...मुझसे दोस्ती करोगे!

dainikbhaskar.com | Oct 26, 2012, 00:02 AM IST

...मुझसे दोस्ती करोगे!

हैलो दोस्तो, मैं हूं डूडू। अरे! यह तो सिर्फ मेरा नाम है। सभी अपने-अपने बारे में बताने के लिए आते हैं तो इस बार मैं भी आ ही गया। तो चलिए, मैं आपको अपनी दुनिया के सफर पर लेकर चलता हूं। इस सैर में आपको प्राप्त होंगी, हमारे बारे में कई रोचक जानकारियां। तो शुरू करें?


सबसे पहले अपनी आकारिकी का ब्यौरा देता चलता हूं। हमारा सिर बड़ा और शरीर भारी होता है। भारी शरीर के साथ गर्दन छोटी और छाती चौड़ी होती है। जन्तु-जगत के अन्य प्राणियों के भांति हमारी प्रजाति के नर और मादा के आकार-प्रकार में अंतर होता है। नर गैंडे के सिर और शरीर की लम्बाई ३.७ मीटर से ४ मीटर तक लम्बी होती है और मादा की लम्बाई ३.४ से ३.५ मीटर तक होती है। हमें हल्के में लेने का विचार तो नहीं आ रहा है न! अगर आ रहा है तो त्याग ही दें, क्योंकि हम भारी बहुत होते हैं। अरे दोस्तो, मज़ाक तो बनता है न। खैर एक सामान्य गैंडे का वज़न २३०० किलोग्राम होता है।


हमारी नाक पर दो सींग होते हैं। नाक पर मौज़ूद लम्बे और मोटे बाल पर कैरोटिन नामक पदार्थ चिपककर सींग का आकार देता है। इस सींग का नाक की हड्डी से कोई सम्बंध नहीं है। सींग का प्रयोग अपने विरोधी को हराने के लिए करते हैं। प्राचीन काल में तो हमारे खाल से ढाल बनाए जाते थे, ताकि रणभूमि में तलवार के प्रहार से सैनिक खुद की रक्षा कर सकें। इस वजह से कुछ लोग गोलियों से खुद की रक्षा करने के लिए भी हमारी खाल का प्रयोग करते हैं। परन्तु यह धारणा गलत है। हमारी खाल बुलैटप्रूफ नहीं है। गोलियों से जब हम स्वयं की रक्षा नहीं कर सकते तो आपकी कैसे करेंगे?...वैसे, आपने हमारी खाल तो देखी ही है।

यह कई परतों वाली होती है। इन परतों के भीतर ही कई कीड़े रहते हैं। इन कीड़ों को खाने के लिए पक्षी भी हमारी सवारी करते हैं। वैसे मोटी खाल वाले को 'गैंडे की खालवालाञ्ज कहकर बुलाते हैं, जो हमें खास अच्छा नहीं लगता। आपका मतलब होता है वह व्यक्ति बेशर्म है, पर हम ऐसे हरगिज़ नहीं है। मोटी खाल में कीड़े रह लेते हैं और पक्षियों से हमारी पक्की दोस्ती है। हम इन्हें भोजन के रूप में कीड़े देते हैं और ये कीड़े खाकर हमें साफ करते हैं और साथ ही अनजाने खतरे से भी हमें आगाह करते हैं।


हम शुद्ध शकाहारी प्राणी हैं। अपने भोजन को अच्छी तरह से चबाने के लिए हमारे पास चौड़ा मुंह भी होता है। कभी-कभी हम अपने सींग का प्रयोग जड़ों को खोदने के लिए भी करते हैं। पौधों की जड़ें भी हमारे भोजन का हिस्सा होती हैं। इसके अलावा हम अनाज भी खा सकते हैं। हम दिन में दो बार पानी पीते हैं, लेकिन आस-पास पानी की कमी हो तो फिर चार-पांच दिन बिना पानी के भी रह सकते हैं। हमें खाना और घूमना बहुत पसंद है। सबसे ज़्यादा मज़ा तो दोस्तों के साथ कीचड़ में खेलने में आता है। दिन का अधिकतर समय हम सब वहीं व्यतीत करते हैं। इसके अलावा कई तरह की आवाज़ें भी निकालने में माहिर होते हैं।


लम्बे घास के मैदान ही हमारा पसंदीदा आवास है। एक ही रास्ते पर प्रतिदिन चलने से एक लम्बी-सी पगडंडी का निर्माण हो जाता है। इन रास्तों पर बिना देखे भी हम चल लेते हैं।


अरे, अरे! यह तो अच्छी बात नहीं है। कानाफूसी भी शुरू हो गई। ऐसा मत सोचना की मैं सुन नहीं सकता। सुनाई तो मुझे देता है कान जो हैं मेरे पास। पर मैं ज़्यादातर काम सूंघ कर ही चलाता हूं। तभी तो हमारी नाक धरती पर पाए जाने वाले जानवरों में सबसे चौड़ी होती है। हमारी आंखें छोटी और दृष्टि कमज़ोर होती है। शरीर तो काफी भारी होता ही है, पर खतरे को भांपते ही हम कई किलोमीटर तक तेज़ी से भाग लेते हैं। हम सब ४०-५० वर्ष तक जीवित रहते हैं।


स्वभाव से बेहद शांत होने के कारण किसी झगड़े की शुरुआत बिलकुल भी नहीं करते। यहां तक कि अगर कहीं झगड़ा होते देख लें, तो फिर वहां से निकल जाना ही बेहतर समझते हैं। लेकिन अगर हमें किसी ने खरोंच भी लगा दी, तो उसकी खैर नहीं। तब हम निडर होकर आक्रमण कर ही देते हैं।


हम गैंडों को मंद बुद्धि भी कहा जाता हैं, इसकी वजह यह है कि हम किसी भी समस्या के बारे में काफी देर तक विचार करते हैं। और इस तरह से सोच-विचार का सिलसिला हम पर ही भारी पड़ जाता है क्योंकि सोचने-सोचनेे में देर हो जाती है।


शेर और हाथी से हम लोग डरते ही नहीं। वो बेचारे ही डर के मारे में दूर-दूर रहते हैं। हमें तो सिर्फ आप मनुष्यों से ही डर लगता है।


कारण यह है कि चीन और भारत में विशेषतौर पर हमारी सींग से औषधि का निर्माण किया जाता है। इसी वजह से ही कई सदियों से हमारा शिकार किया जा रहा है। अभी भारत और अफ्रीका में हमारी संख्या बहुत ही कम बची है। हम सब विलुप्त होने के कगार पर ही हैं। सरकार ने भी हमारे शिकार पर रोक लगा दी है, जो बेअसर है। तभी तो आपसे दोस्ती करने आया हूं।


बस हमारे सींग को काटना और हमें नुकसान पहुंचाना बंद कर दें तो कितनी अच्छी तरह से बीते न हमारी जि़ंदगी।

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