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पहले से तय था योगी का नाम

डॉ. भारत अग्रवाल | Mar 21, 2017, 13:38 IST

  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
पहले से तय था योगी का नाम
वैसे तो नोटबंदी के बाद लाख टके का सवाल पूछना आउट ऑफ फैशन है, लेकिन योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाने के पीछे की कहानी कई लोगों के लिए लाख टके का सवाल है। पहले मनोज सिन्हा का नाम चला, फिर राजनाथ सिंह का। अंदर की बात यह है कि बीजेपी दो स्थितियों के लिए नाम पहले ही तय कर चुकी थी। 270 से कम सीटें आतीं, तो कोई और नाम होता, और 300 से ज्यादा आने पर योगी होते। अंदर की एक और बात यह है कि बीजेपी जानती है कि यूपी जैसे विशाल प्रदेश में मात्र विकास की राजनीति से चुनाव जीतना संभव नहीं है। इसलिए विकास भी चलेगा, और हिन्दुत्व भी। यह थी डबल इंजन वाली बात। सीधे मोदी की पसंद।
मायावती की सीट!
महागठबंधन की सुगबुगाहट है, और माया मेमसाब अभी कोप भवन में ही हैं। लेकिन सूत्रों के अनुसार इस पर सबसे बारीक निगाह उन्हीं ने लगा रखी है। चक्कर यह है कि मायावती का राज्यसभा का टर्म अगले साल पूरा हो रहा है। नामुराद यूपी ने इतनी भी सीटें नहीं दीं हैं कि एक अदद सीट ही निकल जाए। उधर समाजवादी और कांग्रेस वगैरह के पास मिला-जुलाकर इतनी सीटें फालतू हो सकती हैं कि मायावती एक गंभीर उम्मीदवार बन सकें, सीट तो फिर भी सीधे नहीं निकलती। दूसरी प्राथमिकता वगैरह के गणित बैठाने पड़ेंगे। लिहाजा यह बात छेड़ी गई है कि अगर बहनजी जीत गईं, तो इससे 2019 के लिए अच्छा मैसेज जाएगा। मामला बुआ-भतीजे के बीच है।
वो जो प्रवक्ता थे
बीजेपी के दो-दो केन्द्रीय प्रवक्ता सिद्धार्थ नाथ सिंह और श्रीकांत शर्मा अब योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। मुख्यमंत्री ने उन्हें सरकार का भी प्रवक्ता नियुक्त किया है। दोनों हर सप्ताह मीडिया से बात किया करेंगे। ठीक मोदी सरकार स्टाइल में। सरकार के पहले दिन, खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेस कांफ्रेंस में दोनों मुख्यमंत्री के साथ बैठे थे। एक समय था, जब इन दोनों को अरुण जेटली की ईजाद माना जाता था। लेकिन अब दोनों लखनऊ पहुंच चुके हैं।
जीत तुम्हारी, खुशी हमारी
जानते हैं श्रीकांत शर्मा के चुनाव जीतने और लखनऊ में मंत्री बन जाने पर सबसे ज्यादा खुश कौन है? ड्रीमगर्ल हेमामालिनी। हेमामालिनी मथुरा से सांसद हैं और दिल्ली में रहते हुए भी श्रीकांत शर्मा भी इसी क्षेत्र में सक्रिय बने रहते थे। लिहाजा हेमामालिनी को हमेशा यह खटका रहता था कि कहीं श्रीकांत शर्मा लोकसभा टिकट न ले लें। 2014 में भी श्रीकांत शर्मा सशक्त दावेदार थे, लेकिन सिर्फ हेमामालिनी का नाम आने पर अमित शाह ने उन्हें टिकट दिया था। अब श्रीकांत शर्मा न केवल चुनाव जीत गए हैं, बल्कि उनकी सीट के क्षेत्र से बीजेपी को 2014 की तुलना में भी ज्यादा बढ़त मिली है। यही वजह है कि श्रीकांत शर्मा के चुनाव जीतने, मंत्री बनने पर सबसे पहले बधाई और धन्यवाद देने वालों में हेमाजी ही थीं। उन्हें पता है कि अब 2019 के चुनाव में श्रीकांत शर्मा लोकसभा का टिकट नहीं मांगेगे।
प्रसन्न हैं राजनाथ सिंह
लोग कहते हैं कि राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए। लेकिन खुद राजनाथ सिंह के नजदीकी सूत्र इससे सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि राजनाथ सिंह केन्द्र सरकार में नंबर दो की अपनी हैसियत से प्रसन्न हैं। हालांकि अपने पुत्र पंकज सिंह को मंत्री न बनाए जाने का मलाल उन्हें हो सकता है। इसका कारण बीजेपी की यह परम्परा है कि मां-बेटे या बाप-बेटे दोनों को एक साथ मंत्री नहीं बनाया जाता है। इसी कारण न अनुराग ठाकुर को पद मिला, न दुष्यंत सिंह को। हालांकि योगी आदित्यनाथ को ट्वीट करके सबसे पहले बधाई शायद पंकज सिंह ने ही दी थी।
क्या जमाना है!
