के प्राचीन दस्तावेज बताते हैं कि सखा या मैत्रेय के रूप में आने वाले लोगों में से दो व्यक्ति कृष्ण व क्राइस्ट ग्वालों के रूप में आ चुके हैं। कृष्ण संपूर्ण होकर आए थे, क्राइस्ट पूर्णता की यात्रा पर थे। कृष्ण प्रेम स्वतंत्रता के महा रचनाकार के रूप में विश्वव्यापी हुए। विश्व के पांचसात महान अस्तित्ववादी कृष्ण के सामने बौने हैं। विश्वविद्यालयों में पसरी तमाम फिलॉसफी और मनोवैज्ञानिकता कृष्ण की प्रत्युत्पन्नमति के सामने भरभरा कर गिर जाती है। कृष्ण आज पूर्ण प्रासंगिक, पूर्ण अद्भुत और संपूर्ण नवप्रस्तोता के रूप में पहचाने जा रहे हैं। पांच हजार साल के नवयुवा! उन्हें झूले में झुलाने के दिन लद गए। कृष्ण इसलिए संपूर्ण हैं कि नए के लिए वे सदा प्रस्तुत हैं। ‘पिछले’ से वे मुक्त हैं, इसलिए शून्य हैं। शून्यता ही संपूर्णता से भर उठती है। कृष्ण दूसरों के बीच व्यस्त हैं, लेकिन अपने लिए विरक्त! यह अनासक्ति ही निर्लिप्ति है। सौंदर्य उनका स्वभाव है। चेतना के बाग में सुंदरतम फूल स्वत: खिल जाते हैं। वहां राधा बेसाता पहुंच जाती है, क्योंकि वह संपूर्ण पुरुष की भांति संपूर्ण स्त्री है। उसे कृष्ण से कोई दुनियावी काम नहीं निकलवाना है। दोनों एक दूसरे को अलंकृत करके स्वयं को सजाते हैं। यहां ‘नीयते शौक भर न जाए कहीं, तू भी दिल से उतर न जाए कहीं’ जैसी फटेहाली नहीं है, नई कहकशांओं को जगाने वाली दीवाली है। यहां पाखंडी जिम्मेदारियों में उम्र गंवाने के बाद की ठरक के नरक नहीं हैं। यहां नैसर्गिक देह और नेह के चिराग जलते हैं। यहां खजुराहो के शिल्पियों की छेनियां अपने ऊपर बरसते हथौड़ों के संकोच को सुनती हैं। बचपन से ही कृष्ण की लुकी छिपी सखी राधा एक अनाम रहस्य हैं। उन्हें कृष्ण की शक्ति और आत्मा कहा गया है। कृष्ण के लिए राधा और राधा के लिए कृष्ण दिव्य मित्र हैं। ‘श्रीमद्भागवत’ में वेदव्यास ने ‘राधा’ को अनाम रखकर कृष्ण के साथ जो रमणधरा दी है, वह कुरुक्षेत्र की रणभूमि से दूर, नैसर्गिक और कमनीय है। वहां अजरुन को कही गई गीता मौन है। यहां एकांतिक मदहोशियां और खामोशियां हैं, मंजीर और किंकणी की सरगोशियां हैं। यहां देह की तमाम परतें एक हो रूह से मिलती हैं। यहां विपरीत ध्रुवों ने अपनी मांसलताओं को आत्मा दी है। यह दो संपूर्णताओं के समंदर का महास्नान है। सागरकुंभ! इस अनुभव तक कोई आए तो जाने! इस रहस्य में नहाए तो जाने! देहात्मा का यह अद्वैत इतना विराट है कि तन, मन, एकांत, संसार, आत्मा, परमात्मा सब एक हैं। यह वह आतिश है, जिसे लगाने और बुझाने की फिक्र नहीं। राधा के बिना कृष्ण हैं ही नहीं। सदियों बाद चैतन्य महाप्रभु आते हैं तो उनकी मस्ती बताती है कि वे राधा-कृष्ण के अवतार हैं। मीरा आती है और राधा से रूह पाकर कृष्ण को अपने साथ नचाती, सजाती, सुलाती और जगाती है। इस प्रेम पड़ाव पर दुनियावी ‘चरित्र’ भौचक्का है। धरती और स्त्री को जायदाद बनाने वालों के आसन हिल जाते हंै। ‘श्रीमद्भागवत’ की ओट से चलकर राधा कृष्ण मुखर हो सैकड़ों शास्त्रों के किरदार हो जाते हैं। काव्य उनके असीम को गाने को तड़प उठता है। स्त्री पुरुष उन्हें घेर नाचने लगते हैं, गौएं वंशी सुन रंभाने लगती हैं, पंछी नए सुर पाते हैं, ग्वाले मतवाले हो जाते हैं, मोर चितचोर हो उठते हैं। नदियों को अपना नया पता मिलता है। डुबकियां खुद को कदंब पर टंगा देख कसमसाती हैं। वस्त्र पाते हैं कि वे हों तो राधाकृष्ण की टोली के साथ हों और न हों तो भी इसी छैल छबीली टोली के साथ! देवकी और यशोदा धन्य होती हैं। फूलों को अचानक ख्याल आता है — अरे! हम जिनके लिए आंखें बिछाए खिल खिल नहीं थकते थे, वे नटखट आ गए! चलो, मधुवन हो जाओ! तितलियों, भंवरों, पंछियों में जुनूनी उड़ानें जगाओ! जुगनुओं से कहो, आकाशगंगा हो जाओ। जहां तक बन सके, वहां तक हो आओ — तन, मन और जीवन को