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पुलिसकर्मी की शहादत पर भी आंखें नम हों

Bhaskar News Network | Oct 19, 2016, 02:25 AM IST

पुलिसकर्मी की शहादत पर भी आंखें नम हों
पुलिस की शहादत को भी हो नमन,

सिर्फ गालियांे की हकदार नहीं है पुलिस

यूं तो पुलिस, रक्षकांे और सैनिकांे की शहादत की परम्परा उतनी ही पुरानी है, जितना पुराना है मानव सभ्यता का इतिहास, लेकिन आजाद हिंदुस्तान मंे 21 अक्टूबर 1959 का दिन पुलिस के लिए सर्वाधिक ऐतिहासिक महत्व का है, जब लद्दाख की सीमा पर स्थित भारतीय पुलिस के 20 जवानांे की एक टुकड़ी पर चीन की सेना ने घात लगाकर हमला किया। अग्रिम पंक्ति पर तैनात सीआरपीएफ के सब इन्स्पेक्टर करम सिंह और उसके साथियांे ने पूरी बहादुरी से मुकाबला किया और 10 पुलिस के जवानांे ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राणांे की आहूति दी। इसी स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए 21 अक्टूबर को पूरे मुल्क मंे जिला मुख्यालय से लेकर प्रदेश और देश की राजधानी तक मातृ भूमि पर न्यौछावर होने वाले पुलिस के जांबाजों को श्रद्धा सुमन अर्पित करने हेतु पुलिस शहीद दिवस मनाया जाता है।

21 अक्टूबर 1959 से आज तक, विगत 58 सालांे मंे 35,000 से ज्यादा पुलि कर्मी ड्यूटी पर मातृभूमि की रक्षा के लिए शहीद हुए हैं। कभी खंूखार आतंकियों से लड़ते हुए, कभी नक्सलियांे से लोहा लेते हुए, कभी दुर्दांत अपराधियांे और माफिया के दंश झेलते हुए, कभी चंदन तस्कर कुख्यात वीरप्पन का सामना करते हुए और कभी चंबल घाटी मंे डाकुआंे से मुकाबला करते हुए। शायद ही कोई ऐसा दिन हो, जब देश मंे या प्रदेश मंे पुलिसकर्मी के शहादत या घायल होने की खबर न हो ।

पुलिस हमारी आंतरिक सुरक्षा की पहली दीवार हैं, जब भी कोई आतंकी या नक्सली हमला हो या सांप्रदायिक दंगे या लूटपाट की घटनाएं, अतिक्रमणकारियांे से जमीन मुक्त करानी हो या जंगल और खनन माफियाआंे पर लगाम कसने का काम, उग्र और हिंसक भीड़ से जानमाल की हिफाजत की बात हो या हमला चाहे देश की गौरवशाली संसद पर हो, अक्षरधाम के मंदिर पर हो, मंुबई के दिल पर हो या कश्मीर की थाने और चौकियांे पर, कोई हेमन्त करकरे, तुकाराम ओमले, कमलेश कुमारी, मोहनचन्द्र शर्मा, जिया उल हक, सरदार बलजीत सिंह, मुकुल द्विवेदी और संतोष यादव जैसे पुलिस के जाबांज़ आ ही जाते हैं, लोकतंत्र के मंदिर पर सबसे पहले अपना शीश दान करने। यह अलग बात है कि जब भी इस मुल्क मंे कोई फौजी शहीद होता है, पूरे देश की आंखों नम होती हैं, लेकिन हर रोज ड्यूटी पर इस देश मंे पुलिसकर्मी मारे जाते हैं, बहुत कम होती हैं वे आंखंे, जो नम होती हैं। मौत चाहे कारगिल मंे हो या संसद के दरवाजे पर, पठानकोट और उड़ी के हमले मंे हों या नक्सली घुसपैठांे मंे, सीमा की सुरक्षा मंे हो या वीरप्पन की गोलियांे से, इस देश के लिए दी गई कोई भी शहादत कमतर नहीं है, और शहादत मंे फर्क भी नहीं किया जाना चाहिए।