क्या जमाना आ गया है? लोग मां-बेटे दोनों को एक साथ पद नहीं देने का उदाहरण देने में भी मेनका पुत्र वरुण गांधी का नाम नहीं लेते। यकीन न हो, तो हमें ही देख लीजिए, ऊपर वाली खबर में।
टेंशन में सांसद
2019 के चुनाव को लेकर जितना चिंतन-मनन अमित शाह की टीम में चल रहा है, बीजेपी के कई मौजूदा सांसद उतने ही टेंशन में हैं। यूपी में बीजेपी के पुराने विधायकों के टिकटों की बड़े पैमाने पर और दिल्ली के पार्षदों के टिकटों की सौ प्रतिशत कटाई ने सबको टेंशन में ला दिया है। अमित शाह सिफारिश नहीं सुनते। सिर्फ ट्रैक रिकार्ड और उनके बनाए हुए मानदंड। इस बार यूपी में दिए टिकटों में भी सांसदों की नहीं चल सकी।
नेपाल में योगी कार्ड!
भारत-बांग्लादेश संबंधों में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री का अपना महत्व होता है। इसी तरह भारत-नेपाल संबंधों में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री का महत्व होता है। लेकिन अब योगी आदित्यनाथ के उदय के साथ ही यह महत्व कई गुना बढ़ गया है। गोरक्षनाथ मंदिर का नेपाल में भारी प्रभाव है। गोरक्षनाथ मंदिर में शिव प्रतिमा नेपाल की ही है। और योगी आदित्यनाथ के तो नेपाल के लोगों के साथ भी काफी अनन्य संबंध हैं। तो क्या नेपाल के लिए योगी मोदी के विशेष राजदूत भी होंगे?
तेज हुईं हसरतें
उत्तरप्रदेश के चुनाव में इतनी भारी-भरकम जीत से बीजेपी की राष्ट्रपति चुनाव को लेकर महत्वाकांक्षाएं और तेज हो गई हैं। अब बीजेपी किसी अपने वाले को और किसी सौम्य छवि वाले पुराने स्वयंसेवक को इस पद पर बैठाने के बारे में सोचने लगी है। आडवाणी ने अभी तक इससे इनकार नहीं किया है, लेकिन उम्र उनके आड़े आ रही है, क्योंकि राष्ट्रपति को काफी विदेश यात्राएं भी करनी होती हैं। सुमित्रा महाजन का नाम आगे चलता रहा है, लेकिन किसी छुपे रुस्तम की संभावना भी है। जैसे राम नाईक। उनके अलावा भी दो राज्यपालों का नाम विचाराधीन है।
फिर राज्यपाल कहां से लाएंगे!
इस बारे में बीजेपी को एक बिना मांगी सलाह बीजेपी के ही एक नेता की तरफ से, उन्हीं के शब्दों में “किसी मौजूदा राज्यपाल को केन्द्र में लाने का विचार बुरा नहीं है। लेकिन सच यह है कि हमें तो राज्यपाल नियुक्त करने में भी कई महीने लग गए थे, और आज भी कांग्रेस जमाने के कई राज्यपाल चले आ रहे हैं।”
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Web Title: Power Gallery By Dr. Bharat Agrawal
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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