संपूर्णता से सजाओ। मौत आती हो तो चूमचूम कर गले लगाओ — हर नवद्वार से गुजर जाओ। फिर जागने में गहरा विश्राम है, फिर गहरी निद्रा में गहरा जागरण है। जब रोग कट जाता है तो हर भोग एक जोग और हर जोग एक भोग हो जाता है। खुद को पाना भगवान को भोग लगाना है। कृष्ण भरते ही खाली हो जाते हैं और खाली होते ही भर जाते हैं। वे कब क्या करेंगे, कोई भरोसा नहीं। वे छलिया हैं, वे मायावी हैं, वे लीलामय हैं। उनसे रूखा सूखा इतिहास नहीं, समूचा महारास रचा जाता है। उनसे सनातन सत्य टपकते हैं। कृष्ण महायोगी होकर भी किसी योग की साधना करते नहीं मिलते। उन्हें कुछ नहीं पाना है। जीवन नर्तन के लिए उन्हें किसी विशेष घड़ी की प्रतीक्षा नहीं है। उनके सलोने स्त्री पुरुष एक दूसरे से बचकर नहीं रहते। उनका आनंद मनुष्य को उस रस में डुबो देता है, जहां एक ही स्मरण बचता है ‘मैं’ हूं। मिट कर भी मैं हूं। मैं ‘वही’ हूं। अजरुन को वे निरंतर इसी स्मरण पर रहने को कहते हैं — ‘मामेकं शरणम् व्रज!’ विराट की शरण में बेशर्त प्रेम है, जिससे जो होना हो, होता रहे — रचना हो, या विध्वंस हो। निर्णय के क्षणों में मृत्यु सिर्फ रूपांतरण है। कृष्ण की साक्षी में मृत्यु दुख नहीं, नए सफर का रोमांच है। कृष्ण का ‘पांचजन्य’ शंख और ‘सुदर्शन चक्र’ गहरे अर्थ रखते हैं। इन्हें बंदरों के हाथ का उस्तरा बनाना असंभव है। कृष्ण जिस प्रेम की बंशी बजाते हैं, वहां किसी को भी, किसी के लिए बांधा नहीं जा सकता। प्रेम की नींव हो तो विवाह जैसी पारंपरिक चीज भी नितनूतन और अद्भुत हो उठती है। कृष्ण प्रेम नहीं करते, कृष्ण प्रेम नहीं मांगते। कृष्ण प्रेम होते हैं। वहां सुदामा जैसा निर्धन सखा शिष्य हुए बिना तर जाता है। अजरुन जैसा सखा सामाजिक संबंधों से ऊपर उठकर ‘जो मरे ही हुए हैं’, उनके बोझ से धरती को मुक्त करने के लिए तत्पर हो जाता है। पत्नी रुक्मिणी और मित्र द्रौपदी राधा कृष्ण के बीच दीवार नहीं बनातीं। दूसरे के स्वभाव को उसका समूचा आकाश और अवकाश मिलता है — प्रेम में भी, युद्ध में भी! भागवत और महाभारत की गीता कृष्ण की अनंतता के दो गीत हैं — एक में स्त्री के साथ कृष्ण समूचे हैं, दूसरे में मित्र के साथ समूचे! सखा अजरुन (भारत) से कृष्ण कहते बाद में हैं, करते पहले हैं — ‘जब जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का अ युदय होता है, तब तब मैं स्वयं का सृजन करता हूं।’ यह भविष्य के लिए कोई आश्वासन नहीं है, अभी और यहीं की जुगत है। यहां ‘मैं’ सबका है। यह निरहंकार की घोषणा है, इसीलिए स्वयं की अविलंब रचना है। कृष्ण लौटते नहीं, खुद को देकर चले जाते हैं। जो जीना जानते हैं, वे उन्हीं के हाथ आते हैं। कृष्ण प्रेमी और सखा हैं, गुरु और गंभीर कतई नहीं हैं। वे खेल को सिर्फ खेलते भर नहीं, खेल ही हो जाते हैं। वे शत्रुओं तक को अपनी सेना देते हैं और हर शाम उन लोगों से मिलने चले जाते हैं, जिनसे दिन भर लड़े होते हैं। अपरिहार्य होने पर ही वे शत्रुता न छोड़ने वाले किसी विपक्षी के साथ छल करते हैं। विपक्षी बुजुर्ग तक उनके सामने हार मानने या मृत्यु पाने को आतुर दीखते हैं। श्रीकृष्ण को किसी अज्ञात शक्ति के प्रति प्राय: नतमस्तक देखा जाता रहा। जब देह से मुक्त होने की घड़ी आई, वे एकांत में मुक्त हो गए — जीवन संध्या में एक स्थान पर वनस्पतियों के पीछे विश्राम कर रहे थे कि एक शिकारी ने उन्हें छिपा हुआ हिरण जानकर जहर बुझा तीर मारा। वे चुपचाप मर गए। जीवन की भांति मृत्यु परममित्र है। चेतना का ‘मैं’ नहीं मरता। अहंकार का ‘मैं’ तो मरा ही हुआ है। हर मरण नया अवतरण लाता है। कृष्ण निरंतर नए होते जाते हैं। ष्
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(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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