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नोटबंदी के बाद देश का पहला कैशलेस गांव: वड़ा-पाव से लेकर कपड़े धुलवाने तक सारी सर्विसेस के लिए कार्ड से पेमेंट

dainikbhaskar.com | Dec 02, 2016, 12:45 PM IST

धसई में करीब 150 ट्रेडर्स हैं। गांव की आबादी 10 हजार है। लगभग सभी परिवारों के पास जनधन अकाउंट हैं। इस वजह से ज्यादातर लोगों के पास डेबिट कार्ड पहले से हैं।

मुंबई.महाराष्ट्र के ठाणे जिले की मुरबाड़ तहसील का आदिवासी बहुल गांव ‘धसई’ नोटबंदी के बाद देश का पहला कैशलेस विलेज बन गया है। राज्य के फाइनेंस मिनिस्टर सुधीर मुनगंटीवार ने गुरुवार को गांव जाकर पहला कैशलेस ट्रांजैक्शन किया। यहां वड़ा-पाव बेचने वालों से लेकर सैलून और लॉन्ड्री चलाने वालों तक कार्ड से ही पेमेंट ले रहे हैं। कैसे कैशलेस बना गांव...
1# 150 ट्रेडर्स, छोटा कारोबार
- धसई में करीब 150 ट्रेडर्स हैं। ये डेयरी, चावल, दलहन, किराना, यूटिलिटी स्टोर्स जैसे छोटे कारोबार करते हैं।
- गांव में बैंक आॅफ बड़ौदा की तरफ से 40 कैशलेस मशीने फ्री में इंस्टाल की गई हैं।
- बैंक ऑफ बड़ौदा के डिप्टी जनरल मैनेजर श्रीधर राव ने बताया कि 150 में से करीब 100 दुकानदारों ने खुद कैशलेस बिजनेस की इच्छा जताई थी।
- कई दुकानदारों के चालू खाते भी तत्काल खोल दिए गए हैं। बैंक ने चालू खाते में रखी जानेवाली रकम की सीमा भी कम कर दी है।
2# जनधन अकाउंट और डेबिट कार्ड
- गांव की आबादी 10 हजार है। लगभग सभी परिवारों के पास जनधन अकाउंट हैं। इस वजह से ज्यादातर लोगों के पास डेबिट कार्ड पहले से हैं।
- गांव को कैशलेस बनाने की पहल करने वाला एनजीओ स्वातंत्र्यवीर सावरकर स्मारक लोगों को इकट्ठा कर उन्हें कैशलेस सिस्टम में लाने के लिए ट्रेनिंग भी दे रहा है।
- स्कूली बच्चों को भी ट्रेंड किया जा रहा है ताकि वे घर जाकर अपने पेरेन्ट्स को ट्रेनिंग दे सकें।
ऐसे हुआ फायदा
- धसई के आसपास के करीब 60 छोटे गांव बिजनेस के लिए इसी पर निर्भर हैं।
- पैसों के लिए कारोबारियों को पहले यहां से 15 किलोमीटर दूर पर मौजूद एक बैंक के चक्कर काटने पड़ते थे।
- सावरकर स्मारक के वर्किंग प्रेसिडेंट रणजीत सावरकर ने बताया कि धसई के लोग अब सब्जी खरीदने, सैलून, हॉस्पिटल, गैरेज और ट्रैक्टर किराए पर लेने के लिए कैशलेस ट्रांजैक्शन कर रहे हैं।
कैशलेस ट्रांजैक्शन को बढ़ावा देने के लिए और क्या कर रही है सरकार

1. Paytm जैसा सरकारी ई-वॉलेट लाने की तैयारी, सब्सिडी पर स्मार्टफोन
- मोदी सरकार ने देश में नकद लेन-देन खत्म करने की तैयारी तेज कर दी है। पेटीएम की तर्ज पर सरकारी ई-वॉलेट लाने की प्लानिंग है। यह मौजूदा यूपीआई (यूनिफाइड पैमेंट इंटरफेस) से अलग या उसका अपडेट वर्जन हो सकता है।
- इससे किसी तरह के लेनदेन पर चार्ज नहीं लगेगा। इसके साथ सरकार गावों में लोगों को सब्सिडी पर स्मार्टफोन देने की भी सोच रही है। उम्मीद है कि अगले आम बजट में इस बारे में कुछ एलान हो सकते हैं।
2. क्रेडिट-डेबिट की जगह आधार कार्ड
- कैशलेस इकोनॉमी को बढ़ावा देने के लिए सरकार डेबिट और क्रेडिट कार्ड की जगह आधार कार्ड को लाने की तैयारी में है।
- इसके लिए वह एक कॉमन मोबाइल फोन एप को डेवलप कर रही है।
- कारोबारी या दुकानदार इसका इस्तेमाल आधार-एनेबल्ड पेमेंट्स के लिए कर सकेंगे।
- पेमेंट के लिए पिन और पासवर्ड की जरूरत नहीं होगी।
3. इसलिए कैश ट्रांजैक्शन से बचना चाहती है सरकार
- मास्टरकार्ड की रिपोर्ट बताती है कि करेंसी ऑपरेशन पर हर साल 21,000 करोड़ रु. खर्च होते हैं।
- जुलाई 2015 से जून 2016 के दौरान रिजर्व बैंक ने 21.2 अरब नोटों की सप्लाई की। इन्हें बनाने में 3,421 करोड़ का खर्च आया।
- 2000 और 500 के नए नोटों की छपाई पर 15,000 करोड़ रु. खर्च होने का अनुमान है।
आगे की स्लाइड्स में देखिए नोटबंदी के बाद देश के पहले कैशलेस गांव की PHOTOS
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Web Title: Know interesting facts about country first cashless village.
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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