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PHOTOS : जहरीली गैस हवा में फैल रही थी और हजारों लोग मौत की नींद सोते जा रहे थे

चंदन कुमार | Dec 02, 2012, 00:03 AM IST

भोपाल। तीन दिसंबर, 1984 की काली रात, शायद ही दुनिया भुला सके, क्योंकि इसी दिन मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में औद्योगिक इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना घटी थी, जिसने हजारों लोगों की जिंदगी छीन ली थी। रोजी-रोटी की तलाश में दूर-दराज इलाकों से भोपाल आए मासूम और मजबूर लोग तो चैन की नींद सो रहे थे। उन्हें कहां मालूम था कि वह रात उनके जीवन की आखिरी रात होगी।
हादसे के वक्त लगभग पूरा शहर सो रहा था, इस बात से लोग बेखबर थे कि वे सूरज की अगली किरण नहीं देख पाएंगे। त्राहिमाम की शुरुआत सबसे पहले यूनियन कार्बाइड की फैक्टरी के पास स्थित झुग्गी से हुई। जैसे ही फैक्टरी से जहरीली गैस का रिसाव शुरू हुआ, देखते ही देखते इलाके की शांति चीख-पुकार में बदल गई। किसी के आंखों की रोशनी जाने लगी, किसी की त्वचा पूरी तरह से जल गई, किसी की धड़कन रुक गई, कोई मिनटों में अपंग हो गया।
सबसे बुरी हालत तो बच्चों की थी। जो कुछ लोग सही-सलामत दिख रहे थे, अपनों को बचाने के लिए अस्पताल की ओर बेतहाशा भाग रहे थे। विडंबना तो देखिए, उस वक्त अस्पताल में मौजूद चिकित्सकों को यह मालूम ही नहीं था कि मरीजों का इलाज कैसे हो। हर कोई लाचार नजर आ रहा था। कुछ ही घंटों में पूरे शहर में अफरा-तफरी मच गई।
प्लांट में रिसाव से बने जहरीले गैस के बादल को हवा के झोंके अपने साथ बहाकर ले जा रहे थे और लोग मौत की नींद सोते चले जा रहे थे। एक रिपोर्ट के मुताबिक जहरीली गैस ने लोगों को मौत की नींद सुलाने में औसतन तीन मिनट लिए।
इस हादसे में लोगों को जो समस्याएं आ रही थीं, उनमें प्रमुख थीं - अंधापन, सिर चकराना, उल्टी और सांस की तकलीफ, पेट का दर्द, फेफड़ों की तकलीफ, प्रजनन संबंधी समस्याएं, जहरीले रसायन के कारण त्वचा का जलना। जब तक सुबह होती, तब तक हजारों लोग मौत की नींद सो चुके थे और यह सिलसिला लगातार जारी रहा। चारों ओर ओर लोग त्राहिमाम कर रहे थे, लेकिन मजबूरी ऐसी कि वे जिंदगी बचा पाने में सफल नहीं हो पा रहे थे।
आप इस विभीषिका का अंदाजा इन दर्दनाक तस्वीरों को देखकर ही लगा सकते हैं कि आखिर उस वक्त मंजर कितना भयावह था...
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Web Title: bhopal gas tragedy continue from 28 years
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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