सिद्धांत

dainikbhaskar.com | Oct 26, 2012, 00:13 IST

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सिद्धांत

सिद्धांत ने किताबों को ज़मीन पर फेंकते हुए गुस्से से कहा, 'ये किताबें मुझे नहीं चाहिए।'क्यों क्या हुआ? सब तो बढिय़ा हैं। कहीं से फटी तो नहीं है। मां ने बड़े प्यार से उसे समझाया।

'नहीं मां, मुझे किसी की पढ़ी हुई जूठी किताबें नहीं चाहिए। सिद्धांत ने गुस्से में कहा।
'बेटे, किताबें भी भला कोई खाने की चीज़ होती हैं, मां ने दलील दी।


'नहीं मां, मुझे नहीं पता। नए सत्र में मुझे सब नया ही चाहिए- किताबें, कलम, स्लेट और बस्ता सबकुछ। सिद्धांत के सिर पर तो जैसे सब कुछ नया लेने का ही भूत सवार था। वह बिना कुछ खाए ही स्कूल चला गया।


सिद्धांत का गुस्सा और जि़द देखकर मां को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। उन्होंने ज़मीन पर पड़ी किताबों को उठाया और अलमारी पर रख दिया।


स्कूल खुल गया था और सिद्धांत इस वर्ष कक्षा पांचवी में पहुंच गया था।

इसलिए मां ने पिछले वर्ष पांचवी में पढऩे वाले किसी बच्चे की किताबें ले लीं थी। पर सिद्धांत को मां की यह बात पसंद नहीं आई।


कक्षा के अन्य साथी बस्ते, किताबें, कलम से लेकर स्लेट तक, सब कुछ नया लाए थे और उतने ही उत्साह से दिखा भी रहे थे। अब सिद्धांत ने भी ठान लिया कि उसे भी सब कुछ नया ही चाहिए। तभी उसकी नज़र हिमांशु की किताबों पर पड़ी। उसकी किताबों के कवर फट चुके थे।


'अरे! हिमांशु तुमने पुरानी किताबें खरीदीं? उसने बड़े ही आश्चर्य से पूछा।


'हां, मेरे पिताजी ने पिछले वर्ष पांचवीं पढ़ रहे सुभाष की किताबें ले ली हैं वो भी आधी कीमत पर,Ó हिमांशु ने कहा।
'... और तुमने पसंद भी कर लीं? नई किताबों के लिए नहीं कहा?


'भला क्यों कहता? इन किताबों को हुआ ही क्या है? हिमांशु ने जवाब दिया, 'जानते हो, किताबें इस साल बीस से तीस प्रतिशत तक की मूल्यवृद्धि के साथ बिक रहीं हैं, तो यह पुराने मूल्य के आधे पौने दामों पर मिल जाएं तो बढ़ी हुई कीमत पर नई खरीदने की मूर्खता कौन करे? हिमांशु ने आगे कहा, 'फिर इनके पाठ पुराने तो नहीं पड़े, पाठ्य सामग्री तो वही है। फर्क यही है कि यह पिछले संस्करण की हैं। वैसे भी इस संस्करण की कुछ प्रतियां तो दुकान में अभी भी होंगी, जिन्हें लोग नए मूल्यों पर खरीद रहे होंगे। हिमांशु की बातों को सुनकर सिद्धांत चुप हो गया। सोचने लगा, 'हिमांशु ने पुरानी ही किताबें खरीदी हैं। उसके पास पैसों की क्या कमी है? उसके पापा अच्छी कम्पनी में काम करते हैं। सही भी तो है, वही वस्तु अगर कम कीमत पर मिले, तो कोई सस्ते में क्यों न ले? वाकई हिमांशु समझदार है, एक मैं ही मूर्ख हूं, जो नई किताबों की जि़द कर रहा हूं।

सिद्धांत खुद को कोस रहा था, 'अपनी मां को कितना परेशान करता हूं। वो अकेली ही मेरा पालन-पोषण कर रही हैं। Ó सिद्धांत की मां वनग्रामों से बांस की तीली, डालियां- ठुनकी, झोड़ा, सूप आदि थोक में खरीदकर आस-पास के गांव के साप्ताहिक हाट-बाज़ारों में बेचती हैं। और उन पैसों से ही तो उसके साथ बाकी भाई-बहनों का भरण-पोषण करती हैं। बाबा तो एक बीमारी में कब के चल बसे। वह घर सोचते हुए जा रहा था, 'वैसे मां खुद ही इतनी परेशान हैं और ऊपर से मैं उन्हें और भी दुख पहुंचाता हूं।घर पहुंचते ही। 'मां, कहां हैं वे किताबें?
'कौन-सी किताबें?
'अरे! जिन्हें सुबह गुस्से में फेंक दिया था। वो आले पर रखीं हैं, पर क्यों? तुम्हें तो जूठन नहीं पढऩी न!Ó मां ने व्यंग्य भरे लहजे में कहा।


'नहीं मां, अब नई किताब लाने की ज़रूरत नहीं है, मैं उन्हीं से ही पढ़ लूंगा। स्लेट भी वही चल जाएगी। लकड़ी का फ्रेम भर ही तो निकला है। और हां पुराने वाले बस्ते को भी धो देना


सिद्धांत पिछले साल वाली अपनी कलम भी खोजने लगा ताकि उसमें रिफिल भरवा सके। अचानक सिद्धांत में आए इस परिवर्तन को मां समझ नहीं पा रही थीं, पर खुश बहुत थीं।

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