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अफसानों में बयां की बुजुर्गों की मजबूरियां

Bhaskar News Network | Oct 19, 2016, 02:15 AM IST

सिटी रिपोर्टर     मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी द्वारा मंगलवार को "उर्दू फिक्शन सम्त और रफ्तार' पर आधारित अखिल भारतीय सेमिनार का आयोजन किया गया। इसके पहले सत्र में उर्दू अकादमी की सचिव डाॅ. नुसरत मेहदी ने कहा कि हमने कुछ दिनों पहले अफसानों और कहानियों पर आधारित "अफसाने का अफसाना' का आयोजन किया था, जिसे बहुत पसंद किया गया। उसी सफलता के आधार पर हमने फिक्शन पर आधारित कार्यक्रम का आयोजन किया है। कार्यक्रम का संचालन करते हुए इकबाल मसूद (भोपाल) ने अफसाना "चियंूटी का आटा' सुनाया, जिसमें बुढ़ापे की मजबूरी बयान की कि किस तरह लोग बूढ़े व्यक्तियों से बात करने और पास बैठने से घबराते हैं। डाॅ. सादिका नवाब (मुंबई) ने मछेरे की जिंदगी पर आधारित "पैज नदी का मछेरा' सुनाया। प्रो. अजहर राही ने अपना अफसाना "कड़ी धूप का सफर' सुनाया। मुशर्रफ आलम जोकी (दिल्ली) ने "उड़ने दो ज़रा' के कुछ अंश सुनाए। मो. अफजल ने कहा कि नौजवान नाविल लिखने वालों की कार्यशाला उर्दू अकादमी द्वारा की जानी चाहिए। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अली अहमद फातमी (इलाहबाद) ने कहा कि फिक्शन जब तक फलसफा न बन जाए, तब तक उसको फिक्शन नहीं कहा जा सकता।

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Web Title: अफसानों में बयां की बुजुर्गों की मजबूरियां
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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