पुलिस सर्वाधिक विषम परिस्थितियांे मंे काम करती है, लेकिन उसे बदले में चारांे तरफ से ताने, उपहास, अपमान, हिकारत और आलोचना ही झेलनी पड़ती है। सरकारी कार्यालयांे मंे मात्र पुलिस थाना ही ऐसा भवन है, जिसके नसीब मंे न तो सुबह और न ही शाम को ताला होता है। साल के 365 दिन 24 घंटे ड्यूटी पर माने जाने वाले पुलिसकर्मी के लिए न तो छुट्टी का दिन मुकर्रर है और न ही ड्यूटी के घंटे। पुलिस की दिवाली इसी मंे है कि लोगांे के दियांे की रोशनी न बुझे। पुलिस की होली भी इसी मंे है कि लोगांे के रंग मंे खलल न पड़े। किंतु शायद ही कहीं कोई थाने में साधुवाद भी देने आता हो। अगर कहीं छोटी-सी भी घटना या दुर्घटना हो जाए तो लोग आसमान सिर पर उठा लेते हैं। पुलिस की पीड़ा इन शब्दों में व्यक्त होती है:-

कांटे, पत्थर, नफरत, गाली, इन से मेरी हस्ती है।

फूल, मोहब्बत, इज्ज़त, ताली, जाने कैसी बस्ती है ।।

पिछले वर्षों में जाने कितने पुलिस आयोग और पुलिस सुधार समितियां बनीं, लेकिन आज भी अधिकांश रिपोर्टें कार्यालयों में धूल खा रही हैं । सर्वोच्च न्यायालय के तमाम आदेशों के बावजूद अधिकांश राज्यों ने अभी न तो अपने पुलिस एक्ट ही बनाए हैं और न ही पुलिस को पारदर्शी, निष्पक्ष और जवाबदेह बनाने की पहल की है। तंत्र में काबिज स्थापित लोग अपनी पुलिस चाहते हैं और आम जनता अच्छी पुलिस। इन दो पक्षों के बीच झूल रही भारतीय पुलिस के लिए पुलिस सुधार आज भी एक दूर की कौड़ी है। पुलिस भी इसी समाज का अंग है और विकृतियां तथा मानवीय कमजोरियों से अछूती नहीं है। आज जरूरत है पुलिस के कार्यों में पारदर्शिता की, पुलिसकर्मियों के व्यवहार में बदलाव की तथा पुलिस के प्रति समाज के सकारात्मक नजरिये की, क्योंकि आखिर पुलिसकर्मी भी तो एक इंसान ही है। पुलिसकर्मियों की व्यथा इन पंक्तियों में उज़ागर होती है: -

बंद हो थाने के पट, ऐसा कभी होता नहीं,

शहर सोए चैन से, बस इसलिए सोता नहीं ।

कर्मपथ में है मिले, मुझको मगर कांटे बहुत,

आदमी हूं कैसे कह दूं, मैं कभी रोता नहीं ।।

आज चारों तरफ जन भागीदारी की बात हो रही है । पुलिस के कार्यों में भी समाज की सहभागिता की नितांत आवश्यकता है। पूरे देश में यदि पुलिस जनसंख्या अनुपात की बात करें तो जहां शहरी क्षेत्रों में एक हजार व्यक्तियों पर एक पुलिसकर्मी है वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह अनुपात बढ़कर 1500 व्यक्तियों पर एक पुलिसकर्मी का हो जाता है। निश्चित रूप से हजारों व्यक्तियों की सुरक्षा न तो एक व्यक्ति कर सकता है और न ही यह संभव है। लेकिन यदि समाज का सहयोग मिल जाता है तो यही पुलिस अपने नगण्य अनुपात के बावजूद एक भरोसा समाज को अवश्य दे सकती है कि हम ऐसी व्यवस्था स्थापित कर सकते हैं जहां शरीफ चैन से एवं बदमाश बेचैन रहें।

आज जब सारे देश मंे जेलांे मंे बंद जुर्म करने वाले कैदियांे के लिए सुधार के तमाम उपायांे पर चर्चा हो रही है, उन्हंे बेहतर सुविधाएं देने की मांग हो रही हैं, तब दूसरांे की हिफाजत के लिए 24 घंटे सजग रहने वाले पुलिसकर्मियांे की पीड़ाआंे का भी आंकलन किया जाना चाहिए। एक स्वतंत्र संस्था के सर्वेक्षण मंे यह बात सामने आई है कि उपनिरीक्षक से लेकर थाना प्रभारी तक औसतन 14 से 16 घंटे प्रतिदिन काम करते हैं तथा आरक्षक से सहायक उपनिरीक्षक स्तर के पुलिसकर्मी नियमित 12 से 14 घंटे अपनी ड्यूटी पर रहते हैं, यह कितना हास्यास्पद है कि हाल ही मंे भोपाल मंे पुलिस के लिए महीने मंे एक दिन छुट्टी का मुकर्रर किया गया है

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

पवन जैन भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी और ख्यात कवि

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Web Title: पुलिसकर्मी की शहादत पर भी आंखें नम हों
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